ज़िंदगी अब पुरानी जीन्स लगती है..

तारीख १३ अक्टूबर २००५ समय शामबजे

मैंने पापा के कमरे में जाकर कहा जयपुर जा रहा हूँ.. अब वही जॉब करूँगा..
पापा ने पुछा कब ?
मैंने कहा अभी .३० बजे की ट्रेन है..

मेरे दोस्त मुझे छोड़ने आये थे ट्रेन चल चुकी थी मैं अपने दोस्तों के साथ भाग रहा था प्लेटफोर्म पर.. वो ट्रेन एक स्टेबिलिटी थी.. आखिर पकड़ में ही गयी.. शहर बदला.. लोग बदले.. माहौल बदला.. मुझे लगा अब कुछ बदलेगा.. और बदला भी..


अब देर रात जब घर आता हूँ तो जूते पहने हुए ही आता हूँ.. पहले तो गेट के बाहर जूते उतार कर धीरे धीरे दरवाजा खोलकर अन्दर आता था जैसे ही अन्दर घुसता.. मम्मी की आवाज़ आती.. गया तू .. इतनी देर कहाँ लगायी? अब तक का रिकोर्ड है मम्मी का, कभी ऐसा नहीं हुआ कि मेरे आने से पहले मम्मी सोयी हो.. इतने कम डेसिबल की आवाज़ सुनने की खूबी प्रक्रति ने सिर्फ मांओं को ही दी है..


मेरी आदत थी रात को गाने सुनते हुए सोता था.. मैं गाने चलाकर छोड़ देता था सुबह मुझे म्यूजिक सिस्टम ऑफ़ मिलता.. आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि सुबह उठने के बाद मुझे म्यूजिक सिस्टम बंद करना पड़े.. अब रात को टी वी चलाते ही सबसे पहले उसमे टाइमर लगाता हूँ.. कहते है बच्चे घर को रौशन रखते है क्योंकि वो घर की बत्तिया बुझाना भूल जाते है..


ये सब्जी मुझे अच्छी नहीं लगती मैं नहीं खाऊँगा.. और मम्मी दूसरी सब्जी बना देती थी.. और अब अगर चावल कच्चे भी हो तो मैं खा लेता हूँ सोचता हु इतनी गर्मी में दोबोरा कौन एक सी टी और लगायेगा.. झंकार बीट्स फ़िल्म का एक डायलोग है... ' दुनिया गोल है और हर पाप का एक डबल रोल है '


मम्मी के खाना बनाते वक़्त मैंने कभी मम्मी के सर पर जमी पसीने की बूंदों पर गौर नहीं किया.. सोचता हूँ कितनी बार मैंने कहा होगा खाना अच्छा नहीं बना.. कितनी बार मैंने थाली में खाना छोडा होगा.. अब मम्मी तो खाना बनाती नहीं है पर जब भी घर जाता हूँ भाभी के बनाये खाने की जम कर तारीफ़ करता हूँ.. मैं उनके लिए इतना तो कर ही सकता हूँ..


बहुत कुछ बदल गया है आस पास की जिन लड़कियों के साथ बचपन में खेलते थे अब उनसे बात करना तो दूर सामने देख पाना भी नहीं होता.. सो कोल्ड सोशल वेल्यु की गर्माहट दोस्ती को पिघला देती है..


और भी तो बहुत कुछ बदला है.. अब बरसातो में बाईक उठाकर झरनों पर नहीं जाते... अब रात को प्लान बनाकर सुबह शहर से बाहर घूमने नहीं जाते.. अब सब पैसे इकट्ठे करके क्रिकेट की बोंल नहीं लेकर आते.. अब दोस्तों से गानों की केसेट्स और कोमिक्स एक्सचेंज नहीं की जाती.. अब चाय की थडी पर दो की तीन नही होती...


अब सचिन के सिक्सर पर दोस्त लोग एक साथ उछलते नहीं है.. अब होसटलर्स दोस्तों के कमरों में गर्ल फ्रेंड्स के दिए गिफ्ट नहीं रखे जाते.. अब दोस्तों के लिए होकीया नहीं निकाली जाती.. अब गली की सबसे खडूस आंटी से बोंल के लिए झगडा नहीं होता है.. अब एक ही दोस्त का साल में तीन बार बर्थडे नहीं होता.. अब कोई ' तेरी भाभी है ' नहीं बोलता.. अब तीन बार फोन की घंटी बजना कोडवर्ड नहीं होता.. अब केल्शियम का एटोमिक नंबर याद करने में रात नहीं गुजारनी पड़ती है..

बहुत कुछ तो है जो अब नही होता..


अनुराग जी से स्टाइल उधार लेते हुए एक त्रिवेणी..


"ख़ुशी का, खुमार का, थोड़े से प्यार का
एक एक कर सारे रंग छूट गये..

ज़िंदगी अब पुरानी जीन्स लगती है.."

49 comments:

मोहिन्दर कुमार April 23, 2009 1:06 PM  

जिन्दगी पुरानी जीन्स सही.. मगर आज इसका रिवाज है.. घुटनो से फ़ाड लीजिये. पौंचो से धागे निकाल लीजिये.. नई हो जायेगी..

आपकी कहानी पढ कर गजल का एक शेर याद आ गया.

जिन्दगी जिसे कहते हैं.. जादू का खिलौना है
मिल जाये तो माटी है... खो जाये तो सोना है

अच्छी कहानी और अच्छी त्रिवेणी पढवाने के लिये आभार

दिगम्बर नासवा April 23, 2009 1:12 PM  

"ख़ुशी का, खुमार का, थोड़े से प्यार का
एक एक कर सारे रंग छूट गये..

ज़िंदगी अब पुरानी जीन्स लगती है.."

वाह............कितनी बातें, कितनी रातें, और कितने एहसास समय की चादर उघाड़ कर याद करा दिए आपकी इस कहानी ने..................समय वाकई किसी पुरानी जीन की तरह औ भी अच्छा लगता है

dhiru singh {धीरू सिंह} April 23, 2009 1:21 PM  

और जींस जितनी पुरानी और उधडी हो उतनी ही सेक्सी [?] लगती है .

अभिषेक ओझा April 23, 2009 1:33 PM  
This comment has been removed by the author.
ताऊ रामपुरिया April 23, 2009 1:34 PM  

अब तक का रिकोर्ड है मम्मी का, कभी ऐसा नहीं हुआ कि मेरे आने से पहले मम्मी सोयी हो.. इतने कम डेसिबल की आवाज़ सुनने की खूबी प्रक्रति ने सिर्फ मांओं को ही दी है..

बहुत ही लाजवाब पोस्ट. लगता है जैसे हमको बचपन मे पहुंचा दिया...या..हमे अपने बच्चों का बचपन याद दिला दिया...बस क्या कहूं इस पोस्ट के लिये. तारीफ़ के लिये शब्द नही हैं. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

अभिषेक ओझा April 23, 2009 1:34 PM  

कितनी भी सेक्सी हो... हम तो इस पुरानी जींस को देखकर सेंटी हो गए ! इतना सेंटी नहीं मारा करते आँखे नम हो जाती हैं.

डॉ .अनुराग April 23, 2009 1:40 PM  

हमें तो पुरानी जींस पहनने का शौंक है भाई.....इसलिए तो कई बार उस गली मोहल्ले में भी झांक आते है ....सोचो ऐसा ही कोई "बचपन का प्यार "अचानक अपने दो बच्चो के साथ आपको दिखाने आ जाये तो ..

वैसे मुझे कल पोस्ट करना था पर फुर्सत देर से हुई......

अनिल कान्त : April 23, 2009 1:45 PM  

कुछ बातें अभी भी उस बंद कमरें में बिस्तर के दरमियाँ पड़ी हैं ....जो तकिया लगाये फ़ोन पर किया करते थे कभी .....चन्द मुलाकातें जहाँ में बसी हैं जो मिलकर आये थे कभी .....

हाँ यही तो है जीवन ....यादें याद आती हैं .....कभी पुराणी जींस बनकर तो कभी कोई और रूप लेकर

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi April 23, 2009 2:19 PM  

खाने का महत्‍व तभी समझ में आ सकता है जब वह हमें मिलना बंद हो जाए। मां लगातार इतना अच्‍छा खाना खिलाती रहती है कि हमें लगता है यह तो हमारा नैसर्गिक अधिकार है। जब एक दिन वे नहीं बनाती तो समझ में आता है कि कुछ छूट गया है पीछे।

kumararya1111 April 23, 2009 2:31 PM  

शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जो आपकी पोस्ट को पढ़ कर अपने अतीत में न पहुँचा हो, बहूत दर्द होता है जब ये सब यादे आती हैं, आपने तो बीती हुई जिंदगी का कोई भी पन्ना नही छोड़ा.........बहूत ही मार्मिक पोस्ट है, धन्यवाद ..( अशोक, सौदिअरब से)

अल्पना वर्मा April 23, 2009 3:11 PM  

"ख़ुशी का, खुमार का, थोड़े से प्यार का
एक एक कर सारे रंग छूट गये..

ज़िंदगी अब पुरानी जीन्स लगती है.."

बहुत खूबसूरत त्रिवेणी!
बहुत कुछ समय के साथ बदल जाता है..फिर भी छोड़ आये हम वो गलियां 'कह देने से कुछ छूटता नहीं है..
यादें उन सब से जोड़े रखती ही हैं.


और हाँ ,फ्लोरेस्सेंट galaxi मैं ले आऊंगी आप के लिए गिफ्ट में...:)

सुशील कुमार छौक्कर April 23, 2009 3:20 PM  

वाह कुश भाई तुसी छा गए।
अब कोई कोड वर्ड में लव लेटर नही लिखता है। अब कोई साईकिल से रेस नही लगाता। अब कोई गिल्ली डडा नही खेलता। अब कोई कंच्चे नही खेलता। अब कोई आइस पाईस नही खेलता...........
कुश भाई दिल खुश हो गया। वैसे अनुराग जी भी सही फरमा रहे है। कुश भाई पुराने दिन इतने प्यारे क्यों होते है?

लवली कुमारी / Lovely kumari April 23, 2009 3:59 PM  

वक्त का वो टुकडा हर किसी की जिंदगी में ऐसा ही होता होगा न ..

संगीता पुरी April 23, 2009 4:06 PM  

सुंदर यादें पुराने दिनों की .. बहुत बढिया लिखा ।

रंजना [रंजू भाटिया] April 23, 2009 4:23 PM  

पुरानी जींस और गिटार तो सुबह से मैं गुनगुना रही थी और लिख दिए वो पल कुश जी आपने :) कुछ चीजो को अहमियत बाद में पता चलती है और उस में सबसे पहले माँ का लाड -दुलार और ख्याल ही आता है ..मैं भी अपनी दोनों पुत्रियों को यही ज्ञान बांटती रहती हूँ ...कि माँ की अहमियत बाद में पता चलेगी तुम्हे :) खैर यादे यही तो सुहानी है जी .जो यूँ गिटार के तारों सी झनझना जाती है जहन को ....वैसे तुम्हारी इस पोस्ट का ओरा यह कह रहा है कि तुम्हे घर की बहुत याद सता रही है .:)

poemsnpuja April 23, 2009 4:30 PM  

uff....kya likha hai kush, kuch vaakaye sabki jindagi me ek se hi aate hain, aur shayad kuch hi palon ke liye bhi.
triveni behad pasand aayi mujhe, mang kar rakh lene ko jee chaahta hai.

Arvind Mishra April 23, 2009 4:55 PM  

oh !very touching !

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) April 23, 2009 5:05 PM  

"ख़ुशी का, खुमार का, थोड़े से प्यार का
एक एक कर सारे रंग छूट गये..

ज़िंदगी अब पुरानी जीन्स लगती है.."

बहुत खूब.. बहुत अच्छा लिखा आपने

Anil April 23, 2009 5:12 PM  

बचपन में मैं पड़ोस की छोटी-सी मार्केट में विडियो गेम की दुकान पर जाकर घंटों खड़ा रहता था - स्क्रीन पर तरह-तरह के रंग, और तरह-तरह की आवाजें निकलतीं थीं। पूरा दिन कैसे बीत जाता था पता ही नहीं चलता था। लेकिन आज कंप्यूटर पर हर तरह के नये-नवेले गेम्स आ गये हैं, थोड़ा-बहुत खेलता भी हूँ, लेकिन वो बात नहीं!

मीनाक्षी April 23, 2009 5:50 PM  

अतीत की इतनी मीठी यादें लिख डाली...
लेकिन वह सब अब क्यो नही होता.... इस का जवाब भी आपके पास है... कभी फुर्सत मे वह लिखिएगा..

परमजीत बाली April 23, 2009 8:52 PM  

बहुत बढिया पोस्ट।बहुत अच्छी लगी।

Syed Akbar April 23, 2009 9:19 PM  

लड़कपन का वो पहला प्यार
वो लिखना हाथों पे
A + R
वो खिड़की से झांकना
वो लिखना लेटर
उन्हें बार बार
वो देना तोहफे में
सोने की बालियाँ
वो लेना दोस्तों से
पैसे उधार........


पुरानी यादें ताजा कर दी आपने

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey April 23, 2009 10:06 PM  

रुमाल पास में न था। कुर्ते की बांहों का प्रयोग करना पड़ा आंखों की नमी पोंछने को।

Ratan Singh Shekhawat April 23, 2009 10:12 PM  

बहुत ही लाजवाब पोस्ट. लगता है जैसे हमको बचपन मे पहुंचा दिया...या..हमे अपने बच्चों का बचपन याद दिला दिया...बस क्या कहूं इस पोस्ट के लिये. तारीफ़ के लिये शब्द नही हैं. बहुत शुभकामनाएं.

हमारा भी सूर ताऊ के सूर् के साथ !

अनूप शुक्ल April 24, 2009 7:09 AM  

सुन्दर पोस्ट! आनन्दित हुये पढ़कर!

राधिका उमडे़कर बुधकर April 24, 2009 7:31 AM  

वाह कुश जी अद्भुत पोस्ट ,वाकई मैं भी सुबह सुबह जब रियाज़ को बैठती थी,माँ सुबह का नाश्ता फिर खाना मुझे मेरे संगीत कक्ष में ही दे जाती,पता था की मैं वहा से नहीं उठने वाली,आज भी जब रियाज़ करने बैठती हूँ तब जब खुद को खाना बनाने के लिए उठाना पड़ता हैं माँ की बहुत याद आती हैं ,उसके हाथ की गर्म गर्म रोटियों की सुगंध आज भी मुझे मेरे घर के संगीत कक्ष में भी आती हैं और आँखे अनायास ही भर आती हैं ,तब पहला फोन होता हैं माँ तुम्हारी याद आ रही हैं .

इस अच्छी सी पोस्ट के लिए आपको बधाई और आभार

Rohit Tripathi April 24, 2009 10:41 AM  

luvly post

जिन्दगी जिसे कहते हैं.. जादू का खिलौना है
मिल जाये तो माटी है... खो जाये तो सोना है

sach chizein pas to to unki koi kadra nahi aur door jate hi sabse kimti..

सौरभ शर्मा April 24, 2009 11:15 AM  

बहुत सुन्दर.... बहुत कुछ याद दिला दिया आपने ...

Dipti April 24, 2009 1:01 PM  

bahut hi khubasoorati se likha hai...
ghar se bahar rah kar mere anubhav bhi aapse hi hai...

ravi sharma April 24, 2009 1:04 PM  

यार, तुम्हारा पोस्ट पढ़ने में एक ही दिक्कत है. तुम इमोशनल कर देते हो.

Shiv Kumar Mishra April 24, 2009 3:16 PM  

क्या कहूँ? ये सिर्फ एक पोस्ट नहीं है कुश. केवल पोस्ट होती तो बधाई दे देता.

महामंत्री - तस्लीम April 24, 2009 3:21 PM  

जब जिंदगी का रोमांच खत्‍म हो जाए, तो ऐसा ही लगता है।

-----------
TSALIIM
SBAI

Udan Tashtari April 24, 2009 3:58 PM  

बहुत तसल्ली से दिल में आते जाते भावों को शब्दों का जामा पहनाया है..बहुत पसंअ आया:

ख़ुशी का, खुमार का, थोड़े से प्यार का
एक एक कर सारे रंग छूट गये..

ज़िंदगी अब पुरानी जीन्स लगती है.."


-त्रिवेणी असरदार और धारदार है.

बधाई.

Parul April 24, 2009 4:27 PM  

isiliye kahti huun..ab shahnaayi bajvaao :))..post aur triveni bahut acchhi hai..:)

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` April 24, 2009 8:59 PM  

कुश ....क्या कहूँ बहुत देर से पढी आपकी ये पोस्ट ..अगर छूट जाती तब कितना अफसोस होता बता नहीँ सकती -
आजकल नोआ जी मेरे पास हैँ :)
..
समय कम पड रहा है
और आज समय सार्थक हो गया !
आपकी माँ को मेरे प्रणाम कहना
और भाभी को तथा आपको स स्नेह, आशिष
-लावण्या

डॉ. मनोज मिश्र April 24, 2009 10:31 PM  

बहुत अच्छी और सुंदर शब्दों में निरूपित .

गौतम राजरिशी April 25, 2009 2:26 AM  

तुम्हारा लिखा पढ़ लेने के बाद कुछ कहना बड़ा मुश्किल-सा हो जाता है। देखो ना, कैसे आप से तुम पर आ गया हूँ। इन शब्दों को आदत होती है रिश्ता बना लेने की...जैसे डायरी के पन्नों को आदत होती है जिंदगी को फिर-फिर से पुरानी जीन्स पहनाने की...

उन्मुक्त April 25, 2009 6:54 AM  

मुझे भी अपना बचपन, अपनी मां याद आ गयी।

मुसाफिर जाट April 25, 2009 3:10 PM  

कहते है न बच्चे घर को रौशन रखते है क्योंकि वो घर की बत्तिया बुझाना भूल जाते है..
.
कुश जी, क्या लिख मारा है!!! सच, जिन्दगी अब पुरानी जींस लगती है.

kanchanc April 25, 2009 5:24 PM  

emotional kar rahe ho tum..???? gandi baat...!

M.A.Sharma "सेहर" April 25, 2009 6:55 PM  

माँ की ममता को कितने सहजता से उजागर कर दिया आपने
आज वो सब कुछ कितना याद आता है (nostalgic )

वैसे पुरानी जींस तो फैशन है शायद , नहीं क्या ??
या आप बहुत पुरानी जींस की बात कर रहे हैं :))P
Interesting !!!!

राजीव जैन Rajeev Jain April 27, 2009 12:39 PM  

गुरु तुस्‍सी तो छा गए

वैसे बचपन में लगता है कि जल्‍द बडे हो जाओ तो ये बंदिश खत्‍म हो


और अब ये बडा बनकर लगता है कि काश बचपन ही रहता जिंदगी भर !!

Aarjav April 28, 2009 10:19 AM  

बाते आपकी सही है , भाव सुन्दर है ! लेकिन जिन्दगी को देखने का यह अप्रोच अब पुराना हो गया है ! खैर , वैयक्तिक अनुभूतियों पर कोई प्रश्न नही उठा सकता लेकिन उन्मुक्त व जीवंत जीवन उम्र से ज्यादा व्यक्ति के चीजों के देखने के ढ़ग पर निर्भर करता है ! (अंतिम पैरा को विशेष रूप से ध्यान रख कर यह कह रहा हूँ !)

तरूश्री शर्मा April 28, 2009 11:41 AM  

सच है वक्त के गुजर जाने पर हम उसे याद करने में बढ़िया वक्त गुजारते हैं..... कभी होंठ खुद ब खुद खिंच जाते हैं और कभी आंखें कुछ नमी सी महसूस करती हैं। जब-जब वो वक्त भिंची मुट्ठियों की अंगुलियों के बीच की दरारों से निकलता है तो यूं ही कहीं कनखियां बिखेरती है, स्याही - कलम, कम्प्यूटर की बोर्ड- स्क्रीन या अपनों के कहकहों के बीच। बढ़िया पोस्ट कुश।

जितेन्द़ भगत April 28, 2009 4:06 PM  

पहले जैसा कुछ भी नहीं होता मगर यादें पीछा करती हैं
सही फरमाया आपने....

meeta May 3, 2009 12:35 PM  

kiski yaad aa rahi hai bhai!!!!!!!!!!!

गायत्री May 3, 2009 5:55 PM  

ख़ुशी का, खुमार का, थोड़े से प्यार का
एक एक कर सारे रंग छूट गये..

ज़िंदगी अब पुरानी जीन्स लगती है.."

bahut khoob Kush...nostalgia ka sundar samaa bandjha hai aapne....

नीरज गोस्वामी May 5, 2009 11:14 AM  

देर से आया...माफ़ी...लेकिन कमबख्त तुमने पुराने दिन फिर से याद करवा दिए...
नीरज

रंजन May 6, 2009 11:30 AM  

PD ने एक कविता बहुत पहले अपने ब्लोग पर लिखी थी...
"वो अछूत सी लगने वाली सब्जी,
भी अब खा लेता हूँ..
रात में अब चावल से भी
परहेज नहीं है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई अब पूछता नहीं,
की कहाँ जा रहे हो..
कोई अब पूछता नहीं
की किससे मिल के आ रहे हो..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ.."

यही भाव इस लेख में भी आ रहे हैं... बहुत जीवंत चित्रण.. हम सभी के पास कुछ ऐसी यादें होती है... खुब..

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वो बात कह ही दी जानी चाहिए कि जिसका कहा जाना मुकरर्र है..

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जयपुर, राजस्थान, India
खुद को ढूँढने की कोशिश में कितने ही थानों पर अपनी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा चुका हूँ.. भूली हुई याददाश्त साथ लेकर जितना जिया जा सकता है उस से थोडा सा ज्यादा जी रहा हूँ.. ईश्वर की बनायीं दुनिया से अभी तक विश्वास उठा नहीं है.. इसलिए अभी तक यही पड़ा हूँ.. बर्दाश्त की हद से थोडा ज्यादा बर्दाश्त कर लेता हूँ.. गुलज़ार को समझने की कोशिश जारी है.. अनुराग जैसा सिनेमा बना लु तो कुछ सुकून मिले.. दोस्तों की फेहरिस्त लम्बी है.. पसंदीदा फिल्मो की फेहरिस्त लम्बी है, क्या कहूँ साला यहाँ ख्वाहिशो की फेहरिस्त लम्बी है.. यहाँ वहां जब कही कुछ बात नहीं बनी तो ब्लॉग बना लिया..देखते है इस से अब कब तक बनती है..

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