उछालता कोई मुझे तो..



उछालता कोई मुझे तो
खिलखिला देती...
मुस्कुराता कोई तो
पलकें हिला देती..

पूछता कोई जो कुछ
जवाब आँखें हिला कर देती..
गोद मैं उठाता कोई तो
उसे गीला कर देती..

डाँटता कोई मुझे तो
झटमूट् रोती..
आती जब नींद तो
माँ की गोद में सोती..

मम्मी की पहन साड़ी
श्रृंगार मैं करती..
आ जाए ना कोई कमरे में
इस बात से डरती...

दादा को पकड़ कर
घोड़ा मैं बनाती..
ज़्यादा तो नही पर
खाना, थोड़ा मैं बनाती..

होती जब बरसात
ख़ूब मैं नहाती..
काग़ज़ की कश्तिया
पानी में बहाती..

फिर बड़ी हो जाती और
झूलती झूलो पे..
बन जाती तितली कोई और
घूमती फूलो पे...

सोमवार की पूजा के
फूल मैं चुनती..
आएगा कोई जो
उसके ख्वाब मैं बुनती..

ले जाता मुझे कोई
डोली में बिठाकर..
पलकों की छाओ में
आँखो में लिटाकार...

अपना फिर छोटा सा
परिवार मैं बनाती..
खशियो से सज़ा सा
संसार बसाती..

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....

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हर बारिश की अपनी एक अलग कहानी है..

अभी बाहर बारिश हो रही है.. हाथ की बोर्ड पर टक टक कर रहे है.. नज़रे खिड़की पर जमा है.. और मन है कि सोच रहा है एक फर्लांग भर कर सीधा सड़क पर पहुँच जाए और बारिश में दो चार ठुमके लगा ले.. ये बारिशे भी कितनी जालिम होती है.. हमेशा तब आती है जब आप बहुत बिजी होते है.. पर सब काम छोड़कर भीगे ही नहीं तो फिर बारिश कैसी ? बारिश का अपना रुल है.. या तो भीग जाओ या भाग जाओ..


वैसे हर बारिश की अपनी एक अलग कहानी है.. बचपन में स्कूल से लौटते वक़्त बारिश आ जाये तो किसी पेड़ के नीचे गीले होकर दांत बजाते हुए सहमे खड़े रहते थे.. पास में ही पड़ी गीली मिट्टी की महक मौसम को और लजीज बना देती..

घर में जहाँ तहा कमरे में कटोरे रखे मिलते.. बारिश में हर हिन्दुस्तानी की तरह अपनी भी छत टपकती थी.. फिर वो घर ही क्या जहा कभी छत से पानी न टपका हो..

हम तो खिसक लेते पुरानी निकर और बनियान पहनकर.. कागज़ की किश्तियों में कौन मेहनत करे इसलिए चप्पल ही पानी में बहा देते.. एक दो बार तो चप्पल की किस्मत भी टाइटैनिक सी निकली.. घर जाके अपने एक चौथाई दांत दिखा के बच गए थे.. वरना हाल तो अपना भी टाइटैनिक सा होना था..

बारिश में बिजली का जाना तो राजमे और चावल के साथ जैसा है.. जैसे ही बिजली जाती.. मोहल्ले के हर घर से चिल्लाने की आवाज़ आती.. बिना ब्लूटूथ के सब एक दुसरे से कनेक्टेड से लगते..

इतने सालो से कितनी ही बारिशे आई और गयी पर पकोडियो का दौर रुका नहीं.. जोधपुर के गरमा गरम मिर्ची बडो के लिए तो कत्ले आम हो जाता है.. चाय पे चाय चलती है.. खिड़की के नीचे हार्न बजता है और आवाज़ आती है "अबे बारिश हो रही है और तू घर में बैठा है.." छतो पर चढ़कर सब तेरी वाली मेरी वाली करते है.. बस शेल्टर के नीचे खड़े लोग खुद को खुशनसीब समझते है.. रिक्शे वाले अपनी बीडी सुलगा कर रिक्शे में बैठ जाते है.. कोलेज की लड़किया सड़क पर जमा पानी से छलांगे मार मार कर आगे बढती है.. कार के वाइपर्स की कामचोरी करने से लोग हाथ बाहर निकालकर रुमाल से कांच साफ़ करते है.. बिना हेलमेट लोग धड़ल्ले से गाडी चला रहे है.. पुलिस वाले भी केबिन में है.. आज तो बारिश हो रही है ना.. सबको छूट है..


चलते चलते
रिक्शा
बाहर उल्टा पड़ा है.. घर में तवे का भी यही हाल है... किसनू सोच रहा है बारिश रुक जाये तो चूल्हा चालु हो... बंटी बालकनी में आ चुका है.. खुश हो रहा है.. ट्यूशन से छुट्टी..! हे भगवान ये बारिश ऐसे ही होती रहे..

कहा ना मैंने.. हर बारिश की अपनी अलग कहानी है..

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कुश
जयपुर, राजस्थान, India
इक रोज़ अचानक कुछ शब्द जमी पर गिर पड़े.. मैने उठाकर उन्हे जेब में रख लिया और चलता रहा.. सोचा किसी ज़रूरतमंद को दे दूँगा. . और दिए भी पर देखिए ना जितने दिए बढ़ते ही गये.. अब भी बढ़ते जा रहे है.. जब भी जेब से कुछ निकालता हू ये शब्द भी साथ आ जाते है.. कभी ग़ज़ल बन जाते है कभी नज़्म कभी कविता और कभी ना जाने क्या.. मैं क्या कहु अपने बारे में.. ये शब्द कभी मिलकर कुछ कह दे तो यहा लिख दूँगा.. तब तक के लिए इतना जान लीजिए की मैं कुश हू...बस एक खूबसूरत ख्याल
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