उछालता कोई मुझे तो..



उछालता कोई मुझे तो
खिलखिला देती...
मुस्कुराता कोई तो
पलकें हिला देती..

पूछता कोई जो कुछ
जवाब आँखें हिला कर देती..
गोद मैं उठाता कोई तो
उसे गीला कर देती..

डाँटता कोई मुझे तो
झटमूट् रोती..
आती जब नींद तो
माँ की गोद में सोती..

मम्मी की पहन साड़ी
श्रींगार मैं करती..
आ जाए ना कोई कमरे में
इस बात से डरती...

दादा को पकड़ कर
घोड़ा मैं बनाती..
ज़्यादा तो नही पर
खाना, थोड़ा मैं बनाती..

होती जब बरसात
ख़ूब मैं नहाती..
काग़ज़ की कश्तिया
पानी में बहाती..

फिर बड़ी हो जाती और
झूलती झूलो पे..
बन जाती तितली कोई और
घूमती फूलो पे...

सोमवार की पूजा के
फूल मैं चुनती..
आएगा कोई जो
उसके ख्वाब मैं बुनती..

ले जाता मुझे कोई
डोली में बिठाकर..
पल्को की छाओ में
आँखो में लिटाकार...

अपना फिर छोटा सा
परिवार मैं बनाती..
खशियो से सज़ा सा
संसार बसाती..

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....

-------------------

22 comments:

अल्पना वर्मा April 28, 2008 10:51 AM  

अच्छी प्रस्तुति.
अन्तिम पंक्तियाँ कविता का सारा सार समेटे हुए हैं.
विषय नया नहीं मगर चिंतन जारी रखना ही होगा जब तक 'भ्रूण हत्या जैसी समस्या सुलझती नहीं है.
कविता जागरूकता लाने का माध्यम है.आप की कविता इस ओर एक अच्छा प्रयास है.बधाई.

Parul April 28, 2008 11:12 AM  

वाह! जियो--

mehek April 28, 2008 11:18 AM  

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....
sach satya hai,kash wo janam leti ya koi lene deta,kash uske sapne bhi sach hobahut gehre bhav se bhari kavita,sahi hai jab tak bhrun hatya na ruke ,mashal jalakar hi rakhni hogi.bahut badhai.

राजीव रंजन प्रसाद April 28, 2008 11:35 AM  

आरंभ से ही संवेदित करती कविता अंत में पलकें नम कर देती है..बेहद मर्मस्पर्शी।

*** राजीव रंजन प्रसाद

अभिषेक ओझा April 28, 2008 11:58 AM  

बहुत अच्छी कविता... शुरुआत में जितनी मनोहर थी बाद में उतनी ही संवेदनशील.. !

mamta April 28, 2008 11:58 AM  

आपकी आज की कविता बिल्कुल आपके नाम के अनुरूप है एक बहुत ही खूबसूरत कविता।

Abhijit April 28, 2008 12:34 PM  

ek gahan samajik samasya par bahut asardar kathan...kavi apne samaj ka aaina hota hai, is kathan ka satya aisi kavitaon ko padhne se pata chalta hai

TAEER April 28, 2008 12:44 PM  

bahot hi pyari kavita...ek sandesh ke saath...

rakhshanda April 28, 2008 12:57 PM  

बहुत सुंदर,लेकिन एक गहरे दर्द में लिपटी हुयी,

DR.ANURAG ARYA April 28, 2008 6:11 PM  

होती जब बरसात
ख़ूब मैं नहाती..
काग़ज़ की कश्तिया
पानी में बहाती..

फिर बड़ी हो जाती और
झूलती झूलो पे..
बन जाती तितली कोई और
घूमती फूलो पे...


मेरा सपना है एक नन्ही सी परी का ....पता नही पुरा होगा या नही पर ये कविता कही गहरे तक उतर गई......

Udan Tashtari April 28, 2008 10:26 PM  

वाह!! बहुत उम्दा!

Lavanyam - Antarman April 29, 2008 1:08 AM  

बहुत मुकम्मिल सोच से लिखते हैँ आप ...
लिखते रहीये यूँ ही ...
स्नेह्,
- लावण्या

pallavi trivedi April 29, 2008 1:48 PM  

कुश....शब्द नहीं हैं इस कविता के लिए! बहुत गहरे तक छू गयी!

Saee_K April 29, 2008 2:14 PM  

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....

sach ko bhi khoobsoorati se darshaya gaya hai, love to see you progressing as a poet..

likhte rahe..

रंजू April 29, 2008 3:33 PM  

अपना फिर छोटा सा
परिवार मैं बनाती..
खशियो से सज़ा सा
संसार बसाती..

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....

दिल को छु लेने वाले भाव पूर्ण संवेदन शील रचना है जी बहुत कुछ कह गई है

कुश एक खूबसूरत ख्याल April 29, 2008 4:00 PM  

आप सभी की स्नेहिल प्रतिक्रियाओ का धन्यवाद.. आपके शब्द मेरे सर आँखो पर...

Poonam Agrawal April 29, 2008 8:16 PM  

gar maa teri kokh se janam main leti....
Khubsurst soch ke liye aap badhai ke patra hai..
isi soch ko maine bhee shabdon mein piroyaa hai...
(gar ahvahan karun chand kaa)
Padiyega jaroor...

Neelima G April 29, 2008 8:44 PM  

Hii, read ur blog for the first time. Its good. Keep it up n do keep reading whtever nonsense i write on my blog also.

Neelima

कुश एक खूबसूरत ख्याल April 30, 2008 9:01 AM  

पूनम जी और नीलिमा जी..
बहुत बहुत धन्यवाद आपकी प्रतिक्रियाओ के लिए..

rohitler April 30, 2008 11:10 AM  

क्या बात है!

आखरी 4 लाइनों में गुलज़ार साहब का टच है.....
बेहद खूबसूरत

apurn April 30, 2008 12:07 PM  

aaj pahli baar main aap ka blog dekh raha hoon aur pahli he kavita ne dil ko chhoo liya
bahut bahut aur bahut he sunder

सागर नाहर April 30, 2008 7:14 PM  

दिल को छू लेने वाली पंक्तिया.. बहुत अच्छी लगी यह कविता।

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कुश
जयपुर, राजस्थान, India
इक रोज़ अचानक कुछ शब्द जमी पर गिर पड़े.. मैने उठाकर उन्हे जेब में रख लिया और चलता रहा.. सोचा किसी ज़रूरतमंद को दे दूँगा. . और दिए भी पर देखिए ना जितने दिए बढ़ते ही गये.. अब भी बढ़ते जा रहे है.. जब भी जेब से कुछ निकालता हू ये शब्द भी साथ आ जाते है.. कभी ग़ज़ल बन जाते है कभी नज़्म कभी कविता और कभी ना जाने क्या.. मैं क्या कहु अपने बारे में.. ये शब्द कभी मिलकर कुछ कह दे तो यहा लिख दूँगा.. तब तक के लिए इतना जान लीजिए की मैं कुश हू...बस एक खूबसूरत ख्याल
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