ज़िंदगी के दो पहलु...

(1)

एक
डर रोज़
उसको सताता है
जब वो बढ़ता है
घर की ओर
जब तक बच्चे सो
ना जाए वो घर
में नही घुसता...

आज सबके सोने के बाद
घर गया लेकिन
छुटकी उठ गयी थी
और पुछ बैठी
बापू खाना लाए ???






(2)
बेफिक्री का लिहाफ़
ओढकर
सो रहा है सड़क
पर एक बचपन
गालो को खुजा
रहा है अपने मैल भरे
नाखुनो से..
मक्खिया भीनभीना
रही है उसके
उपर.. दो दिन
से नहाया नही है..
नहाता भी है
तो पेट पर पानी
नही लगाता.. वहा
हाथ रखते ही इसे
भूख याद जाती
जिसे भूलकर कल
रात सोया था ये
बिफिक्री
का लिहाफ़ ओढकर

.....----....

20 comments:

Saee_K April 12, 2008 12:23 PM  

zindagi ke do pehlu kahe ya ek aisi sachhai jo dekhkar bhi andekhi ho jaati hai..bahut hi sundar tareeqe se pesh ki gayi sachhai ko hamara salaamm

likhte rahe...

Abhijit April 12, 2008 12:26 PM  

aapne us bachche ko to befikri ka lihaaf odhaakar sula diya...par ye padhkar ham vyavastha , samaj aur apni befikri ka lihaaf utaar paayenge..yahi aasha hai.

mehek April 12, 2008 12:47 PM  

man mein ek tis,ek khalbal chod gayi aapki dono bhi rachanaye,bahut marmiktase bhukh ka viyog bataya hai,bahut badhai.jab sirf padhkar hame bura lagata hai,un bachhon ka kya hota hoga jo sach mein is daur se gujarte hai.

amitabh April 12, 2008 1:22 PM  

Hello kush
Its really really touchy!!

bus meri to yahi khwaish ki
ye sab publish hoo

अतुल April 12, 2008 3:12 PM  

बहुत सच्ची तस्वीर है.कविता भी उतनी ही सच्ची.

mamta April 12, 2008 3:25 PM  

कुश पहली बार आपको पढ़ रहे है। आश्चर्य है की हमने पहले कभी आपकी पोस्ट कैसे नही देखी।

बहुत ही दिल को छूती और आँखें खोलने वाली रचनाएं है।

naari April 12, 2008 3:53 PM  

blog kholtey hee lagaa kitna khubsurat blog haen
kyaa artist bhi haen
ek pencil sketch hamaer blog kae leeyae bhi banna dae agar smabhav ho to

दिनेशराय द्विवेदी April 12, 2008 5:00 PM  

पहली बार ही पढ़ा। सचमुच कमाल की दृष्टि और शानदार अभिव्यक्ति पायी है। मेरा बस चलता तो ब्लॉग का नाम बदल कर 'खुश-कलम' रख देता।
बहुत कविताएं पढ़ी हैं ब्लॉग्स पर, पहली बार मौलिकता लिए सहज अभिव्यक्ति देखी। खूब तरक्की करो।

DR.ANURAG ARYA April 12, 2008 7:26 PM  

jitni khoobsurat painting hai utni hi doosri kavita....

राज भाटिय़ा April 12, 2008 9:56 PM  

कुश काश आप की यह कविता हमारे ईमान दार प्रधान मत्री, ओर हमारे राष्ट्र्पति पढ पाते, एक सच्ची तस्वीर खीची हे इस तरक्की करते भारत की, बहुत बहुत धन्यबाद

Parul April 12, 2008 10:55 PM  

hamaari duaayen lagey aapko...

रवीन्द्र प्रभात April 13, 2008 12:06 PM  

जीवन की सच्चाईयों को प्रतिविम्बित करती हुई आपकी रचना मेरे मन की गहराईयों में उतर गयी , बधाईयाँ!

अल्पना वर्मा April 13, 2008 5:17 PM  

very touching poem Kush.

कुश एक खूबसूरत ख्याल April 14, 2008 2:51 PM  

आप सभी की प्रतिक्रियाओ के लिए हार्दिक धन्यवाद.. पहली बार पढ़ रहे सभी आगंतुको का स्वागत.. उमीद है भविष्य में भी आपका साथ मिलता रहेगा..
@नारी
आपके ब्लॉग के लिए यथा संभव सहायता करूँगा ओर मुझे खुशी भी होगी ऐसा करने में..
@द्विवेदी जी
आप की प्रतिक्रिया मिली तो मन वैसे ही खुश हो गया अब तो ये कलम भी खुश होकर ही लिखेगी..
@भाटिया साहब,अनुराग जी,सई,अभिजीत जी,अमिताभ,अतुल जी,ममता जी,प्रभात जी,महक जी,पारूल जी,अल्पना जी,
आप सभी की प्रतिक्रिया सर आँखो पर.. आपकी प्रतिक्रियो से ही प्रेरणा लेकर मैं अपनी कलम चलाने का साहस करता हू.. कृपया यूही अपना स्नेह बरसते रहे..

आभार
कुश

Mired Mirage April 15, 2008 12:25 AM  

बहुत अच्छा हुआ जो मैं किसी अन्य के लेख पर आपकी टिप्पणी पढ़ आपके ब्लॉग तक चली आई । आपकी कविताएँ सुन्दर व हृदय को छूकर झकझोरने वाली हैं। लिखती तो मैं भी हूँ परन्तु आप सा नहीं। यूँ ही लिखते रहिये ।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari April 15, 2008 2:17 PM  

बहुत पैनी कलम है. धार बनाये रखें. बिल्कुल यथार्थ बयानी..!!

जोशिम April 15, 2008 11:10 PM  

बहुत तेज़ - साफ देखती हुई - बहुत धारदार - मनीष

pallavi trivedi April 20, 2008 1:06 PM  

पहली बार आपको पढा....लाजवाब दोनों कविता!आपकी कलम की जितनी तारीफ की जाए कम है!दूसरी कविता तो बस... कमाल ही है!

apurn May 4, 2008 7:27 PM  

kya boloon,
bahut dard ko bayan karti hui panktiyan hian ye .....

neelima sukhija arora May 8, 2008 1:56 PM  

सच्चाई बयान करती है आपकी कविता , अपनी लेखनी की धार बनाए रखें।

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कुश
जयपुर, राजस्थान, India
इक रोज़ अचानक कुछ शब्द जमी पर गिर पड़े.. मैने उठाकर उन्हे जेब में रख लिया और चलता रहा.. सोचा किसी ज़रूरतमंद को दे दूँगा. . और दिए भी पर देखिए ना जितने दिए बढ़ते ही गये.. अब भी बढ़ते जा रहे है.. जब भी जेब से कुछ निकालता हू ये शब्द भी साथ आ जाते है.. कभी ग़ज़ल बन जाते है कभी नज़्म कभी कविता और कभी ना जाने क्या.. मैं क्या कहु अपने बारे में.. ये शब्द कभी मिलकर कुछ कह दे तो यहा लिख दूँगा.. तब तक के लिए इतना जान लीजिए की मैं कुश हू...बस एक खूबसूरत ख्याल
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