Friday, March 13, 2009

छम्मक छल्लो.


ये कहानी है मेरी एक शोर्ट फ़िल्म की जो मैंने अभी शुरू की है.. .इस से पहले मेरी जिन कहानियो पर शोर्ट फिल्म्स बना चुका हु वे है.. पन्ने हवा में अभी भी उड़ रहे थे.., ज़िन्दगी कभी यू भी मुड़ जाती है.., एक सिगरेट और जल गई.. अब शुरू करते है मेरी नई फ़िल्म की कहानी














कौन वो छम्मक छल्लो..

अरे तू भी कहा लेकर बैठ गया उसको.. आने दे हम निपट लेंगे उससे.. तू टेंशन मत ले उसकी.. भाई जी ने इतना बोलके माहोल को ठीक किया.. चाय का ऑर्डर दे दिया गया.. रेडियो पर मैच की कमेंट्री चल रही थी.. और ये मारा सचिन ने सिक्सर.. जय हो.. सब एक साथ चिल्लाए.. छोटू ज़रा आवाज़ तेज करियो रेडियो की..

खटाक और रेडियो बंद.. सबने नज़र उठाकर देखा.. सामने वो खड़ी थी..

"क्या देख रहा है बे?" आते ही वो गरजी

"जो देखना है वो दिखाएगी क्या?" लड़का बोला.. और सब उसकी मर्दानगी पर हो हो करके हँसने लगे..

पीली सलवार कमीज़ पहने एक लड़की पीछे खड़ी थी.. उस लड़की ने आगे बुलाया.. "मुझे बता कौन था इनमे से.."

"मैं था.. बोल के करेगी?" एक और बोला..

"तेरे बड़े हाथ चलते है.. लड़कियों पर," वो लड़की बोली

तुझपर भी चलाऊ क्या?

उस दिन तो बहुत बोल रहा तू मेरे कपड़ो के बारे में की ऐसे कपड़े पहनोगी तो छेड़ेंगे नही तो क्या करेंगे... आज तो सलवार कमीज़ पहनी थी इसने.. फिर क्या हो गया..

"तू कौन कलेक्टर है?.. ज़्यादा सती सावित्री ना बन.. सब खबर है मणे.." भाई जी बोले

तुझसे बात नही कर रही हूँ तू चुप कर..

क्यो चुप करे भाई.. तू कैसी है सब जानते है.. उस रात को होस्टल से तू भी तो गायब थी.. बड़ी आई वकालत करने..

तू अपने काम से मतलब रख.. इन लड़कियों को छेड़कर मर्द बनता है.. मुझे हाथ लगाता फ़िर देखती..

"लो बोलो ये देखती भी है.. मुझे तो लगा सिर्फ़ दिखाती होगी.." फिर से उसकी मर्दानगी पर सब ज़ोर से हँसे..

देख तू हमसे पंगा मत ले वरना बीच बाजार जो हालत करूँगा तेरी.. किसी को मुँह दिखाने लायक नही रहेगी..

और तू कर भी क्या सकता है.. लड़कियो के पीछे हाथ मारकर मर्द बनता है..

ए छोरी! बहुत हो गयी रे तेरी ठिकचिक ठिकचिक.. चल अभी रस्ता नाप वरना अभी तक तो सिर्फ़ हाथ मारा है..तू हमें जानती नही हम और भी क्या क्या कर सकते है

दीदी चलो.. पीछे खड़ी सलवार कमीज़ वाली लड़की बोली.. दीदी प्लीज़ चलो. मुझे कुछ नही करना..

सुन ले क्या बोल रही है वो.. और निकल ले यहाँ से..

"पहले माफी माँग इस से.." लड़की बोली

देख भई छम्मक छल्लो सीधी बात तो थारे भेजे में ना घुसे.. अब तू सुन मारी बात.. ये कॉलेज है शिक्षा का मंदिर.. यहाँ पर थारे जैसी छोरी की कोई जगह नही.. जो जीण पहने.. दारू पिए.. रात बिरात देर से होस्टल में घुसने वाली छोरी हमारे कॉलेज में तो ना पढ़ सके है.. क्यो भाइयो..

हा हा और क्या हमने तो सुना है.. कल रात चार चार लोंडो के साथ थी ये..

तमीज़ से बात कर साले वरना ज़बान खींच लूँगी..

"चुप कर साली !" भाई जी बोले
वीरू ज़रा बुला के ला रे सबको.. इसका फ़ैसला यही कर डालते है.. अब या तो ये रहेगी कॉलेज में या हम..

सारे लड़के लड़कियो को मैदान में इक्कठा कर लिया गया.. वीरू की गर्लफ्रेंड अपने साथ बाकी की लड़कियो को ले आई.. सारे लड़के लड़की आकर खड़े हो गये.. भाई जी उठा और लड़की के शॉर्ट टॉप की तरफ इशारा करके बोला.. ये देखो ये उघाडे बदन घूमने वाली छोरी मर्यादा की बात करती है.. जैसे कपड़े ये पहनती है.. उसका हमारी बहनो पे बुरा असर पड़ता है.. हम ऐसी छोरियों के कॉलेज में रहते पढ़ाई नही करेंगे..

पीले सलवार कमीज़ वाली लड़की की बहन भी आ गयी थी.. उस से दो साल सीनियर उसने आते ही भाई जी से माफी माँगी और अपनी बहन को ले गयी..

कितनी बार मना किया तुझे इस लड़की के साथ मत रहा कर..

पर दीदी वो..

चुप कर.. किसने कहा था अकेले क्लास रूम जाने को.. अगर घर पे पता चल गया ना तो इंजीनियर बनने के ख्वाब भूल जाना..

"भाईयो आप ही बताओ क्या ऐसी लड़की कॉलेज में रहनी चाहिए.." भाई जी की आवाज़ गूंजी

नही बिल्कुल नही.. सबने यही जवाब दिया.. जो कुछ नही कहना चाहते थे उन्होने भी नही कहना ही ठीक समझा..सारी लड़किया भी यही कह रही थी ऐसी लड़कियों को नही रहना चाहिए कोलेज में.. पीली सलवार कमीज़ वाली ने हाथ तो उठा रखा था पर नज़रे नही

"तो ठीक है फिर कल सुबह डाइरेक्टर तक अर्जी पहुँचा दी जाएगी.." इतना बोल के भाई जी उसकी तरफ़ मुडे

देख लिया हमसे भिड़ने का अंजाम.. कॉलेज से भी जाएगी और इज़्ज़त से भी.. और जे तू चाहती है इन लफडो में नही पड़ना.. तो भाई जी की बात मान और शाम को होस्टल के इक्कीस नंबर कमरे में आ जाना..तेरे सारे पाप धुल जायेंगे..

The End

40 comments:

  1. बहुत भयावह चित्रण कर दिया.. लेकिन लगता है आस पास का ही कोई दृश्य हो.. क्या कहें? part २ लिखो.. शायद कुछ उम्मीद जगे.. कहानी में ही सही..

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  2. क्या धाँसू पटकथा है ?

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  3. शॉर्ट फिल्म का विषय तो यह कदापि नहीं लगता.. इस पर तो ५२ कड़ियों का पूरा एक धारावाहिक बन सकता है.. आपकी ही काबिलियत है कि इसे शॉर्ट फिल्म में समेट देंगे.. :)

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  4. भाई के रूप में उस समाज के लोगों का चित्रण किया है इस कहानी में जो आज भी लड़की को सिर्फ कमजोर समझते हैं ..बहुत कुछ बदल चुका है पर लगता है कि अभी भी बहुत कुछ बदलना बाकी है ..लिखते तो आप हमेशा जी अच्छा है और जब यह सच के करीब हो तो और भी दिल को छू जाता है . अभी आपकी पिछली कहानी सिगरेट भी जहन से नहीं उतरी है

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  5. मुझे इस अंत की उम्मीद नहीं थी...आपने लिखा है तो फिर ये ही ठीक होगा...लेकिन इस से भाई जी टाईप लोगों को बल ही मिलेगा...
    नीरज

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  6. देख लिया हमसे भिड़ने का अंजाम.. कॉलेज से भी जाएगी और इज़्ज़त से भी.. और जे तू चाहती है इन लफडो में नही पड़ना.. तो भाई जी की बात मान और शाम को होस्टल के इक्कीस नंबर कमरे में आ जाना..तेरे सारे पाप धुल जायेंगे..
    " oh horrible but fact also..."

    Regards

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  7. कम से कम कहानी में तो हैप्पी एंडिंग दे देते, ऐसी तल्ख सच्चाइयों से रु -ब रु होते होते घिन आने लगी है दुनिया से.

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  8. आखिरी लाइन पढ़कर झटका लगा । पर ये भी सच है कि इस तरह के लोग दुनिया और समाज मे मौजूद है ।

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  9. सच्चाई के करीब ये छम्मक छल्लो कुश भई । लेखन बेहतरीन

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  10. कुश पटकथा तो गजब की है, पर एंड में तो मुझे भी सबकी तरह धक्का लगा। हालांकि हर कहानी की अगर हैप्पी एंडिंग होने लगे तो दुनिया से विविधता ही गायब हो जाएगी। लेकिन कुछ भी कहें आप लिखते गजब का हैं और मैं आपकी लेखन को पसंद करती हूं।

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  11. क्या जरूरी है कुश भाई कि भोगा जा रहा यथार्थ लिख ही दिया जाय! मैं लवली जी की बात को ही स्वीकृति देना चाहूंगा । जो अच्छा लिख रहे हों, उन्हें जीवन का सकारात्मक दृश्य दिखाना चाहिये । कर्तार सिंह दुग्गल जी की बात सदैव मथती है मुझे - "अच्छी कहानी वह है जो अच्छे लोगों का जिक्र करती है, उन लोगों का जो अच्छे हैं, चाहे अच्छे बन चुके हैं, चाहे अच्छे बन रहे हैं । "

    शायद यहां भी अच्छे बन रहे लोगों का जिक्र है, कहानी अच्छी कही जा सकती है ।

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  12. कहानी तो निस्संदेह अच्छी है पर मुझे भी लगता है की अंत में कुछ ऐसा सन्देश जाना चाहिए जिससे भाईगिरी पर एक लड़की की हिम्मत और इच्छा शक्ति भारी पड़े!

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  13. और हां, आपकी ब्लोग लिस्ट में ’प्रथम’ की फ़ीड दो बार दिख रही है।

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  14. क्या कहूँ कुश भाई आज भी यह सच हैं। बैशक चाहे हमने कितनी ही तरक्की कर ली हो। काश मानसिक तौर पर भी तरक्की कर पाते ऐसे भाई जी। खैर अच्छा लिखा है आपने आज का सच।
    वैसे मैं भी एक कहानी लिखने की सोच रहा हूँ। सारा खाका दिमाग में हैं। बस पता नही क्यों कागज पर नही उतर रही है। कुछ टिप्स हो कहानी लिखने के बारें में तो जरुर देना, पहली बार सोच रहा हूँ कहानी लिखने की। और हाँ आपके ब्लोग का ये रंग भी पसंद आया।

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  15. इस कथा का अंत तो वैसा ही हो गया-कि बस इन्सान स्तब्ध और लाचार सा जैसे जी रहा है और जीता रहे. कुछ बदलाव का संदेश दो..वरना तो इस घुटन में सब हैं ही!!

    लेखन सशक्त है-बाँधे रखता है.

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  16. बेहतरीन है. फिल्म का एंड बढ़िया है.

    इससे बल भाई जी को नहीं बल्कि बाकी लड़कियों को मिलना चाहिए. लड़कियों के अन्दर बेबसी नहीं बल्कि ये भाव आयेंगे कि; "मैं अपने साथ ऐसा नहीं होने दूँगी."

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  17. एक्सीलेऐंट... जिंदगी की हकीकत से क्या मुंह चुराना? ये भाई जी हमारा ही आईना है. सुखांत के बजाये लडने का जज्बा पैदा करना ज्यादा अच्छा लगा..

    और अभी कहानी खत्म कहां हुई भाई? अभी तो पहला ही एपीसोड है. अब वो २१ नम्बर मे जायेगी या नही जायेगी? या वहां जाकर जूते मारेगी? ये अब अगले भाग मे देखेंगे हम लोग.

    अभी बहणों और भाईयो जाईयेगा मत. अभी कहानी खत्म नही हुई है. इसके आगे भी तो कहानी बचती है ना...????????????????

    रामराम.

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  18. अच्छी पटकथा है ! जारी रखें 1

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  19. भाई जी का इलाज मांगता।

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  20. mujhe bhi end jama nahin, jis ladki me itni himmat thi ki kisi doosre ke liye khadi ho ladkon se sawal kar sake, achanak se khamosh kaise ho jaati hai jab sawal karne ka, is tarah se ladkon se ulajhne ki himmat hai to aage bhi dekh lene ki himmat hogi usmein, usne kuch soch kar hi to baat chhedi hogi na ki chupchap kamra number 21 me jaane ke liye.

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  21. जैसा कि कहानी पढ़ कर लगा,यह किसी तकनीकी संस्थान के माहौल का चित्रण है.....हो सकता है मैं गलत होऊं,पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा माहौल किसी ईन्जीनीयरिंग संस्थान का हुआ करता है...साथ ही, आजतक जितना देखा है,आज की लड़कियों को इतना असक्त असहाय भी नहीं देखा है..
    हाँ,गुंडे मवालियों के सामने लडकी की स्थिति ऐसी होटी है,पर एक तकनीकी शिक्षण संस्थान में अपने सहपाठी या सीनियर के साथ ऐसा होना....विश्वास नहीं हुआ...

    पर हाँ यदि सचमुच ऐसा होता है,तो फिर कुछ भी नहीं कहने को...सिवाय इसके कि घोर निंदनीय....सच कहूँ तो पढ़कर मन बहुत बुरी तरह खिन्न हो गया....

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  22. सच है कि इस तरह के लोग दुनिया और समाज मे मौजूद है !!!!!

    पढ़कर मन बहुत बेचैन हुआ!!



    प्राइमरी का मास्टर
    फतेहपुर

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  23. काफी सच्चाई को दर्शाती पटकथा किन्तु अंत कुछ ......

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  24. ऐसे कई भाई लोगोँ की
    बोलती बँद होते भी देखी है
    जब अमरीकी सेना पहुँचती है
    तब सद्दाम
    बिल मेँ चूहे की तरह छिप जाते हैँ जी
    कथा सही लिखी है कुश भाई ..
    - लावण्या

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  25. mujhe to aapki patkathaa padkar hi ghinn aane lagi hai bhart ki durgaa ke liye aise tuchchh
    shabdon kaa pryog aprsaangik hai ,us sshakt ladki ke liye anuchit shabdon kaa pryog blog par to bilkul bhi uchit nahi hai ,sanskaarit vyakti kaa farz hai ki bhart ki naari ka sammaan kare or kewal aisi patkathaa likhen jisse ki sabko garv mahsoos ho ,naari kewal naari hi nahi hai wo hamaari maa ,bahan ,beti bhi hai.

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  26. छ्म्मकछल्लो जब तक अकेली रहेगी तब तक ऐसा ही या इसी तरह होगा।
    छम्मकछल्लो के साथ और लोगों को जुटना होगा।

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  27. हे भगवान कुश को कोई चशमा दे दे . पता नही ये क्या क्या देखता फ़िर रहा है . ऐसी बाते समाज को रुसवा करतॊ है कही नही जाती . इसी लिये गांधी ने भी तीन बंदर पकड रखे थे ऐसे मामलो मे उन्हे आगे कर देते थे कुछ बोलते नही थे .

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  28. मुझे तो ये कथा आधी लगी ....भाई जी कैसे है सब जानते है ओर अब तो भाई के कई संस्करण रोज निकल रहे है .अलग अलग कलर ओर अलग भाषायों में ..पेपर बैक सस्ते किताबी जिल्द वाले भी.हाँ छ्म्मकछल्लो जरूर अब डरती नहीं है ...ओर हैरानी की बात है वे भी बढ़ रही है

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  29. क्या कहूँ? मन तो कहता है छम्मकछल्लो का सा्थ देने सबको आगे आना चाहिए। जो दूसरों को जितना दबाते हैं वे असल में अपना भय छिपाने की कोशिश में लगे होते हैं। ऐसे लोगों को यदि सामूहिक रूप से दुत्कारा जाए तो वे भाग खड़े होएँगे। परन्तु मध्यम वर्ग में 'पंगा ना लो','कीचड़ में कमल की तरह रहो', 'अपने काम से काम रखो' आदि ब्रह्म वाक्यों से जन्म से ही बच्चों को लैस कर दिया जाता है। सामना करना हम न सीखे थे न सिखाते हैं।
    घुघूती बासूती

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  30. achcha chitran hai.. lekin mujhe thodi adhoori si lagi.. Ladki(d female protagonist) ke character ko thoda aur ubhaara jaa sakta thaa.. baaki sabhi characters ke sketch sahi hain lekin finally usaka character thoda confuse karta hai...
    ye mere vyaktigat vichar hain.. main galat ho sakta hoon.. :)

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  31. पटकथा आर्ट फिल्मों वाली लगी..ऐसा लगता है कहीं कुछ छुट गया है इस में.
    हर तरह के लोग हैं इस समाज में ,एक पहलू यह भी दिखाया है आप ने .

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  32. कब रिलीज हो रही है फिल्म, ये तो बॉक्स आफिस के सारे रिकार्ड तोड डालेगी।

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  33. त्रिवेणी कहानी!!!

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  34. and where is link of ur short films??????

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  35. This comment has been removed by the author.

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  36. Kush bhai yeh to badi galat baat hui :-( This blog is open to invited readers only
    http://coffeewithkush.blogspot.com/

    y m nt invited for this blog :-(

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  37. This comment has been removed by the author.

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  38. अब इस पटकथा पर बनी फिल्म देखने के बाद जैसे चुप-चाप गंभीर होकर थियेटर से बाहर निकला जायेगा वैसे ही निशब्द !

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  39. यह कथा नहीं सच्चाई लगती है। एक नंगी सच्चाई। आप का लेखन मेरे वेवलेन्थ से काफी मिलता है। खुलकर नंगा कीजिए खोखले आदर्शों को और खुरच कर खोल दीजिए वह कल‍ई जो सफेदपोशों ने अपने आभामण्डल को तैयार करने में पोत रखी है।

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वो बात कह ही दी जानी चाहिए कि जिसका कहा जाना मुकरर्र है..