Tuesday, March 16, 2010

मुझे सोल्यूशन चाहिए.. कॉमरेड

इन लौटती आवाजों को पीछे धकेल धकेल कर मेरे माथे पर पसीने का पहाड़ उग गया है.. पर ये फिसल फिसल के मेरे कानो में आकर बैठ जाती है.. मैंने अपने दोनों हाथ अपने कानो पर रख दिए है.... पर ये स्थायी समाधान नहीं है.. मुझे सोल्यूशन चाहिए.. कॉमरेड,

अपने दल वाले मुझे 'च' से शुरू होने वाले किसी शब्द से बुलाते है.. एक्जेक्टली वो वर्ड क्या है मैं नहीं जानता.. मैंने ठीक से सुना नहीं.. मेरे कानो पर मेरे हाथ है.. मैंने अपने हाथो को वेल्डिंग करके जोड़ लिया है कानो से.. मैं सुनना नहीं चाहता बम विस्फोटो में मरने वालो की चीखे.. मैं सुनना नहीं चाहता गर्भ से लौटती लडकियों का क्रंदन..मैं सुनना नहीं चाहता आरक्षण के लिए भीख मांगती आवाज़े.. मैं सुनना नहीं चाहता लुटती हुई अस्मतो की पुकारे.. कि मेरे कान सुन सुन कर सुन्न हो चुके है.. अब कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें कॉमरेड, ........... तुम चाहो तो तीन सौ बीस की स्पीड से आती ट्रेन को मेरे कानो में घुसा दो.. या फिर ठूंस दो सौ हाथियों की चिंघाड़ इनमे.. इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा.. मैंने अपने दोनों हाथो से ढंककर रखा हुआ है इन्हें..

क्या बताऊ तुम्हे कि मैं नोर्मल मोड़ में हैंग हो जाता था बार बार.. मेरी सारी फाइले डिलीट हो जाती थी... मेरा कंट्रोल बटन काम नहीं कर रहा था.. मैं चाहकर भी F5 नहीं दबा पा रहा था... और फिर पूरी तरह करप्ट हो जाने के बाद मैंने खुद को फोर्मेट कर दिया था.... अब मैं खुद को सेफ मोड़ में चला रहा हूँ.. मैं जानता हु तुम ये सब नहीं समझोगे.. तुम कम्पूटर के बारे में कुछ भी तो नहीं जानते.. अगर जानते होते तो समझ सकते थे मेरी बात.. जान जाते कि क्यों में हाय्बर्नेट हो गया था.. पर तुम तो अनपढ़ ठहरे.. तुम कैसे समझोगे.. ? तुम तो, जब ज्ञान बांटा जा रहा था.. तब छलनी लेकर खड़े थे कॉमरेड.. क्यों जब तुम्हे पढ़ लिख जाना चाहिए था.. तब तुम तपती दोपहरी में दो कौड़ी के कंचो के लिए दोस्तों से उलझते थे कॉमरेड..? अब देखो खुद को.. कंचो की तरह टकरा रहे हो दुसरे कंचो से..

खैर..! कंचे खरीदते भी तो कैसे ? तुम्हारे पास पैसे भी तो नहीं है.. वही एक सिक्का अंटी में दबाये घुमते रहते हो.. कि जिसे तुम्हारी माँ ने तुम्हे दिया था कंचे लाने के लिए.. और चप्पल टूटने की वजह से तुम घर लौट आये.. तभी तुम्हारी माँ पंखे से लटकी हुई मिली.. इस सिक्के में तुम क्या अपनी माँ को ढूंढते हो कॉमरेड.. ? क्या इतने पुराने सिक्के में तुम्हे कुछ मिलेगा भी.. क्यों नहीं तुम इस पर नाइट्रिक एसिड डाल देते हो.. ताकि तुम्हारा सिक्का फिर से चमक उठेगा.. ! पर तुम क्या नाइट्रिक एसिड लाओगे.. तुम्हे तो साईंस के माने भी नहीं पता.. तुम इतने बड़े झंडू क्यों हो कॉमरेड..?

वैसे झंडू तो मैं भी हूँ यार.. तुमसे सवाल पे सवाल पूछ रहा हूँ.. ये जानते हुए भी कि जवाब मैं सुन ही नहीं सकता.... पर तुम मेरी एक बात सुन लों.. किसी से भी हमारे मिशन के बारे में बात मत करना....  मैं जानता हूँ कि हम सब किसी भरोसे के लायक नहीं पर क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकता हूँ कॉमरेड? या फिर तुम भी मिल जाओगे उन लोगो से और लील लोगे प्राण इस मिशन के.. ?

नहीं नहीं ऐसा मत करना कॉमरेड अब तो मिशन पूरा होने का वक़्त आ गया है... ये पेनअल्टीमेट समय है.. मैंने खुद को समेट लिया है अपने अन्दर..मैं टुकड़े कर रहा हूँ.. अहंकार के, मेरी कायरता के, मेरी चुप्पी के, मेरी नासमझी के, मेरी मक्कारी के, मेरे झूठ के, मेरे वजूद के... कि मैंने आखिरी बार आसमान में नज़र उठाली है.. मैं ईश्वर से नज़रे मिलाने की पोजीशन में हु..  मैं तुम्हारे सामने घुटनों के बल बैठता हूँ.. मेरे हाथ पैरो के नाख़ून नुकीले हो रहे है... मेरी दुम निकल रही है पीछे से.. मेरी जीभ लम्बी हो रही है... मैं अपना सर तुम्हारे पैरो में रखकर तुम्हारे तलवे चाट रहा हूँ... कि मैं अब कुत्ता बन गया हूँ.. अपने मिशन में कामयाब..

हमारे दल की जीत हुई है.. हमारी शपथ पूरी हुई है.. मेरे अन्दर एक जश्न की शुरुआत हो चुकी है.. मुझे नगाडो की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही है... तालियों की गडगडाहट मेरे कानो में गूँज रही है.. आदिवासी कबीलों के स्वर सुन रहा हूँ मैं... कितने ही तरह की आवाज़े...लहरों के तट पर आने की आवाज़.. बादलो के गडगडाने  की आवाज़.. मंदिरों में बजती हुई घंटिया...वाह.!
इंसान से कुत्ता बनने की प्रक्रिया का अंत यहाँ जाकर होगा.. तुम्हारे चरणों में.. ये मैं नहीं जानता था कॉमरेड.. पर मैं इंसानियत को त्याग चुका हूँ.. और कुत्ता बन गया हूँ..

एक कुत्ते के सुनने की क्षमता 40 Hz से 60,000 Hz होती है.... और ये इंसान से लगभग दुगुनी है.... अब इतना तो तुम जानते ही हो कॉमरेड.. भौ भौ..!

Tuesday, February 2, 2010

फटा पोस्टर निकला हीरो..

फटा पोस्टर निकला हीरो.. फिल्म हीरो हीरालाल का ये डायलोग आज भी हम तब इस्तेमाल कर लेते है जब कोई धमाकेदार एंट्री लेता है... फिल्मो के कुछ डाय्लोग्स कालजयी हो जाते है.. सबसे कॉमन में शोले का डायलोग आता है.. जब भी कही दो चार लोग चुप बैठे है तो कोई आकर कहेगा "इतना सन्नाटा क्यू है भाई?" या फिर दिवार फिल्म की तर्ज पर.. तुम्हारे पास क्या है पर ये कहना कि मेरे पास माँ है .. इसी डायलोग को फिल्म गुलाल में अलग तरीके से बोला गया.. डायलोग वही है मगर भावनाए बदल गयी है.. फिल्म का एक चरित्र जढ्वाल.. बन्दूक दिखाकर कहता है "मेरे पास माँ है" .. आजकल वैसे भी बन्दूको के साए में ही पलते है बच्चे..

सलीम जावेद की जोड़ी ने हमें कई डाय्लोग्स दिए है.. जिसमे खास तौर पर शोले और दिवार .. याद कीजिये..
-------------------------------------------------------------------------
कितने आदमी थे?

यूँ कि ये कौन बोला?

अब तेरा क्या होगा कालिया ?

सरदार मैंने आपका नमक खाया है

बसंती इन कुत्तो के सामने मत नाचना

ये हाथ हमका दे दे ठाकुर

इतना सन्नाटा क्यों है भाई..

हम अंग्रेजो के जमाने के जेलर है..

हमारा नाम भी सुरमा भोपाली येसे ही नहीं है..




sholay
deewar-wallpaper
मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता..

पीटर तुम मुझे वहा ढूंढ रहे हो और मैं तुम्हारा यहाँ इंतज़ार कर रहा हूँ..

मेरा बाप चोर है..

खुश तो बहुत होंगे आज तुम..

भाई तुम साइन करते हो या नहीं..

जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ..

मेरे पास माँ है..


आज की बात करे तो मुझे गुलाल.. कमीने .. लक आदि फिल्मो के डाय्लोग्स पसंद आये है.. फिल्म गुलाल के डायलोग अनुराग कश्यप ने लिखे है और कमीने के विशाल भारद्वाज ने.. फिल्म गुलाल में एक किरदार पृथ्वी बना को जब घर से भागते हुए पकड़ा जाता है तो वो कहते है कि रास्ता भूल गया था.. और फिर से कहते है कि इस घर में मैं अकेला ही रास्ता नहीं भूला हूँ..
फिल्म कमीने में जब किरदार गुड्डू प्रियंका चोपड़ा से कहता है कि मेरे पास कंडोम नहीं है तो प्रियंका कहती है.. वैसे भी हमारे बीच कोई तीसरा आये मुझे पसंद नहीं है.. फिल्म में चार्ली स को फ बोलता है संवाद में वो कुछ ऐसे कहता है…
चार्ली : मैं फ को फ बोलता हूँ..
भोपे : अबे फ को फ नहीं तो क्या ल बोलेगा..

ज़रा याद कीजिये गुलाल के कुछ डाय्लोग्स..
gulaal-wallpaper
या तो हांफ ले या बोल ले .. हांफ हांफ के मत बोल.. 
 
जो कुछ नहीं कर सकता वो लॉ कर लेता है..  

ये सवाल से सबकी फटती क्यों है.. ? कोई जवाब नहीं है इसलिए?

डेमोक्रेसी बची नहीं यहाँ पे और ये बैठके एरिस्टोक्रेसी चाट रहे है..

इस मुल्क ने हर शख्स को जो काम था सौंपा उस शख्स ने उस काम की माचिस जलाके छोड़ दी..

कल छोटी दिवाली थी ना मन में बड़े फटाके फूट रहे थे..

साला हक़ से लिया है पाकिस्तान और लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान और कोई बीच में ना आना वरना ले जाऊंगा राजपुताना..
-------------------------------------------------------------------------

kaminey-21
लाईफ बड़ी कुत्ती चीज़ है.. और इस दुनिया में कुत्तो का सिर्फ एक  जवाब है.. कमीने

ज़िन्दगी में हमारी वाट इस से नहीं लगती है कि हम कौनसा रास्ता चुनते है.. वाट लगती है इस से कि हम कौनसा रास्ता छोड़ते है..

पैसा कमाने के दो रास्ते है.. एक फोर्टकट और दूसरा छोटा फोर्टकट 

एफे एफे केफे केफे हो गए केफे केफे एफे एफे हो गए..

इसे पता नहीं कि दुनिया कितनी बड़ी हरामजादी है तुम साले कितने बड़े कुत्ते कमीने हो..

दो दशक पहले के डाय्लोग्स और आज के डाय्लोग्स बदल गए है.. किरदार बदल गए है.. ब्लैक एंड व्हाईट कुछ भी नहीं रहा.. सब कुछ ग्रे शेड में हो गया है.. फिर भी कुछ डाय्लोग्स है जो हमेशा ऐसे ही याद किये जाने वाले है.. ऐसे में एवरग्रीन हिंदी फिल्मो के किरदारों के डाय्लोग्स है जो ऑरकुट पर किसी कम्युनिटी में मिले थे..
-------------------------------------------------------------------------
हीरो -
* shashi_kapoor तेरे सामने तेरी मौत खड़ी है कुत्ते!!
* तुम्हारे लिए मेरी जान भी हाज़िर है!
* अपने आदमियों से कहो की बंदूकें फेंक दे!
* दुनिया की कोई ताक़त हमे जुदा नही कर सकती!
* मेरे होते हुए तुम्हारा कोई बाल भी बाका नहीं कर सकता!
* माँ, मुझे आशीर्वाद दे!
* पुलिस मेरे पीछे लगी हुई है!
* खबरदार जो उसे हाथ भी लगाया!
* मेरी माँ बहुत बीमार है..
* जब तब अपने बाप के खून का बदला नही ले लेता, चैन से नही बैठूँगा!!
-------------------------------------------------------------------------
हिरोईन -
yogeeta-bali-wallpaper * भगवान के लिए मुझे छोड़ दो!
* हटो. तुम बड़े वो हो !
* नहीं!
* मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह सकती!
* प्यार करना कोई गुनाह नहीं!
* कुछ गूंडे मेरे पीछे पड़े है!
* कोई देख लेगा!
* मैने तुम्हे क्या समझा, और तुम क्या निकले!
* तुम मुझसे कितना प्यार करते हो?
* आज तुम नही आते तो पता नही क्या हो जाता!!
* मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हू! 
-------------------------------------------------------------------------
बहन
Farida_Jalal1
* मेरे भैया को लंबी उमर देना, भगवान!
* मेरे भाई पे कोई आँच ना आए!
* खबरदार जो मुझे छूआ भी, मैं अपनी जान दे दूँगी!
* भय्या.. तुम तो बस मेरे लिए एक प्यारी सी भाभी ले आओ ..
* भगवान के लिए, मेरा सुहाग मत उजाडो..
* भगवान के लिए मुझे छोड़ दो..
* मैं किसी को मुंह दिखाने लायक ना रही..
* दरवाजा क्यों बंद कर रहे हो..
* ये आप मुझे कहाँ ले जा रहे है..
-------------------------------------------------------------------------
विलेन
jugnu_hook* अब सारे हिन्दुस्तान पर हमारा राज़ होगा!
* बताओ फार्मूला कहाँ है?
* तुम्हारी माँ हमारे क़ब्ज़े मैं है!
* ये सौदा तुम्हे बहुत महंगा पड़ेगा
* इन गोरी गोरी कलाईयों को काम करने की क्या ज़रूरत है!
* यहाँ तेरी इज़्ज़त बचाने कोई नही आएगा!
* बुला तेरे भगवान को– देखता हूँ कौन आता है?
* गद्दारी की एक ही सज़ा होती है, मौत!
* उसकी कोई तो कमज़ोरी होगी, कोई माँ या बहन?
-------------------------------------------------------------------------
डॉक्टर
* आई एम सॉरी!
* इन्हें दवा कि नहीं दुआ की जरुरत है..
* इसका तो बहुत खून बह चुका है. फॉरेन ऑपरेशन करना पड़ेगा!
* भगवान ने चाहा तो सब ठीक होगा!
* बधाई हो, तुम बाप बनने वाले हो!
* इसकी हालत बहुत नाजुक है!
* अरे! इसे तो तेज़ बुखार है!
* अब सब कुछ ऊपर वाले के हाथ में हैं!
* 24 घंटे तक होश नही आया तो….
* बच्चे को तो हमने बचा लिया पर माँ को नहीं बचा सके..
-------------------------------------------------------------------------
पिता
* 220px-Madan_Puri एक बार इसके हाथ पीले कर दू, फिर में चैन से मर सकता हू!
* इस घर के दरवाज़े, तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद है!
* वॉच मैन ! इसे धक्के मारकर बाहर निकाल दो!
* तुम खुद दो वक़्त की रोटी नही खा सकते, मेरी बेटी को क्या खिलाओगे?
* मेरे जीतेज़ी ये शादी नहीं हो सकती!
* मेरी बेटी से प्यार करने से पहले अपनी औकात और हमारी हैसियत तो देखी होती
* मैं जल्द ही दहेज़ की सारी रकम चुका दूँगा!
* यह आप क्या कह रहें है, भाई साहिब!
* गाड़ी रोको ड्राइवर!
* मैं कहता हूँ, दूर हो जा मेरी नजरो से ..
-------------------------------------------------------------------------
माँ Nirupa_Roy_300
* ये कंगन मुझे मेरी सास ने दिए थे..
* मेरा राजा बेटा!
* मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है!
* मेरा बेटा ऐसा कभी नहीं कर सकता!
* मेरा बेटा तेरी मौत बनकर आएगा,
* एक बार मुझे माँ कह कर पुकारो बेटा…
* मेरे बेटे की रक्षा करना प्रभु!
* मेरे राजा बेटे को आज में अपने हाथो से खिलाऊंगी
* हे भगवान, मेरे सुहाग की रक्षा करना!
* मैने तेरे लिए गाजर का हलवा बनाया है!
* मैने तुम्हे पाल पॉस कर बड़ा किया…
* मार, मार इसे बेटे, इसने तेरे देवता जैसे पिता का खून किया!
* भगवान मैने आजतक तुमसे कुछ नही माँगा!!
* बेटा ये तो…. यह तो खुशी के आंसू है….
-------------------------------------------------------------------------
खैर ये तो रही मेरी बात.. अब कुछ ऐसे ही डाय्लोग्स आपके पास भी तो होंगे.. तो हो जाये दो चार इधर भी..

Tuesday, January 5, 2010

साईड 'ए' वाली ज़िन्दगी भी क्या जिंदगी थी....


रेट्रो मेमोरीज...  उन गलियों की जहाँ छीले हुए घुटनों के साथ.. सड़क पर गावस्कर को पीछे छोड़ने की कसमे खायी थी .. आवारगी कंधो पर ढोते हुए पापा से नज़रे बचाते घरो में घुसने का नाम ही तब ज़िन्दगी हुआ करता था.. कैलंडर के पन्नो के साथ उम्र भी बदल चुकी है...

पर रेट्रो जमाना अभी भी अन्दर ही अन्दर किसी कोने में दुबका हुआ पड़ा है.. एक चवन्नी में दुनिया जहान ढूंढ लेने वाली उस उम्र..... उस खालिस उम्र में बीती हर एक बात रेट्रो हो चुकी है... ठीक उस उम्र में जब बेफिक्री का लिहाफ ओढ़े एक टांग पे टांग टिकाये घंटो कही पड़े रहते थे.. और दुनिया को बदलने की ख्वाहिशे जेब से बाहर सरक रही होती.. ईमान तब स्कूल के बस्ते में साबुत पड़ा मिलता था.. और दुनियादारी नाइजीरिया के किसी सुदूरवर्ती इलाके में रही होगी शायद..

कागज़ तक पर पांव पड़ने पर विधा माता से माफ़ी माँगना और टिश्यु पेपर के खास पलो में इस्तेमाल के बीच की दुनिया.. प्रलय आने से पहले ही शायद दो भागो में बँट चुकी है.. नागराज.. फेंटम.. बांकेलाल.. हवालदार बहादुर.. एक उम्र इन लोगो के साथ भी गुज़र डाली जो साले दुनिया में ही कही नहीं है..  दिवाली के बाद जो पैसे मिलते थे.. उससे बाकी कई दिनों नागराज से मुलाक़ात पक्की हो जाती थी.. अठन्नी में किराये पर एक कोमिक्स आती थी.. जिसे आठ लोग पढ़ते थे और अठन्नी बँट जाती..

खाना खाने के लिए मम्मी की आवाज़े.. या दूध का गिलास देखकर पिकासो की पेंटिंग सा मुंह.. बचपन की उन तमाम कीमती चीजों से भरी हुई जेबे.. जिन्हें बेचने पर बाज़ार में दो कौड़ी भी ना मिले.. खाली सडको पर चक्कों को लकड़ी से चलाते हुए पास से गुजरती हुई कारो को देखकर आँखों में सपने ठूंस लेना.. रेल की पटरियों पर सिक्के रखना.. और सिक्को को सोने की अशर्फी में बदल जाने के लल्लू ख्याल...  सड़क पर जमा पानी में जानबूझ के पांव रखना.. एक छक्के में कोने वाली आंटी की बालकनी की लाईट फोड़कर भागना.. बिना हाथ धोये गरमा गरम जलेबियों पर टूट पड़ना.. और दोस्त की आवाज़ पे पंखा टी वी सब चालु छोड़ जाना..

भगवान चाहे मिले ना मिले.. पर साईकिल का ताला खुला मिलना... कैंची साईकिल चलाकर मोहल्ला नाप लेना.. शाम स्टाइल मारने के लिए बैडमिन्टन खेलना और फिर कॉक को 'उनके' घर में फेंकना.. फिर लेने जाना.. वो कॉक भी अगर जिन्दा हुई तो कही रेट्रो मोड़ में पड़ी मिलेंगी.. सीडी और आईपॉडस का तब जन्म भी नहीं हुआ था.. उलझती कैसेटो की रील को घुमा घुमाकर टेप रिकोर्डस में चलाना.. साईड 'ए' वाली ज़िन्दगी भी क्या जिंदगी थी.... अब लगता है किसी ने पलट के ज़िन्दगी की साईड 'बी' लगा दी है..

और जो कुछ युही पड़ा मिला.. 
दूरदर्शन का रुकावट के लिए खेद है.. या फिर गुमशुदा की तलाश.. सिबाका गीत माला.. या मिले सुर मेरा तुम्हारा.. हमदर्द का टोनिक सिंकारा.. केम्पा कोला.. हिंदी फीचर फिल्म का शेष भाग.. लेम्रेडा स्कूटर.. बोल्बेटम पैंट... कानो पर आते हुए बाल.. और लास्ट में आर डी बर्मन का........वकाऊ 

स्पेशल थैंक्स टू मेजर गौतम.... जिनकी पोस्ट ने आज कुछ लिखने को मजबूर किया.. वैसे ये तो अपना रेट्रो मोड़ था.. कुछ आपका भी तो होगा.. ?

Tuesday, November 17, 2009

बा'रा'त निकली है... तो दूर तलक जायेगी...

जिसने लाईफ में बारात अटैंड नहीं की है उसने कही बैठकर झक ही मारा है.. बारातो में झूमकर ठुमके लगाने का अपना ही एक अलग मज़ा है.. यु तो हर बारात में ही कुछ ना कुछ नया मिल जाता है... पर जो हर बारात में मिलता है वो बड़ा कमाल मिलता है.. और आप को यकीन नहीं होगा उस पर एक पोस्ट भी लिखी जा सकती है..

दुल्हे के बिना बारात कैसी.. ? घोड़े पर बैठा दूल्हा बारात का हिस्सा कभी नहीं होता वो बात अलग है कि बारात उसी की होती है.. हिसाब से उसको सबसे आगे चलना चाहिए पर वो बेचारा सबसे पीछे घोड़ी पर अपने नाते रिश्तेदारों के बच्चो को अपने पीछे बैठाये चुपचाप बर्दाश्त करता रहता है.. और लोग बाग़ भी कम नहीं है.. घोड़ी के पीछे ऐसे ऐसे मुस्टंडे बच्चे बिठा देते है.. कि घोड़ी ही बैठ जाए.. पर हाँ दूल्हा इसी बात से खुश हो जाता है कि चलो जनरेटर वाला तो उसके पीछे है..

दुल्हे के पिताजी अपने चेहरे पर मिलेजुले भाव लिए सफारी सूट पहने हाथ में काला बैग लिए मिल जाते है.. दुल्हे की माताजी अपने खराब गले और ढेर सारी जेवेलरी के साथ भीड़ में ही कही मिल जाती है.. दुल्हे की बहन अपनी हम उम्र दो चार बहनों के साथ बार बार कुछ गानों की फरमाइश करती है.. पर दुल्हे का भाई अपने दोस्तों के साथ आठवी बार "देश है वीर जवानों का.." बजवा कर नाच रहा होता है.. और आस पास कुछ बाराती नाचने की मासूम अभिलाषा लिए इसलिए खड़े होते है कि उन्हें कोई जबरदस्ती लेकर जाए और वो भी दो चार ठुमके लगा ले..

थोडी ही देर में जीजाजी आकर बनारस वाले मामाजी को बीच में ले आते है.. मन होने के बावजूद मामाजी ना ना करते हुए आ ही जाते है.. फिर तो फूफाजी जी और चाचा जी भी जोश में.. हर बारात में एक व्यक्ति ऐसा होता है जो नागिन वाला डांस करता है.. और दूसरा रुमाल से बीन बनाकर बीन बजाता है.. इनमे से एक पतंग भी उड़ाता है.. और एक चाचा मामा या जीजाजी में से कोई ऐसे भी होते है जो महिलाओ वाला डांस भी करते है.. ऐसा करके महिलाओ में तो उनकी इज्जत बढ़ जाती है.. पर नहीं नाचने वाले दुसरे चाचा मामा या जीजाजी में से कोई उन्हें किसी और नाम से अलंकृत कर देते है..

सड़क पर सांडो की तरह खुले आम नाचते हुए लोगो के बीच में हाथ में बीस का नोट लिए एक शख्स एंट्री लेता है.. और अपने हाथ को अधिकतम ऊंचाई पर ले जाता है.. बैंड वालो में से एक जो काफी देर से बाजा बजा रहा है.. वो बाजे में फूंक मारते मारते ही नोट लेने के लिए हाथ उठाता है.. जो भाईसाहब नोट उठाये खड़े है वो अपना हाथ और ऊपर उठाते है.. ये जानते हुए भी कि इस फ़ालतू नाटक के बाद नोट बैंड वाले के पास चला जाएगा.. सब उत्सुकतावश देखते रहते है कि बैंड वाला नोट कैसे लेता है.. ?

इतने में दुल्हे का जवान भाई सड़क को अपने बाप का माल समझ कर बैंड वालो को अगले चौराहे पर रुकने का फरमान सुनाता है.. पिछली बारात में हुई ठुकाई को याद रखते हुए बैंड वाला चौराहे पर बैंड रोककर "जिमी जिमी आजा आजा.." बजाने लग जाता है.. और बाहर जाम में फंसे लोगो को भीड़ में से कुछ उठे हुए हाथो में हलचल दिखाई देती है.. हालाँकि बारातियों में से एक भाईसाहब ऐसे भी होते है जो बारातियों को साईड में धक्के दे देकर ट्रैफिक सँभालने में लग जाते है..

पर जो सँभालने से संभल जाए वो बारात ही क्या.. ?

आत्मनिर्भर बैंडवाले के एक एक कदम अपनी मर्ज़ी से आगे बढ़ जाने की वजह से बारात भी बढती जाती है.. कुछ लोग जिनका बारात में जाना मजबूरी है पर वापस लौटने के लिए अपनी गाडी होना भी जरुरी, वो लोग हर थोडी दूर आगे अपना स्कूटर खड़ा करके वापस आते है.. ऐसे लोगो को (जो जबरदस्ती बारात में है) आप जेब में हाथ डाले हुए देख सकते है.. अमूमन ये बारात में सबसे आगे या फिर सबसे साईड में होते है..

जब बारहवी बार छोटी बहन फरमाइश करती है और भाई की शर्ट पसीने में डूब जाती है तो बहने चार्ज संभाल लेती है.. इसी टाईम पे भाभी चाची और मामी भी अपना हुनर दिखाने आ जाती है.. सड़क के बीचो बीच लोगो को अपनी छुपी हुई प्रतिभा दिखाने का सुनहरा अवसर मिल जाता है.. और मामी जी के नाच शुरू करते ही कुछ एलिमेंट्स मामाजी को ढूँढने लग जाते है.. मामाजी को ये एलिमेंट्स तब खीच कर ले आते है जब वे मामीजी का डांस बड़े चाव से देखते हुए अपने जीजाजी पर नज़र रखे होते है..

मामाजी के आते ही मामीजी का एक्साईटमेन्ट डबल हो जाता है.. वो और तेज़ डांस करती है.. जीजाजी पर नज़र रखे हुए मामाजी, दोनों हाथ उठाकर नाचने लग जाते है.. पास खड़े नानाजी यानि उनके ससुर जी अपने खानदान के चश्मो चिराग और इकलौती बहु के नाच की मन ही मन तारीफ़ करके आगे कट लेते है..

इतने में पास से एक और बारात निकलती है.. अब देखिये साहब..! दोनों बारातो में ब्रूसली की आत्मा घुस जाती है.. जोर जोर से नाचने लग जाते है.. बैंड वालो को भी जोश आ जाता है.. बाजे वाला बाजा फूंक फूंक के अपनी जान देने पर ऐसे उतारू हो जाता है जैसे ऊपर समस्त देवता गण हाथो में फूल लिए उस पर बरसाने को तैयार खड़ेहो..

इसी बीच कई ऐसे लोग जो बाकियों पर रौब जमाना चाहते है.. बार बार आकर पैसे लुटाते रहते है.. पैसो के चक्कर में बैंड वाले लाईट वालो के तारो में उलझकर गिर पड़ते है.. दुल्हे को छोड़ घोड़ी वाला भी अपना हिस्सा लेने आ जाता है.. ढोल वाले और लाईट वाले तो खैर उलझते ही है..

ये जानते हुए भी कि अगर इन हरामखोरो को पता चल गया कि हम धीरे धीरे आगे बढ़ रहे है तो टाँगे टूट जायेगी, बैंड वाले जान जोखिम में डालके आगे बढ़ते रहते है.. क्योंकि इस बारात को ठिकाने लगाने के बाद उन्हें एक और को निपटाना होता है.. वैसे ये अकेले नहीं होते इनका साथ देने में ताऊजी फूफाजी टाइप लोग होते है जो बार बार थोडा आगे थोडा आगे कहकर बारात बढ़ाते रहते है..

बारात बढती रहती है.. नोट हवाओ में उठते रहते है. .ठुमके लगते रहते है.. फोटोस खींचती रहती है.. दूल्हा पकता रहता है.. और बारात आगे बढती रहती है..

: खैर ये तो हुआ हमारा देखना.. कुछ छूट गया हो तो आप भी बता दीजिये..

Friday, October 9, 2009

बेचारी महफ़िल.. कुछ ऐसी लुटी..

महफ़िल पूरे शबाब पर है.. गुमनाम से शायर अपनी ठोडी पर कलम टिकाये बैठे है.. उनका उल्टा पांव सीधे पांव पर पड़ा है.. और नज़र नामचीन लोगो पर..
नामचीन लोगो के शेरो पर गुस्ताख लोग तालिया पीट रहे है.. गुमनाम शायर ने पान की पीक थूकते हुए कहा है... नामुराद..!  सब के सब..

और फिर उल्टे पांव पर सीधा पांव रखकर दोबारा बैठ गया.. नामचीन ने अपने आगे पड़ी प्लेट से पान उठाकर मुंह में ठूंसा.. दोनों होंट भड़कते तंदूर से लाल हो चुके है.. पता नहीं अन्दर से जो निकलेगा वो पचाने लायक होगा या नहीं.. गुमनाम की बैचेनी बढ़ रही है.. उसने टाँगे बदल ली है.. गोया टाँगे नहीं किसी जाहिल का ईमान हो..   

हो गए उनके आगे बेनकाब.. जिनसे पर्दादारी थी..
पीट गए सब सरे राह.. जिनसे भी उधारी थी...

हिम्मत तो देखिये.. फिर से खड़े हो गए पैरो पर..
ऐसे मामलो की तो.. पहले से ही तैयारी थी...  

वाह! क्या शेर दहाडा है.. पास बैठे एक और नामचीन ने कहा.. बहुत ही कातिल शेर.. शुभानल्लाह!!

गुमनाम ने पांव की जगह फिर बदल ली.. और इस बार ना मुराद से पहले 'साले' भी लगा दिया... तो शब्द कुछ यु बना.. साले नामुराद!   

रात भर जब नामचीन लोग.. शेर दहाड़ दहाड़ के ढीले हो गए तो किसी ने गुमनाम को आवाज़ मार दी.. गुमनाम फुर्ती से चप्पल उतार कर स्टेज पर चढ़ गए.. नामचीन लोग उसी बेलन के आकार वाले तकिये का सहारा लेकर बैठ गए जिनसे घरो में रोटिया बनायीं जाती है..  गुमनाम ने प्लेट में देखा पान बचे नहीं थी.. मगर लाल लाल कत्था जरुर उन्हें घूर रहा था.. गुमनाम ने भी बदतमीजी करने में देर ना लगाते हुए एक शेर ठोंक डाला..

गुजारते है जो.. ज़िन्दगी अपनी उधारो में.. 
पिट जाते है युही.. सरे आम बाजारों में...

छोटे मोटे जख्मो से कोई फर्क नहीं पड़ता उनको
बदन पर ऐसे टुच्चे निशान तो होंगे हजारो में...

वाह वाह हुज़ूर ये होता है शेर.. क्या तो दहाडा है.. भई माशाल्लाह.. शुभानल्लाह!! ... गुस्ताख लोगो ने शेर की जम कर तारीफ़ कर दी..

नामचीन ने अपने पीछे से वही बेलन के आकार का तकिया हटाया और उल्टे हाथ की तरफ करवट लेकर बोले.. नामुराद!  सब के सब..
फिर तो बस दहाड़ पे दहाड़ और करवट पे करवट.. करवट पे करवट और दहाड़ पे दहाड़.... इधर दहाड़ उधर करवट.. उधर करवट इधर दहाड़..  

बस फिर क्या होना था..? बची रात में जब तक शमा में तेल डाल डालकर जलाना मुनासिब था.. जलाया गया.. गुमनाम को नाम मिल चुका था.. वो शेर पे शेर दहाड़ रहा था... नामचीन ने नामुराद के आगे ऐसे ऐसे शब्द जोड़े  कि.. साला तो फिर भी छोटा लग रहा था..

शेरो की कुछ इसी तरह की दहाडो से पहले नामचीनों ने और फिर गुमनामो ने सारी की सारी महफ़िल लूट ली..