उछालता कोई मुझे तो..



उछालता कोई मुझे तो
खिलखिला देती...
मुस्कुराता कोई तो
पलकें हिला देती..

पूछता कोई जो कुछ
जवाब आँखें हिला कर देती..
गोद मैं उठाता कोई तो
उसे गीला कर देती..


डाँटता कोई मुझे तो
झटमूट् रोती..
आती जब नींद तो
माँ की गोद में सोती..

मम्मी की पहन साड़ी
श्रृंगार मैं करती..
आ जाए ना कोई कमरे में
इस बात से डरती...

दादा को पकड़ कर
घोड़ा मैं बनाती..
ज़्यादा तो नही पर
खाना, थोड़ा मैं बनाती..

होती जब बरसात
ख़ूब मैं नहाती..
काग़ज़ की कश्तिया
पानी में बहाती..

फिर बड़ी हो जाती और
झूलती झूलो पे..
बन जाती तितली कोई और
घूमती फूलो पे...

सोमवार की पूजा के
फूल मैं चुनती..
आएगा कोई जो
उसके ख्वाब मैं बुनती..

ले जाता मुझे कोई
डोली में बिठाकर..
पलकों की छाओ में
आँखो में लिटाकार...

अपना फिर छोटा सा
परिवार मैं बनाती..
खशियो से सज़ा सा
संसार बसाती..

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....

-------------------

48 comments:

रंजन July 13, 2009 11:44 AM  

बहुत प्यारी कविता कुश.. काश कोई समझ ले तो १००० पर ८०० न हो...

विवेक सिंह July 13, 2009 11:46 AM  

कुछ कहा नहीं जाता !

गला रुँध गया है ,
आँखें भर आयीं हैं,
कविता ने दिल तो छू लिया है,
हड्डियाँ हमने मुश्किल बचायीं हैं !

Nirmla Kapila July 13, 2009 11:51 AM  

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....
कुश जी लाजवाब रचना है बस लोग उसे जन्म ही नहीं लेने देते बहुत सुन्दर रचना के लिये बधाई आशीर्वाद्

ओम आर्य July 13, 2009 12:05 PM  

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती...
IN PANKTIYON PAR SAB KUCHH KURABAN HO GAYA ......WAAH ....WAAH.....WAAH....WAAH ....ATISUNDAR

डॉ. मनोज मिश्र July 13, 2009 12:23 PM  

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....
कुश भाई, सारा दर्शन इन्ही लाइनों में आपने निरुपित कर दिया है.

लवली कुमारी / Lovely kumari July 13, 2009 12:32 PM  

दुखद, किन्तु सत्य.

सुशील कुमार छौक्कर July 13, 2009 1:19 PM  

सादे शब्दों से एक कटु सत्य कह दिया।
बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....

अद्भुत।

रंजना July 13, 2009 1:36 PM  

तुम्हारी इन पंक्तियों ने आवेश उद्वेग क्षोभ रुदन और न जाने क्या क्या भर दिया है.........

मैंने अपने सामने अपने आस पास कईयों को ,जो किसी भी मायने में ऐसी आर्थिक परिस्थिति के नहीं जो की अपनी संतान का भरण पोषण विवाह न कर सकें....पुत्र लालसा में भ्रूण परीक्षण कराकर कन्या भ्रूण हत्या करवाते देखा है...एक नहीं कई कई बार......

और यह पति या परिवार के दवाब में नहीं अधिकतर स्त्रियाँ स्वेच्छा से करती हैं....कुछेक के तो मैंने पैर तक पकडे....उन्हें पूर्ण आश्वासन दिया की वे उस बालिका को मुझे दे दें,मैं उन्हें अपनी संतान बनूंगी....पर किसी तरह उनके कठोर ह्रदय को न पिघला सकी..........

क्या कहूँ.........आने वाले समय में पूरी मानवता इसका मूल्य चुकायेगी,देखना.....

Shiv Kumar Mishra July 13, 2009 2:37 PM  

सुन्दर कविता है. और क्या कहूँ?

Prem Farrukhabadi July 13, 2009 2:57 PM  

ले जाता मुझे कोई
डोली में बिठाकर..
पलकों की छाओ में
आँखो में लिटाकार...

bahut achchha laga !!

जितेन्द़ भगत July 13, 2009 3:05 PM  

ये पीड़ा एक अजन्‍मी बालि‍का का है, ये स्‍वप्‍न एक अजन्‍मी बालि‍का का है। मार्मि‍क अभि‍व्‍यक्‍ति।‍

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) July 13, 2009 3:08 PM  

हृदयस्पर्शी..

नीरज गोस्वामी July 13, 2009 3:15 PM  

अत्यंत मार्मिक रचना...अजन्मी बच्ची का दुःख बहुत खूब कहा है आपने...पूरी रचना आपके आपने खास रंग में है...वाह
नीरज

ताऊ रामपुरिया July 13, 2009 3:16 PM  

बहुत सुंदर कविता.

रामराम.

संजय बेंगाणी July 13, 2009 4:17 PM  

भई होँठ सीले है, क्या बोलें?

Arvind Mishra July 13, 2009 5:02 PM  

ओह !

Udan Tashtari July 13, 2009 6:02 PM  

विकट मार्मिक!!

महामंत्री - तस्लीम July 13, 2009 6:05 PM  

बहुत ही कोमल एहसास हैं। तारीफ के लिए शब्‍द कम पड रहे हैं।

HEY PRABHU YEH TERA PATH July 13, 2009 6:06 PM  

कुश भाई खुस कर दिया। कविता मे पारिवारिक सम्बन्धो मे अपकी अभिव्यक्ति ने प्यार, अपनापन, मेरे भी मन मे घोल दिया है। भाई मजा आ गया। अपने राजस्थान के परिवेश मे घर परिवार की मिठ्ठी यादो को सजोया जा सकता है। शहरी वातावरण ऐसी मुल्यवान पारिवारिक कृति बनने बनाने मे असमर्थ ही लगती है।

आभार/मगलभवो के साथ
मुम्बई टाईगर
हे प्रभु य ह तेरापन्थ

dhiru singh {धीरू सिंह} July 13, 2009 7:46 PM  

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एक मार्मिक रचना

cmpershad July 13, 2009 8:45 PM  

बढ़े चलो, बढ़े चलो -- मगर बढे़ तो हम कहाँ?
कि रास्ता ही जब नहीं, तो डाल दें कदम कहाँ?
---भारत भूषण अग्रवाल

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey July 13, 2009 9:29 PM  

पढ़ना अपने को दुखी करना है।
अच्छा लिखा जी।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी July 13, 2009 10:33 PM  

मार्मिक!
काश सभी जन्मी-अजन्मी बेटियों का यह सपना पूरा होता।

अनिल कान्त : July 13, 2009 10:59 PM  

बहुत अच्छी कविता है कुश भाई

Ashish July 13, 2009 11:55 PM  

अब क्या बोलें कुछ बोलने के लिए शब्द नहीं है मिल रहा है. बस आँखें नम हो गयी.

Ratan Singh Shekhawat July 14, 2009 7:24 AM  

सुन्दर कविता

डॉ .अनुराग July 14, 2009 11:11 AM  

कन्या भ्रूण हत्या प्रकति से असंतुलन प्रक्रिया का एक ओर कदम है आदम जात का ...ठीक वैसे ही जैसे धीरे धीरे बाकी प्राणी लुप्त हो रहे है इस धरती से आदमी के सिवा...समलिंगी होना भी प्रकति का असंतुलन है ....जिस चीज से प्रकति आगे बढती है .जैसे की किसी नन्हे शिशु का जन्म ...वही कुदरत का नियम है ....हम इसमें अपनी दखलंदाजी करेगे .तो अपनी जाती ओर आगे आने वाले समाज का नुक्सान ही करेगे .

कंचन सिंह चौहान July 14, 2009 11:28 AM  

पता नही कैसे, मगर कभी कभी तुम इतना संवेदनशील लिख देते हो कि विश्वास ही नही होता कि तुम जैसा हमेशा मजाक करते रहने वाला व्यक्ति जिंदग के फलसफ़ों को इतनी गहराई से सोच कर फिर पन्ने पर उतारता होगा...!

बहुत अच्छा लिखा कुश...!

raj July 14, 2009 12:18 PM  

very toching......

रंजना [रंजू भाटिया] July 14, 2009 8:26 PM  

नन्हा फूल कोख में ही जब मुरझा जाता है तो कुदरत भी रो देती होगी .कितने सपने यूँ ही खिलने से पहले ही टूट जाते हैं...मार्मिक लिखी है यह रचना ..

शोभना चौरे July 14, 2009 11:48 PM  

ankho ko to bhigoya hi anrman tak bhigo gai ye
sarthak rachna .kalm jagrti to simit logo tak hi phunch payegi kuch aisi jagrti laye kalm ke sath jo jan jan tk phunch paye .

अल्पना वर्मा July 15, 2009 1:46 PM  

कविता दिल को छू गयी.

न जाने कब sthiti sudheregi?

सैयद | Syed July 15, 2009 11:37 PM  

बेहतरीन कुश भाई.... दिल को छूने वाली पंक्तियाँ...

राज भाटिय़ा July 16, 2009 1:25 AM  

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....
अरे आप की कविता सीधी दिल मै उतर गई, बहुत भावुक कर दिया आप ने.
धन्यवाद
अभी मैने इसे ब्लांगबाणी से खोलने कि कोशिश कि लेकिन वहा से आप का ब्लांग नही खुल रहा था.

गौतम राजरिशी July 16, 2009 8:51 AM  

मन की कितने परते भीगती चली गयी...सामान्य-साधारण शब्दों में एक अनूठी रचना...

तुम नीरज जी से बार-बार "मंटो" के बारे में पूछते नजर आ रहे हो? यदि मासिक पत्रिका "नया ग्यानोदय" अभी मई वाला अंक पा सको कहीं से तो तुरत खरीद लो। ये अंक मंटो को समर्पित है। खास कर कृश्न चंदर द्वारा लिखा हुआ संस्मरण...पत्रिका नहीं मिले तो लिखना, मेरे पास दो प्रति है। एक भेज दूँगा!

M.A.Sharma "सेहर" July 16, 2009 1:19 PM  

संवेदनशील अभिव्यक्ति है..
मासूम पर मार्मिक !!

varsha July 17, 2009 3:28 PM  

pyari si kavita mein badi si chinta..........

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` July 18, 2009 7:30 AM  

अनुराग भाई का और कुश भाई आपका ब्लोग
सिर्फ मोज़ील्ला से ही देख पा रही हूँ -
खास आप दोनोँ के लिये मोज़ील्ला लगाया
ताकि,
कमेन्ट कर पाऊँ !
...ये कविता की चर्चा पहले पढ चुकी हूँ .
.सँवेदना का सागर उमड पडा है ..
काश !
कोई माँ इसे पढे, जाने और ऐसी बच्ची
सँसार की सुँदरता मेँ चार चाँद लगाने के लिये
ज़िँदा रह जाये तो कितना अच्छा हो !
ना जाने कब रुकेगी ये विनाश लीला ? :-(
बहुत बढिया लिखा है ..
यूँ ही लिखते रहेँ
स स्नेह,
- लावन्या

neelima sukhija arora July 18, 2009 11:41 AM  

काश सभी जन्मी-अजन्मी बेटियों का यह सपना पूरा होता।

अभिषेक ओझा July 20, 2009 1:02 AM  

प्यारी सी तस्वीर घुमती रही आँखों के सामने बस आखिरी लाइन....

राधिका उमडे़कर बुधकर July 21, 2009 9:45 AM  

ग्रेट .....बस और क्या कहूँ शब्द नहीं हैं मेरे पास .

महामंत्री - तस्लीम July 21, 2009 7:09 PM  

Adbhut bhav piroye hain
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

तरूश्री शर्मा July 23, 2009 3:12 PM  

bahut badhiya Kush.... Antim panktiyan jaan dal gayi kavita me!!!

डा. अमर कुमार July 25, 2009 12:13 AM  


यह मासूम सी चाह बड़े मार्मिक तरीके से रखी गयी है, पग पग उलाहना देती हुई सी यह घुटी चीख ज़वाब माँगती है ।
पर किससे... एक अपने समाज की माँगों को पूरा न कर पाने की भयभीत विकृत मानसिकता से, याकि उस सामाजिक व्यवस्था से जो इसकी जड़ों में है ? पहले बिन्दु पर तुम सफ़ल रहे हो.. पर इसके आगे ?

डा. अमर कुमार July 25, 2009 12:15 AM  

पुनः -







































इसे एप्रूव कर देना जी !

नीरज जाट जी July 24, 2009 7:34 PM  

kavi kush- jindabad.

kshama July 29, 2009 1:05 PM  

Beshak...behtareen 'kavita' kahte hain aap...!

http://kshama-bikharesitare.blogspot.com

संगीता-जीवन सफ़र July 29, 2009 3:59 PM  

जब केवल वाह निकले-बहुत सुंदर!

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कुश
जयपुर, राजस्थान, India
खुद को ढूँढने की कोशिश में कितने ही थानों पर अपनी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा चुका हूँ.. भूली हुई याददाश्त साथ लेकर जितना जिया जा सकता है उस से थोडा सा ज्यादा जी रहा हूँ.. ईश्वर की बनायीं दुनिया से अभी तक विश्वास उठा नहीं है.. इसलिए अभी तक यही पड़ा हूँ.. बर्दाश्त की हद से थोडा ज्यादा बर्दाश्त कर लेता हूँ.. गुलज़ार को समझने की कोशिश जारी है.. अनुराग जैसा सिनेमा बना लु तो कुछ सुकून मिले.. दोस्तों की फेहरिस्त लम्बी है.. पसंदीदा फिल्मो की फेहरिस्त लम्बी है, क्या कहूँ साला यहाँ ख्वाहिशो की फेहरिस्त लम्बी है.. यहाँ वहां जब कही कुछ बात नहीं बनी तो ब्लॉग बना लिया..देखते है इस से अब कब तक बनती है..
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