Thursday, August 7, 2008

छपाक !!

छपाक !! टेबल पर पड़ी पानी की गिलास नीचे गिर पड़ी, एक तो इतना सारा सामान बिखरा है टेबल पर एक गिलास भी नही टिकती.. शाम हो चुकी है.. आज फिर लेट हो गया.. सोचा था जल्दी पहुँचा तो राजमा चावल बनाऊंगा.. पर फिर लेट हो गया रास्ते से मैगी ले लूँगा.. ..

मोहन बाबू, ज़रा देखिए तो खिड़की से बाहर बारिश तो नही है..

साहब बादल तो छाए हुए है. लगता है होने वाली है.. जल्दी से निकल लीजिए..

ओफ्फो एक तो ये बारिश का भी कुछ भरोसा नही..

हेलो! ए वन गैरेज, आप गाड़ी लेकर आए नही? अरे मगर आपने ही तो कहा था शाम तक हो जाएगी,
यार कमाल करते है आप, ठीक है लेकिन कल सुबह तक आप किसी भी हालत में गाड़ी घर पे छोड़ जाइएगा..

हद होती है, सुबह से शाम हो गयी गाड़ी ठीक नही होती इनसे..

मोहन बाबू मैं चलता हू..

क्या हुआ भाई लिफ्ट क्यो बंद है?
साहब काम चल रहा है एक घंटा लगेगा..

ओह नो! जब भी सुबह टोस्ट जलता है पूरा दिन खराब जाता है.. मम्मी को बोलू तो कहती है कब तक नाश्ते में टोस्ट जलाएगा.. शादी करके बहू ले आ.. एक तो मुझे आज तक समझ नही आया टोस्ट जलाने और शादी में क्या रिलेशन है? अब सीढ़ियो से उतरना पड़ेगा.. ये सारा काम रात को क्यो नही करते.. इतनी सीढिया पता नही पिछली बार कब चढी थी.. ऐ टी एम्? हमारी बिल्डिंग में ए टी एम भी है!.. कमाल है कभी सीढ़ियो से उतरा ही नही.. अपनी ही बिल्डिंग से अंजान हू.. चलो यार सीढ़िया तो ख़त्म हुई.. वैसे इतने टाइम बाद इतना पैदल चला हू.. डॉक्टर्स तो कहते भी है वॉक पर जाओ.. पर टाइम कहा है? सुबह आँख खुलते ही तो ऑफीस का टाइम हो जाता है..और रात को तो बस सोना दिखता है.. चलो आज वॉक कर ही ली जाए..

छपाक! ओये दिखता नही है क्या.. स्साले पता नही कैसे गाड़ी चलाते है.. ये भी नही सोचते की कोई पैदल चल रहा है..

उपर बादल तो है.. बारिश होने वाली है फटाफट पहुँच जाऊ घर तो अच्छा है..रात को सारी मेल्स का जवाब भी देना है.. रात को लेट सोया तो फिर सुबह लेट हो जाएगा.. पता नही हो क्या रहा है.. कर क्या रहा हू.. पूरे वीक में वीकेंड का इंतेज़ार करता हू.. छुट्टी मिली नही की बस सो गये.. फिर वीकेंड.. फिर काम..लोग कहते है यही तो लाइफ है.. अरे लाइफ तो कब की पीछे छूट गयी.. अब तो बस एक दिनचर्या है जिसे पूरा करना पड़ता है.. हम इतने मुश्किल क्यो होते जा रहे है..
छपाक! ओह नो, ये सड़क के गड़डे भी ना.. सड़क से ज़्यादा तो उसमे खड्डे हो गये है.. थोड़ी सी बारिश हुई नही की पानी भर जाता है.. लोगो से तो इतना टैक्स लेते है ये करते क्या है पैसो का.. पता नही देश कहा जा रहा है. और ये कहते है इंडिया शाइनिंग इंडिया शाइनिंग.. सारी की सारी पैंट खराब हो गयी. आज ही तो पहनी थी.. फिर कौन धोएगा.. यार ये बारिश होती ही क्यो है?

ओह नो बारिश शुरू हो गयी.. अब क्या करू.. दस पंद्रह मिनट का तो रास्ता बाकी होगा ही.. रुकना ही पड़ेगा.. बारिश में गीले हो गये तो फिर जुखाम वुखाम.. बारिश तेज़ हो गयी है.. मोबाइल गीला हो गया तो प्रॉब्लम हो जाएगी.. कही से पोलिथीन का केरी बैग मिल जाए तो उसमे डाल लू.. वो लड़की मूँगफली बेचने वाली लड़की उसके पास होगा..

बेटा तुम्हारे पास केरी बैग होगा जिसमे मैं ये मोबाइल डाल सकु?
केरी बैग केरी बैग.. ह्म्‍म्म प्लास्टिक की थैली
अरे ये कहा जा रही है..
ओये हेलो..

ये आँख बंद करके क्यो खड़ी हो गयी.. बाहें फैलाकर खड़ी है.. क्या हुआ इसे.. ओह शायद पानी की बूँदो से खेल रही है.. ये एक बूँद गिर रही है.. थोड़ा लेफ्ट थोड़ा लेफ्ट.. नही थोड़ा राईट हा हा ये गिरी.. छपाक!!

ये तो अच्छा है, मैं भी करके देखता हू.. क्या हुआ कोई बूँद नही गिर रही है.. एक आँख खोल के देखता हू..

आँहा अंकल आँख बंद करो.. वो मेरे पास आकर कहती है..

मैं फिर से आँख बंद करता हू बाहे फैलाकर उपर देखता हू.. मुझे लग रहा है कोई बूँद आ रही है.. मेरी ओर.. बहुत करीब मेरे बिल्कुल करीब. बस गिरने ही वाली है मेरी आँखो पर.. ये गिरी ये गिरी.. और ये गिरी...छपाक!!
आह! मज़ा आ गया.. मैं खिलखिलाके हंसता हू.. वो भी मुझे देखके हंस रही है..
आओ अंकल..
वो मेरा हाथ पकड़ के मुझे ले जा रही है.. मैं उसे रोक नही पाता हू.. उसके नन्हे हाथो में अपना हाथ सौंप के बस चल रहा हू.. वो सड़क पे जमा पानी के बीच जाकर ज़ोर से उछलती है छपाक! और सारा पानी मुझपर.. और भी बच्चे आ गये है.. सब कूदते है पानी में.. छपाक.. छपाक.. बस यही आवाज़ आ रही है.. मैं खुद को रोक नही पता हू.. मेरी पैंट पूरी गंदी हो चुकी है.. मैं उनको रोकता हू.. वो सब मेरी और देखते हुए बोलते है ए ए ए ए ए.. और ये छपाक! मैं भी कूदता हू.. सब मिलकर कूद रहे है पानी में..
और बस ये आवाज़ आ रही है.. छपाक! छपाक!

सच कहु इतनी खुशी बड़े दिनो से नही हुई.. बारिश की बूंदे कम होती जा रही है.. धीरे धीरे सब बच्चे जाते है.. वो लड़की मुझे देखकर हंस रही है.. बहुत खुश लगती है.. वो अपनी सबसे छोटी अंगुली मुँह पे रखकर कानो के पास अंगूठा रखते हुए मुझे याद दिलाती है फोन.. और भागकर फूटपाथ पे जाती है.. मैं देखता हू.. उसकी मूँगफलिया भीग चुकी है.. उनके नीचे पड़ा मेरा मोबाइल ठीक है.. उतना नही भीगा.. मैं उसे पैसे देता हू.. वो मना कर देती है.. अपनी मूँगफलियो को पानी में बहाकर.. सड़क के उस पार चली जाती है.. मैं उसे देखता रहता हू.. वो उस पार जाकर हाथ हिलाती है.. मैं भी उसे देखकर मुस्कुराता हू.. खुशी से कदम बढाते हुए.. पानी में कूदते हुए घर जाता हू.. घर पे आकर राजमा चावल बनाए है.. बहुत अच्छे बने है.. माँ को फोन करता हू.. पूछती है नाश्ते में ब्रेड जली थी क्या?? मैं हाँ कहता हू.. वो कहती है.. कितनी बार कहा है.. यूही ब्रेड जलाता रहेगा या... बस माँ बस.. एक काम करो एक बहू ढूँढ लो..

सच?

हा माँ सच!..
हेलो हेलो .. माँ कहा हो? हेलो..

हमारे आँगन में अक्सर बारीशो में पानी जमा हो जाता है.. माँ भी शायद आँगन में चली गयी..
एक आवाज़ आती है फोन पर... छपाक!

19 comments:

  1. कुश जी
    आप अपनी कलम का फ़िर लोहा मनवा ले गए इस बार भी...भाषा और कथ्य पर आप की पकड़ गज़ब की है...बहुत आनंद आया पढ़ कर दिल में इच्छा हुई मैं भी करूँ...छपाक...
    नीरज

    ReplyDelete
  2. behad marmsparshi lekhni..
    laga..meri dincharya..bayaan ki jaa rahi hai..bas us bachhi se mulaqat hone ki der hai :)

    bahut hi badhiya

    likhte rahe

    ReplyDelete
  3. subah subah ek wakya mere saath bhi ho gaya aisa.....barish mujhe bhi pasand hai aur aise hi bundo ko mehsus karte hue main wapas aa rahi thi ghar......kuch bachcho ko dekha waha aise khelte hue ...aur has padi main bhi bhigte hue..... tumne nahi likha hota ye to aaj ye kissa main likhne wali thi ..... :)...par tumse achcha nahi likh sakti thi .... thanks...

    ReplyDelete
  4. भावपूर्ण लेख...माँ का दिल तो दूर बैठे भी चिंता करेगा...माँ की ममता सोचती है कि उसी का ही कोई रूप उसके बेटे के साथ रहेगा तो वह चिंतामुक्त हो जाएगी.. देखिए बच्चा बनते ही कैसी उर्जा आ गई...राजमाँ चावल भी अच्छे बने..

    ReplyDelete
  5. वाह जिस दिन भी टोस्ट जलता है उस वो दिन खराब जाता है। कई बार ऐसा होता है। अब टोस्ट मत जलाना। बहुत अच्छा लगा जब नीचे लिखा पढा कि मां एक बहू ढूंढ लो। बहुत बढ़िया कुश..गजब। मजा आगया।

    ReplyDelete
  6. जरा गिलास बाहर निकालो थोड़ा पानी भी मिला लो..इस उम्र में neat नही पीते ....छपाक !
    हो गया धंधा आज ..इन्हे भी अभी बरसना था .....छपाक !
    हेल्लो हेल्लो सुनो ऑफिस की ऐसी तैसी जल्दी से नीचे आ जायो मै सीडियो पे खड़ा हूँ .....छपाक !
    एक कप चाय ,आलू के ढेर सारे पकोडे ,कोई रोमांटिक डी.व्.डी ....छपाक !
    नो ब्लोगिंग ....लाइट गुल है सुबह से ......छपाक !

    ReplyDelete
  7. वाह! कुश की कलम का जवाब नहीं!
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  8. शानदार! भाई कुश बहुत खूबसूरत पोस्ट है. छोटी-छोटी बातों की वजह से हम ये छपाक भूल जाते हैं.....

    ReplyDelete
  9. कुश जी
    काफी रोचक और शानदार लिखा है। पढ़ते समय पाठक बँध जाता है भाव और भाषा में। अति सुन्दरॉ बधाई

    ReplyDelete
  10. बहुत रोचक एवं प्रवाहपूर्ण कहानी. आनन्द आ गया, बहुत बढ़ियां.

    ReplyDelete
  11. छपाक छपाक छपाक ..... अजी वाह। आपकी कलम ने कैसे रंग बिखैर दिये। हम तो शुक्रवार को ही छपाक छपाक करते घुम रहे थे दिल्ली की गलियों।

    ReplyDelete
  12. छपाक .बढ़िया लिखा है इस बार भी कुश की कलम ने ..बहुत सही

    ReplyDelete
  13. chapaak...ye lijiye ham bhi kood pade aapke saath apne yaado me jame baarish ke paani me!

    Bahut bahut sundar

    ReplyDelete
  14. "बहुत सजीव -मानोँ आवाज़ हर तरफ फैल गई हो -"छपाक ! " :)
    - लावण्या

    ReplyDelete
  15. बहुत बढ़िया लिखा है..
    छपाक छपाक छपाक :)

    ReplyDelete
  16. बहुत खूब.
    आनंदम! आनंदम!
    छई छप्पा छई.
    छपाक छई.

    ReplyDelete
  17. छपाक , छपाक . . . . . . शानदार छपाक

    ReplyDelete

वो बात कह ही दी जानी चाहिए कि जिसका कहा जाना मुकरर्र है..