बादल ऑन ड्यूटी हो.. और चाय की तलब..!

बादल ऑन ड्यूटी हो.. और चाय की तलब..!  ऊपरवाले क्या खालिस ज़िंदगी दी है तूने....!  इस से बढ़िया कॉम्बिनेशन तो हो ही नही सकता..  झमाझम बारिश में नहाना किसी एक्स्ट्रा केरिकुलर एक्टिविटी की तरह हर ऑफीस मे होना चाहिए.. वरना सीट पे बैठे बैठे ठंडे मौसम में जो गर्म आहें निकलती है की  सी भी तड़प कर चार गाली दे मारता है..

वैसे इधर मौसम दो चार दिनों से अच्छा है.. ठंडी हवा चल रही है.. देखते है इंदर बाबू कब तक मेहरबान रहते है. प्लास्टिक की थैलिया जेब में रख कर घूम लो बॉ... मोबाइल और पर्स गीले नही हो जाए.. एंड डोंट माइंड थैलिया प्लीज़..! प्लास्टिक कैरी बैग्स भी बोल सकता था..  पर उस से मेरी भारतीयता को ठेस पहुचती और मैं तो ठहरा पक्का देसी.. वैसे बारिश की बात करे तो किसी ने ठीक ही कहा है.. हर बारिश की अपनी अलग कहानी है..


ड्रीम : ऑफिस की खिड़की से बाहर हवा में छलांग लगाके भीगना.. और कंप्यूटर को नाव की तरह पानी में बहा देना..
फैक्ट : ऑफिस की खिड़की से बाहर गिरती हुई बूंदों को देखना.. और फिर दिल पर चट्टानें रखकर कंप्यूटर की स्क्रीन में नज़रे गड़ा लेना..
 












ये गिरी एक और बूँद खिड़की पे..
रात
नौ से बारह राजनीति देखने का प्रोग्राम है ..अभी के लिए टाटा रहेगा..

45 comments:

draradhana June 7, 2010 6:45 PM  

चच्च्च्चचच ! बेचारे ऑफिस वाले! तरस आता है इनकी बेचारगी पर ... हमको देखो जब चाहा छत पर जाकर बारिश में भीग लिए या बालकनी में खड़े होकर अदरक की चाय की चुस्कियां ले लीं...keep it up ..पीसो चक्की ऑफिस में हम तो चले चाय बनाने ...by the way...बाहर बादल ऑन ड्यूटी हैं...

'उदय' June 7, 2010 6:49 PM  

...सुन्दर भाव!!!

kunwarji's June 7, 2010 7:01 PM  

:)

kunwar ji,

डॉ .अनुराग June 7, 2010 7:16 PM  

दिल पे कई चट्टानों का एवरेस्ट है भाई !!!!

Shekhar Kumawat June 7, 2010 7:21 PM  

ha mosam to achha he garmi se bhi kuch kuch rahat he

shikha varshney June 7, 2010 8:12 PM  

वरना सीट पे बैठे बैठे ठंडे मौसम में जो गर्म आहें निकलती है की ए सी भी तड़प कर चार गाली दे मारता है..
Good one.:)

अल्पना वर्मा June 7, 2010 8:51 PM  

सार ये ही है कि हर बारिश की अलग कहानी है ..
ये चित्र कहाँ से लाते हैं! ड्रीमि ड्रीमी चित्र है!
राजनीति बढ़िया है अगर राजनीति विषय में रूचि हो..हाँ ..रणबीर कपूर का अभिनय बेहद खास है.काईट से तो बेहतर ही है.

dhiru singh {धीरू सिंह} June 7, 2010 9:19 PM  

बारिश मे एक चिन्ता तो नही रहती मुझे .....मेरा मोबाइल वाटर प्रूफ़ है

राज भाटिय़ा June 7, 2010 9:52 PM  

बारिस की चिंता जी , लेकिन हमारे यहां नही.... क्योकि हम तो आदी है इस बरसात के ,चलिये जब पकोडे खाये तो दो चार हमारे हिस्से के भी खा ले

प्रवीण पाण्डेय June 7, 2010 10:26 PM  

बारिश एक अजीब सी बयार लाती है नयेपन की ।

मनोज कुमार June 7, 2010 11:19 PM  

चाय के साथ पकोड़ा भी होना चाइए जी, तब आएगा बारिश का मज़ा!

संगीता पुरी June 7, 2010 11:45 PM  

बारिश और फिल्‍म के साथ पकौडे .. मनोज जी सही कह रहे हैं !!

sepo June 7, 2010 11:55 PM  

nice post

मीनाक्षी June 8, 2010 3:01 AM  

हम जो आने वाले हैं इसलिए इन्द्रदेव पहले ही स्वागत के लिए आ पहुँचे :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी June 8, 2010 6:46 AM  

फोटू बहुत शानदार है।
उससे शानदार आपका ड्रीम...

लेकिन शब्दों से जो चित्र खींचा वह अव्वल है।

इलाहाबाद में बारिश का नामोनिशान नहीं और वहाँ राजस्थान में ठण्डा मौसम? मुझे ईर्ष्या क्यों न हो...?

रंजन June 8, 2010 10:00 AM  

सारा मजा कंप्यूटर पर ही ले लिया.. या पानी को छुआ भी..


वैसे.. हम बारिश में बाईक पर बैठ.... चौपासनी से सूरसागर होते हुए.. किले पर जाते थे.. किले से भीगते हुए शहर को खूब निहारते.... और वापसी में पावटा स्टेशन होकर घर पहुंचते... स्टेशन पर चाय.. और जालोरी गेट पर शाही समोसा जरुर खाते.... क्या दिन थे...

Shiv June 8, 2010 10:21 AM  

बहुत बढ़िया. बरसात से तुम्हें बहुत प्यार. पुरानी पोस्ट याद है.

और बरसात के लिए मुबारकबाद.

डा. अमर कुमार June 8, 2010 12:36 PM  


पर तुम तो कल सिर से पैर तक सूखे दिख रहे थे ?
जुकाम से बहुत डरते जो हो, और वह तुम्हें डराती रहेगी !
ऑफ़िस से शॉर्ट-लीव लेकर या क्लाइँट से मिलने के बहाने निकल लेना था ।
आह्हः, बारिश में भीगते हुये बाइक दौड़ाने का क्या मज़ा रहा करता था !
मैं और मेरी बीबी कराह उठते हैं, " कोई लौटा दे मेरे बीते हुये दिन... बुहू हू हू !"

नीरज गोस्वामी June 8, 2010 12:57 PM  

धन्य है बरसात जिसने तुमको इतने दिनों बाद फिर से ब्लॉग पर लिखने को मजबूर किया...बाहर बारिश हो रही हो और आप भीगना चाह कर भी न भीग पा रहे हों इस से अधिक दारुण स्तिथि क्या होगी...बहुत खूब लिखा है आपने...जयपुर में बरसात बहुत नहीं होती इसलिए जितना आनंद ले सकते हो लेलो...और हाँ आपके जोधपुर में तो जयपुर से अधिक छमाछम हो रही है...
राजनीति हमने भी परसों अंकित सफ़र के साथ देखी...अच्छी लगी...खासतौर पर सबका अभिनय कमाल का है...रणबीर ने बहुत व्यस्क अभिनय किया है...

नीरज

हिमानी June 8, 2010 4:13 PM  

बारिश और बेबसी को बढिया से परोसा है ब्लाग की थाली में

Parul June 8, 2010 4:26 PM  

wah..sir ..boondon ka lutf shbdon se ris raha hai..hum bhi intazaar mein hai mausam ke!!

रंजना June 8, 2010 4:52 PM  

कोई बात नहीं .....जल्दी ही मौसम मेहरबान होगा और ऑफिस टाइम के बाद भी बरसेगा...तो फिर ऑफिस से निकल भींग लेना मन भर....
राजनीति देख बताना कैसी लगी...
मुझे तो मायूसी हुई,क्योंकि सोचकर गयी थी,प्रकाश झा ने बनाया है.....कहानीकार जब व्यवसायी हो जाता है तो इसी तरह के प्रोडक्ट मार्केट में उतारता है...झा जी भी व्यवसायी हो गए हैं...

Satya.... a vagrant June 8, 2010 7:51 PM  

same here bhai..... baring programe of rajniti....
satya

Nisha June 8, 2010 10:51 PM  

achcha aur seedha likhte hai aap... aapka dream kuch jayada hi achcha hai.. bas dhayn rkhna k gir na jaayen aap.. aur mere blog par aane k liye shukriya, vahi se aapke blog ko padhne ka bhi avsar mila.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) June 9, 2010 12:14 AM  

बबुआ.. जैसे हमारी व्यथा दर्शा दिये हो.. बस मूड ही बूट करते रहते है .. और बडा तकलीफ़देह होता है कि बाहर बूदे तरस रही हो और अन्दर हम.. वैसे आशा भोसले जी का ये विडियो देखना जो उन्होने कल ही अपनी फ़ेसबुक प्रोफ़ाईल पर डाला है.. बारिश और भीगने लगेगी...
http://www.facebook.com/video/video.php?v=443834408744&ref=mf

Puja June 9, 2010 4:49 PM  

हमारे यहाँ बादल फुल टाइम ड्यूटी करते हैं. आज भी सीट से दिख रहे हैं :) तुम्हारे तरफ तो बस 'पे पर यूज' हैं...तो जब बादल आयें, बारिश हो, भीग लिया करो, इत्ता सोचने का क्या जरूरत है.

रंजना [रंजू भाटिया] June 9, 2010 6:23 PM  

आप तो तर लिए बारिश में ...खूब बरसे बादरवा अभी तक आपके देस में ...यही फोटो देख ली होगी

neelima sukhija arora June 10, 2010 12:45 PM  

:-))

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey June 12, 2010 11:05 AM  

हाय, इस फोटो वाली छोरी को अन्तत कौन से अस्पताल में भर्ती कराया गया! :(

अभिषेक ओझा June 15, 2010 2:24 PM  

पुणे में तो मस्त झमाझम बारिश हो रही है !

Vijay Kumar Sappatti June 15, 2010 4:11 PM  

har baarish ki alag kahani aur dil par chattan ... yaar kush , kaise likh lete ho aap itna acha , thoda sa hame bhi sikha do ..
man kaha kaha chala jaata hai

kshama June 16, 2010 10:05 AM  

Jis kisi tarah,baarish ka maza uthahi lena!

Apanatva June 18, 2010 9:31 AM  

yanha to garam garam pakoudiya khane ka programme ban raha hai.....
sabhee nimantrit hai.........
Rajasthan me to peacock ka naach dekhane layak hota hai......
acchee post ke liye aabhar....

Rakhshanda June 18, 2010 12:33 PM  

wow..barish mein bheegna meri kamzori hai...Mehdi hasan ki ghzal ho, surmai mousam ho,baraish aor ham...ek nasha sa chha jata hai..kabhi try kijiyega...

बेचैन आत्मा June 20, 2010 9:53 PM  

काश गिरती एक बूँद अपने भी छत पर.
हम बहाल हैं गर्मी से.

सुलभ § Sulabh June 23, 2010 4:38 PM  

ये बारिश सपने दिखा कर चली गयी, फिर से इन्तजार है.

Saumya June 23, 2010 6:18 PM  

hehe...i liked the dream and the fact....it's still not raining at my place :(
thank you for being on my blog.

गौतम राजरिशी June 24, 2010 8:32 AM  

इस ड्रीम और फैक्ट के बीच अटके पेन और एगोनी को समझ सकता हूं...शीर्षक ने एकदम से भीगा दिया है और यहां इतनी दूर बिहार का ये गांव बारिश में मुस्कुरा रहा है।
निकट भविष्य में मुलाकात हो रही है ना अपनी...?

अपूर्व June 26, 2010 11:31 AM  

कम्प्यूटर से नाव हो जाने की अपेक्षा रखना उसके साथ ज्यादती है बॉस..बेचारे को वैसे भी पानी से अलर्जी रहती है..बारिश मे तर-बतर सड़क पर चलते हुए फ़ुहार मे भीगने का मजा हम ही ले सकते हैं..अगर हम कम्प्यूटर नही हैं... :-)

अनूप शुक्ल July 2, 2010 8:03 AM  

किसी ने यह दुआ क्यों नहीं की कि तुम्हारा कम्प्यूटर नाव बनने के ही काबिल रह जाये। :)

वन्दना अवस्थी दुबे July 3, 2010 11:36 PM  

ऑफ़िस में होते हुए सचमुच बारिश कभी न हो, भले हे थोड़ी गरमी और बर्दाश्त कर लें....

Priya July 4, 2010 4:00 PM  

Ye barish kis chidiya ka naam hai ? jo hamko mil jaaye to do slap pakke....aap log blog hi geela karo likh likh kar....hamari to memory se hi barsaat kya sare synonyms hi gayab hai :-)

Bhim Prasad Ghimire July 8, 2010 7:17 PM  

कुशजी,
बहुत बढिया ।
मेरी हिन्दी अच्छी नही । फिर भी आप का नोट्स पढ्दा रहुँ तो बात बन जाये । आप की अफिस वाली इच्छा और कुण्ठा की प्रस्तुती पढ्ने के बाद मुझे कुछ शेयर करने की चाहत हुइ । आप के नोट्स मे मुझे फिल्म रक अन की शीर्ष गीत याद आइ । दिल करता है टीभी छावर पे मै चढ जाउँ ।
इजाजत हो तो मै भी कुछ शेयर करुँ । मेरा काम कुछ ऐसा है, रात के १२ तो बज ही जाते है । कभी काम जल्दी निपटाने की इच्छा हुइ की उसी दिन रात को ही कोइ विशेष खबर के लिए तथ्य जुटाना, भाषा देखना और पेज पर डिजाइन बनाने की दिक्कत नियमितता है । मौसम बारिश का है । इसलिए मेरा छोटा सा सहर मे १० बजे के बाद रात को चाय पिने की चाहत पुरी करनी हो तो अस्पताल के आगे जाना होता है । १२ कट जाये तो कभी बारिश मे भिगते वहाँ जाते है । चाय पिते है । और घर जाते है । विजली चमकती है । रास्ते पे कागज, प्लाष्टिक हवा के साथ होता है । आदमी तो क्या और दिन दुर तक मोटरसाइकलका पीछा करनेवाला कुत्तों का समूह नही होता । जैसा भी हो बारिश का मौसम दुसरे ही प्रकार की मजा देती है । धन्यवाद

कुश July 9, 2010 2:44 PM  

@भीम प्रसाद जी
ये छोटी छोटी बाते ही तो ज़िन्दगी को हसीं बनती है.. हिंदी से ज्यादा परिचय ना भी होते हुए आपने ब्लॉग पढ़ा और अपने विचार बांटे इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद्.. अब तो लगता है हमको भी नेपाली सीखनी पड़ेगी..

सागर July 14, 2010 12:49 PM  

हम तो खूब नहाये अबकी बरसात में... बॉस ने टांग भी नहीं adayaa

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वो बात कह ही दी जानी चाहिए कि जिसका कहा जाना मुकरर्र है..

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जयपुर, राजस्थान, India
खुद को ढूँढने की कोशिश में कितने ही थानों पर अपनी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा चुका हूँ.. भूली हुई याददाश्त साथ लेकर जितना जिया जा सकता है उस से थोडा सा ज्यादा जी रहा हूँ.. ईश्वर की बनायीं दुनिया से अभी तक विश्वास उठा नहीं है.. इसलिए अभी तक यही पड़ा हूँ.. बर्दाश्त की हद से थोडा ज्यादा बर्दाश्त कर लेता हूँ.. गुलज़ार को समझने की कोशिश जारी है.. अनुराग जैसा सिनेमा बना लु तो कुछ सुकून मिले.. दोस्तों की फेहरिस्त लम्बी है.. पसंदीदा फिल्मो की फेहरिस्त लम्बी है, क्या कहूँ साला यहाँ ख्वाहिशो की फेहरिस्त लम्बी है.. यहाँ वहां जब कही कुछ बात नहीं बनी तो ब्लॉग बना लिया..देखते है इस से अब कब तक बनती है..

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