बा'रा'त निकली है... तो दूर तलक जायेगी...

जिसने लाईफ में बारात अटैंड नहीं की है उसने कही बैठकर झक ही मारा है.. बारातो में झूमकर ठुमके लगाने का अपना ही एक अलग मज़ा है.. यु तो हर बारात में ही कुछ ना कुछ नया मिल जाता है... पर जो हर बारात में मिलता है वो बड़ा कमाल मिलता है.. और आप को यकीन नहीं होगा उस पर एक पोस्ट भी लिखी जा सकती है..


दुल्हे के बिना बारात कैसी.. ? घोड़े पर बैठा दूल्हा बारात का हिस्सा कभी नहीं होता वो बात अलग है कि बारात उसी की होती है.. हिसाब से उसको सबसे आगे चलना चाहिए पर वो बेचारा सबसे पीछे घोड़ी पर अपने नाते रिश्तेदारों के बच्चो को अपने पीछे बैठाये चुपचाप बर्दाश्त करता रहता है.. और लोग बाग़ भी कम नहीं है.. घोड़ी के पीछे ऐसे ऐसे मुस्टंडे बच्चे बिठा देते है.. कि घोड़ी ही बैठ जाए.. पर हाँ दूल्हा इसी बात से खुश हो जाता है कि चलो जनरेटर वाला तो उसके पीछे है..

दुल्हे के पिताजी अपने चेहरे पर मिलेजुले भाव लिए सफारी सूट पहने हाथ में काला बैग लिए मिल जाते है.. दुल्हे की माताजी अपने खराब गले और ढेर सारी जेवेलरी के साथ भीड़ में ही कही मिल जाती है.. दुल्हे की बहन अपनी हम उम्र दो चार बहनों के साथ बार बार कुछ गानों की फरमाइश करती है.. पर दुल्हे का भाई अपने दोस्तों के साथ आठवी बार "देश है वीर जवानों का.." बजवा कर नाच रहा होता है.. और आस पास कुछ बाराती नाचने की मासूम अभिलाषा लिए इसलिए खड़े होते है कि उन्हें कोई जबरदस्ती लेकर जाए और वो भी दो चार ठुमके लगा ले..

थोडी ही देर में जीजाजी आकर बनारस वाले मामाजी को बीच में ले आते है.. मन होने के बावजूद मामाजी ना ना करते हुए आ ही जाते है.. फिर तो फूफाजी जी और चाचा जी भी जोश में.. हर बारात में एक व्यक्ति ऐसा होता है जो नागिन वाला डांस करता है.. और दूसरा रुमाल से बीन बनाकर बीन बजाता है.. इनमे से एक पतंग भी उड़ाता है.. और एक चाचा मामा या जीजाजी में से कोई ऐसे भी होते है जो महिलाओ वाला डांस भी करते है.. ऐसा करके महिलाओ में तो उनकी इज्जत बढ़ जाती है.. पर नहीं नाचने वाले दुसरे चाचा मामा या जीजाजी में से कोई उन्हें किसी और नाम से अलंकृत कर देते है..

सड़क पर सांडो की तरह खुले आम नाचते हुए लोगो के बीच में हाथ में बीस का नोट लिए एक शख्स एंट्री लेता है.. और अपने हाथ को अधिकतम ऊंचाई पर ले जाता है.. बैंड वालो में से एक जो काफी देर से बाजा बजा रहा है.. वो बाजे में फूंक मारते मारते ही नोट लेने के लिए हाथ उठाता है.. जो भाईसाहब नोट उठाये खड़े है वो अपना हाथ और ऊपर उठाते है.. ये जानते हुए भी कि इस फ़ालतू नाटक के बाद नोट बैंड वाले के पास चला जाएगा.. सब उत्सुकतावश देखते रहते है कि बैंड वाला नोट कैसे लेता है.. ?

इतने में दुल्हे का जवान भाई सड़क को अपने बाप का माल समझ कर बैंड वालो को अगले चौराहे पर रुकने का फरमान सुनाता है.. पिछली बारात में हुई ठुकाई को याद रखते हुए बैंड वाला चौराहे पर बैंड रोककर "जिमी जिमी आजा आजा.." बजाने लग जाता है.. और बाहर जाम में फंसे लोगो को भीड़ में से कुछ उठे हुए हाथो में हलचल दिखाई देती है.. हालाँकि बारातियों में से एक भाईसाहब ऐसे भी होते है जो बारातियों को साईड में धक्के दे देकर ट्रैफिक सँभालने में लग जाते है..

पर जो सँभालने से संभल जाए वो बारात ही क्या.. ?

आत्मनिर्भर बैंडवाले के एक एक कदम अपनी मर्ज़ी से आगे बढ़ जाने की वजह से बारात भी बढती जाती है.. कुछ लोग जिनका बारात में जाना मजबूरी है पर वापस लौटने के लिए अपनी गाडी होना भी जरुरी, वो लोग हर थोडी दूर आगे अपना स्कूटर खड़ा करके वापस आते है.. ऐसे लोगो को (जो जबरदस्ती बारात में है) आप जेब में हाथ डाले हुए देख सकते है.. अमूमन ये बारात में सबसे आगे या फिर सबसे साईड में होते है..

जब बारहवी बार छोटी बहन फरमाइश करती है और भाई की शर्ट पसीने में डूब जाती है तो बहने चार्ज संभाल लेती है.. इसी टाईम पे भाभी चाची और मामी भी अपना हुनर दिखाने आ जाती है.. सड़क के बीचो बीच लोगो को अपनी छुपी हुई प्रतिभा दिखाने का सुनहरा अवसर मिल जाता है.. और मामी जी के नाच शुरू करते ही कुछ एलिमेंट्स मामाजी को ढूँढने लग जाते है.. मामाजी को ये एलिमेंट्स तब खीच कर ले आते है जब वे मामीजी का डांस बड़े चाव से देखते हुए अपने जीजाजी पर नज़र रखे होते है..

मामाजी के आते ही मामीजी का एक्साईटमेन्ट डबल हो जाता है.. वो और तेज़ डांस करती है.. जीजाजी पर नज़र रखे हुए मामाजी, दोनों हाथ उठाकर नाचने लग जाते है.. पास खड़े नानाजी यानि उनके ससुर जी अपने खानदान के चश्मो चिराग और इकलौती बहु के नाच की मन ही मन तारीफ़ करके आगे कट लेते है..

इतने में पास से एक और बारात निकलती है.. अब देखिये साहब..! दोनों बारातो में ब्रूसली की आत्मा घुस जाती है.. जोर जोर से नाचने लग जाते है.. बैंड वालो को भी जोश आ जाता है.. बाजे वाला बाजा फूंक फूंक के अपनी जान देने पर ऐसे उतारू हो जाता है जैसे ऊपर समस्त देवता गण हाथो में फूल लिए उस पर बरसाने को तैयार खड़ेहो..

इसी बीच कई ऐसे लोग जो बाकियों पर रौब जमाना चाहते है.. बार बार आकर पैसे लुटाते रहते है.. पैसो के चक्कर में बैंड वाले लाईट वालो के तारो में उलझकर गिर पड़ते है.. दुल्हे को छोड़ घोड़ी वाला भी अपना हिस्सा लेने आ जाता है.. ढोल वाले और लाईट वाले तो खैर उलझते ही है..

ये जानते हुए भी कि अगर इन हरामखोरो को पता चल गया कि हम धीरे धीरे आगे बढ़ रहे है तो टाँगे टूट जायेगी, बैंड वाले जान जोखिम में डालके आगे बढ़ते रहते है.. क्योंकि इस बारात को ठिकाने लगाने के बाद उन्हें एक और को निपटाना होता है.. वैसे ये अकेले नहीं होते इनका साथ देने में ताऊजी फूफाजी टाइप लोग होते है जो बार बार थोडा आगे थोडा आगे कहकर बारात बढ़ाते रहते है..

बारात बढती रहती है.. नोट हवाओ में उठते रहते है. .ठुमके लगते रहते है.. फोटोस खींचती रहती है.. दूल्हा पकता रहता है.. और बारात आगे बढती रहती है..

: खैर ये तो हुआ हमारा देखना.. कुछ छूट गया हो तो आप भी बता दीजिये..


बेचारी महफ़िल.. कुछ ऐसी लुटी..

महफ़िल पूरे शबाब पर है.. गुमनाम से शायर अपनी ठोडी पर कलम टिकाये बैठे है.. उनका उल्टा पांव सीधे पांव पर पड़ा है.. और नज़र नामचीन लोगो पर..
नामचीन लोगो के शेरो पर गुस्ताख लोग तालिया पीट रहे है.. गुमनाम शायर ने पान की पीक थूकते हुए कहा है... नामुराद..!  सब के सब..

और फिर उल्टे पांव पर सीधा पांव रखकर दोबारा बैठ गया.. नामचीन ने अपने आगे पड़ी प्लेट से पान उठाकर मुंह में ठूंसा.. दोनों होंट भड़कते तंदूर से लाल हो चुके है.. पता नहीं अन्दर से जो निकलेगा वो पचाने लायक होगा या नहीं.. गुमनाम की बैचेनी बढ़ रही है.. उसने टाँगे बदल ली है.. गोया टाँगे नहीं किसी जाहिल का ईमान हो..   

हो गए उनके आगे बेनकाब.. जिनसे पर्दादारी थी..
पीट गए सब सरे राह.. जिनसे भी उधारी थी...

हिम्मत तो देखिये.. फिर से खड़े हो गए पैरो पर..
ऐसे मामलो की तो.. पहले से ही तैयारी थी...  

वाह! क्या शेर दहाडा है.. पास बैठे एक और नामचीन ने कहा.. बहुत ही कातिल शेर.. शुभानल्लाह!!

गुमनाम ने पांव की जगह फिर बदल ली.. और इस बार ना मुराद से पहले 'साले' भी लगा दिया... तो शब्द कुछ यु बना.. साले नामुराद!   

रात भर जब नामचीन लोग.. शेर दहाड़ दहाड़ के ढीले हो गए तो किसी ने गुमनाम को आवाज़ मार दी.. गुमनाम फुर्ती से चप्पल उतार कर स्टेज पर चढ़ गए.. नामचीन लोग उसी बेलन के आकार वाले तकिये का सहारा लेकर बैठ गए जिनसे घरो में रोटिया बनायीं जाती है..  गुमनाम ने प्लेट में देखा पान बचे नहीं थी.. मगर लाल लाल कत्था जरुर उन्हें घूर रहा था.. गुमनाम ने भी बदतमीजी करने में देर ना लगाते हुए एक शेर ठोंक डाला..

गुजारते है जो.. ज़िन्दगी अपनी उधारो में.. 
पिट जाते है युही.. सरे आम बाजारों में...

छोटे मोटे जख्मो से कोई फर्क नहीं पड़ता उनको
बदन पर ऐसे टुच्चे निशान तो होंगे हजारो में...

वाह वाह हुज़ूर ये होता है शेर.. क्या तो दहाडा है.. भई माशाल्लाह.. शुभानल्लाह!! ... गुस्ताख लोगो ने शेर की जम कर तारीफ़ कर दी..

नामचीन ने अपने पीछे से वही बेलन के आकार का तकिया हटाया और उल्टे हाथ की तरफ करवट लेकर बोले.. नामुराद!  सब के सब..
फिर तो बस दहाड़ पे दहाड़ और करवट पे करवट.. करवट पे करवट और दहाड़ पे दहाड़.... इधर दहाड़ उधर करवट.. उधर करवट इधर दहाड़..  

बस फिर क्या होना था..? बची रात में जब तक शमा में तेल डाल डालकर जलाना मुनासिब था.. जलाया गया.. गुमनाम को नाम मिल चुका था.. वो शेर पे शेर दहाड़ रहा था... नामचीन ने नामुराद के आगे ऐसे ऐसे शब्द जोड़े  कि.. साला तो फिर भी छोटा लग रहा था..

शेरो की कुछ इसी तरह की दहाडो से पहले नामचीनों ने और फिर गुमनामो ने सारी की सारी महफ़िल लूट ली..



About Me

My Photo
कुश
जयपुर, राजस्थान, India
खुद को ढूँढने की कोशिश में कितने ही थानों पर अपनी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा चुका हूँ.. भूली हुई याददाश्त साथ लेकर जितना जिया जा सकता है उस से थोडा सा ज्यादा जी रहा हूँ.. ईश्वर की बनायीं दुनिया से अभी तक विश्वास उठा नहीं है.. इसलिए अभी तक यही पड़ा हूँ.. बर्दाश्त की हद से थोडा ज्यादा बर्दाश्त कर लेता हूँ.. गुलज़ार को समझने की कोशिश जारी है.. अनुराग जैसा सिनेमा बना लु तो कुछ सुकून मिले.. दोस्तों की फेहरिस्त लम्बी है.. पसंदीदा फिल्मो की फेहरिस्त लम्बी है, क्या कहूँ साला यहाँ ख्वाहिशो की फेहरिस्त लम्बी है.. यहाँ वहां जब कही कुछ बात नहीं बनी तो ब्लॉग बना लिया..देखते है इस से अब कब तक बनती है..
View my complete profile

Recent Posts

RSS Feed

Enter your email address:

Blog Archive

Followers

Search

My Blog List