कहानी एक पतंग की..

आज सुबह समीर जी की पतंग वाली पोस्ट पढ़ी... तो अपनी लिखी एक रचना याद आ गयी.. तो सोचा क्यो ना आपको पढ़वा दी जाए.. ये कहानी भी एक पतंग की ही है



रोज़ गगन में हज़ारो पतंग
के साथ वो भी उड़ती थी..
लहराती मचलती.. आसमानो से
बातें करती हुई...

इक डोर थी जो उसको थामे रखती थी
डोर से बंधी वो पतंग..
ऊँचाइयो में गोते लगा कर
लौट आती थी...

इक शाम एक एक कर सारी
पतंगे उतर गयी थी...
इक्का दुक्का पतंगे थी
और वो भी बहुत दूर..

अचानक कही से एक पतंग आई
काले माँझे वाली...
उसके इरादे कुछ नेक नही लगे
वो गोते खाने लगी..

पतंग उलझ पड़ी काले
माँझे से.. पूरा दम लगाया
डोर ने भी हिम्मत ना हरी
काले माँझे से पतंग को छुड़ाया

काल माँझा भी कहा हारता
फिर से लौटा... और ऊपर गिरा पतंग के
.. बेचारी पतंग दर्द से
छ्ट-पटा उठी..

रोई, गिडगिड़ाई, मगर काले माँझे
का दिल नही पिघला..
लहुलुहान सी पतंग हो गयी बेचारी
और अपनी हिम्मत हारी..

थकि प्यासी.. निढाल सी
हो चली थी.. वो पतंग
शाम की सर्द हवाओ में
कोयले सी जली थी..वो पतंग

जिसके भरोसे ऊँची उड़ान भरी थी
वो डोर तो कब की टूट चुकी थी..
काले मॅन के मांझो की दुनिया में
एक और पतंग लुट चुकी थी...

-------------------------

21 comments:

अनुराग July 18, 2008 1:44 PM  

काला मांझा हो या भूरा .....पतंग को तो आसमान में उड़ना ही पड़ेगा.......तेज हवा हो या ना हो.

'ताइर' July 18, 2008 1:50 PM  

patang ki to hasti hi mit jaye gar udan na ho usmein...ek ghutan si baaki reh jaaye...

रंजना [रंजू भाटिया] July 18, 2008 2:21 PM  

जिसके भरोसे ऊँची उड़ान भरी थी
वो डोर तो कब की टूट चुकी थी..




लगता है पतंगों का नशा सर चढ़ कर बोलने लगा है :) अच्छी लगी आपकी रचना

Abhijit July 18, 2008 2:28 PM  

kaale maanjhe ke dar se kahin patang udna bhool jaayegi?

use aur oonchi udaan bharni hai. aapki kavita ne sochne par majboor kar diya hai.

is rachna ke liye badhai

meeta July 18, 2008 2:55 PM  

kab tak yu hi kale manje wale ghago se patang haarti rahegi..kabhi jita bhi do...

Gyandutt Pandey July 18, 2008 3:39 PM  

उड़न तश्तरी की रचना भी अच्छी लगी और यह भी। पतंग की लहराहट में आकर्षण है!

सुशील कुमार छौक्कर July 18, 2008 3:42 PM  

अजी गजब ढा दिया। कुश का यू पतंग उडाना भा गया।

नीला आसमान July 18, 2008 4:28 PM  

कि प्यासी.. निढाल सी
हो चली थी.. वो पतंग
शाम की सर्द हवाओ में
कोयले सी जली थी..वो पतंग

lagat hey jesse ye har kissi ki ye roz ki kahani hey!!
NICE

नीरज गोस्वामी July 18, 2008 5:06 PM  

समीर जी की पोस्ट पर सटीक टिप्पणी की है आपने अपनी इस रचना के माध्यम से...बहुत खूब.
नीरज

Mired Mirage July 18, 2008 6:05 PM  

बहुत अच्छी रचना !
घुघूती बासूती

रश्मि प्रभा July 18, 2008 9:18 PM  

bahut achhi kahani lagi,......
waise about me me jo aapne likha hai,usne mujhe chamatkrit kiya.....

Udan Tashtari July 18, 2008 9:58 PM  

वाह!! बहुत कायदे से भाव उकेरे हैं-बेहतरीन. रचना पसंद आई. बधाई.

मीनाक्षी July 18, 2008 9:58 PM  

हमेशा की तरह संवेदना जगाती रचना...
यहाँ भी आप मात खा गए... पतंग को फिर लुटा हुआ कह गए....काला मांझा काल का दूत भी हो सकता है.... जीवन की डोर कभी तो टूटेगी..ऐसा क्यों न सोचा :(

Lavanyam - Antarman July 18, 2008 10:26 PM  

कुश रँगोभरी पतँग की मुक्त गगन पर उडान भरती कविता पढकर खुशी हुई
काले माँझेवाले का मुँह काला !! :)
- लावण्या

pallavi trivedi July 18, 2008 10:53 PM  

achchi lagi ye kavita....kale maanjhe se aapne kale man ke logon ko jodne ki koshish ki . lekin ant mein happy ending kyo nahi kiya kale maanjhe ko harakar. :)

Saee_K July 19, 2008 11:04 AM  

ek aur khoobsoorat rachana..jisme kai aur arth chhupe hai...

likhne le liye badhai...

likhte rahe..

rakhshanda July 19, 2008 11:55 AM  

थकि प्यासी.. निढाल सी
हो चली थी.. वो पतंग
शाम की सर्द हवाओ में
कोयले सी जली थी..वो पतंग

जिसके भरोसे ऊँची उड़ान भरी थी
वो डोर तो कब की टूट चुकी थी..
काले मॅन के मांझो की दुनिया में
एक और पतंग लुट चुकी थी...


बहुत सुंदर,क्या कहूँ,एक अलग अंदाज़ दिखाती हुयी....बहुत खूब

Priyesh July 19, 2008 2:08 PM  

:)
acchhi kavita !!!

Suresh Chandra Gupta July 20, 2008 12:59 PM  

बहुत अच्छी कविता है.

राज भाटिय़ा July 20, 2008 9:05 PM  

बहुत ही सुन्दर कविता हे,

shivraj gujar July 21, 2008 11:27 PM  

patang pasand aayee. khula aasman or umeedon ki udaan. kaale manjhe ka dar.phir bhi hawa main terane ka moh. bahut khoob. kush bhai. lage rahiye

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कुश
जयपुर, राजस्थान, India
इक रोज़ अचानक कुछ शब्द जमी पर गिर पड़े.. मैने उठाकर उन्हे जेब में रख लिया और चलता रहा.. सोचा किसी ज़रूरतमंद को दे दूँगा. . और दिए भी पर देखिए ना जितने दिए बढ़ते ही गये.. अब भी बढ़ते जा रहे है.. जब भी जेब से कुछ निकालता हू ये शब्द भी साथ आ जाते है.. कभी ग़ज़ल बन जाते है कभी नज़्म कभी कविता और कभी ना जाने क्या.. मैं क्या कहु अपने बारे में.. ये शब्द कभी मिलकर कुछ कह दे तो यहा लिख दूँगा.. तब तक के लिए इतना जान लीजिए की मैं कुश हू...बस एक खूबसूरत ख्याल
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