पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..












पतले चक्कों वाली सायकिल
पर पैंडल मारते मारते
शहर के दुसरे कोने
में आ गए..
अब बस्ते रख दिए है
पेड़ से सटाकर..
और मोजो को
जूतों में खिसका दिया है..
कोहनी का तकिया बनाकर.
लेट गए है मिट्टी में
और देखते हुए
आसमान में
मुस्कुराकर कहते है.. कि साला
पी टी आई जो पकड़
लेता तो धुनाई बहुत होती..

कुछ देर सुस्ताकर
खोलते है टिफिन
मेथी के परांठो
की खुशबू लुटा देते
है आसमानों में..
अब एक टांग पे टांग
टिकाये गिनते है
अंटी के सिक्को को..
और खरीद के पतंग
चाँद तारो वाली
बस्ते से चरखी..
निकाल लेते है..

लम्बी तान पतंग को देके..
बस ऊपर ही तकते है..
कट जायेगी जब
दस पांच पतंगे..
झाड के पैंट को अपनी..
बस्ते में चरखी धर लेंगे..
सायकिल पे रख के बस्ता अपना
फिर से घर को चल लेंगे..

जो कहते है
ऐसा हाल रहा तो
आगे जाकर क्या करोगे?
उनकी हमको फ़िक्र नहीं
आफ्टर आल अभी
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..

51 comments:

सागर December 6, 2010 6:04 PM  

Order Order !

Mast hai

रंजन (Ranjan) December 6, 2010 6:28 PM  

मस्त!!

अरविन्द जांगिड December 6, 2010 6:36 PM  

सुन्दर चित्रण किया है आपने परिवेश का, आभार स्वीकार करें.

PD December 6, 2010 6:41 PM  

जियो गुरु.. जवानी छा रही है पहले पिम्पल फूटने के बाद.. :)

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey December 6, 2010 7:23 PM  

अच्छा है। कर लो यह सब। हमने नहीं किया तो अब तरसते हैं कि मिस कर दिया कुछ।
कुछ न कुछ मिस करना है, तो जो बच सकता है, बचा लो!

डॉ .अनुराग December 6, 2010 7:33 PM  

अरसे बाद वो कुश मिला ......

love you in this mood.......keep it up bro.....

manorath-sameer December 6, 2010 8:28 PM  

original ...कुश. मजा आ गया.

dhiru singh {धीरू सिंह} December 6, 2010 8:51 PM  

जवानी कुछ ही कदम दूर है ............. बहुत अच्छा लगा पढकर

प्रवीण पाण्डेय December 6, 2010 9:53 PM  

नये बिम्ब, जीवन को व्यक्त करने के।

प्रवीण पाण्डेय December 6, 2010 9:53 PM  

नये बिम्ब, जीवन को व्यक्त करने के।

SEPO December 6, 2010 10:29 PM  

aapke post ne school ki yaad dila de!

डॉ॰ मोनिका शर्मा December 6, 2010 11:30 PM  

जो कहते है
ऐसा हाल रहा तो
आगे जाकर क्या करोगे?
उनकी हमको फ़िक्र नहीं
आफ्टर आल अभी
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..

उम्र का दौर जो बना दे या बिगाड़ दे ...... नए बिम्ब के साथ हकीकत परक चित्रण .......

Shiv December 7, 2010 11:40 AM  

वाह ही वाह
कैसे कैसे दिन याद दिलाते हो. वाह

pallavi trivedi December 7, 2010 11:40 AM  


आसमान में
मुस्कुराकर कहते है.. कि साला
पी टी आई जो पकड़
लेता तो धुनाई बहुत होती..

mast likha hai...ekdum mast.

दीपक बाबा December 7, 2010 12:47 PM  

आफ्टर आल अभी
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है.



बिंदास..... बधाई हो.......
गलत मत समझना - पिम्पले फूटने की.

Puja Upadhyay December 7, 2010 12:58 PM  

हाय कित्ता क्यूट पिम्पल फूटा है लड़के को...बड़े दिन बाद इस मूड की पोस्ट लिखी है. झकाझक है एकदम.

नीरज गोस्वामी December 7, 2010 5:20 PM  

डा.अनुराग सही कह रहे हैं...खोया कुश वापस लौट आया है...ये है पक्की कुश नुमा रचना जिसे पढ़ कर इंसान हो जाता है खुश...वाह रे कुश.

नीरज

cmpershad December 7, 2010 5:40 PM  

हाय दैय्या! पोट्टा जवान हो चला:)

sanjay jha December 7, 2010 6:13 PM  

pimple phootna ..... jawan hona

leo kuch to sikh ke jaoon....

thora bakhat kam lijiye....bar bar lautna
achha nahi lagta....mast rahiye...bindas likhiye..

Sonal Rastogi December 7, 2010 6:44 PM  

कुछ ऐसी बचपन वाली पोस्ट और डालिए.. मौसम ताज़ा हो जाता है

mukti December 7, 2010 10:20 PM  

उफ़ ! जवानी के दिन याद आ गए :-)

abhi December 7, 2010 10:35 PM  

मस्त है कुश भाई...मस्त एकदम :)

sanjay vyas December 8, 2010 4:21 AM  

बोले तो एकदम झक्कास.खूब लिखा है.
उन्मुक्त भाव को दिए हैं बढ़िया शब्द.

saanjh December 8, 2010 10:25 AM  

unbelievable...!! main yahan pehle kyun nahin aayi...jus simply tooooo good

antas December 8, 2010 11:29 AM  

loved it

कंचन सिंह चौहान December 8, 2010 1:02 PM  

:-/)

:) :)

:D :D :D

Rakesh Jain December 8, 2010 1:05 PM  

बहुत बढ़िया सर...आखिर "सुखा" खत्म हुआ..वो भी एक बेहतरीन "पिम्पल" पोस्ट के साथ...:)

संगीता स्वरुप ( गीत ) December 8, 2010 3:10 PM  

अच्छी अभिव्यक्ति ..स्कूल से भाग कर जवानी को समझती हुई ...

POOJA... December 8, 2010 8:42 PM  

wow... awesome...
बचपन को कितने अच्छे से सजा दिया इस कविता में...
पर मेथी के पराठे... भूख लग गई...
but pimple??? ;)

वर्षा December 9, 2010 9:05 AM  

बहुत शानदार, मज़ेदार, बचपन कितना कीमती होता है...

अल्पना वर्मा December 9, 2010 9:30 AM  

रिफ्रेशिंग !
..
किशोरावस्था में दाखिल हों या युवावस्था में ..बस बचपन ऊँगली थामे ताउम्र साथ ही चलता रहे..
----
चित्र ने नर्सरी राईम्स की किताब की याद दिला दी.

नीरज बसलियाल December 9, 2010 11:39 AM  

क्या यार! हमने पढ़ पढ़ के लाइफ खराब कर दी |

Suresh Chiplunkar December 9, 2010 1:03 PM  

कहाँ गायब हो जाते हो यार… ऐसा लिखोगे तो पता नहीं क्या होगा हमारा… :)

Bhim Prasad Ghimire December 9, 2010 6:17 PM  

यादे, कुछ यादे रह जाती है । अलि हैदरका पुरानी जिन्सवाला गाना याद आया । अब की बार इस के बाद उसकी बारी आती है । पुरा पढा और अपनी फ्लैस ब्याक पे चला गया । धन्यवाद

विरेन्द्र सिंह चौहान December 9, 2010 7:15 PM  

अरे वाह.....
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..

बहुत खूब!!!!!

जितेन्द़ भगत December 9, 2010 8:09 PM  

पि‍म्‍पल, बड़ा सताता था कि‍शोरावस्‍था में। एक फोडो तो दूसरा नि‍कल आता था, सुंदर प्रतीकों से वयक्‍त कि‍या आपने उस संक्रमणकालीन उमर को।

***Punam*** December 10, 2010 12:55 AM  

पढ़ कर लगा कि अपने बचपन में लौट गई. बात पतंग कि हो या गुड्डे-गुड़ियों की,हम सभी की याद तारो-ताज़ा हो गई. वो बेफिक्री के दिन अब जिंदगी में फिर कहाँ? टिफिन खोलते ही पराठे-आम के अचार की खुशबू...वाह वाह!!! गाने को दिल करता है --कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन... जो अब वापस नहीं आने हैं. खूबसूरत एहसास बचपन का......

अपूर्व December 12, 2010 11:24 AM  

आफ़्टर आल..एकदम क्लेरेसिल मार्का पोस्ट लिखी है..पिम्पल को नजर न लग जाये..बाइ द वे वो पिम्पल कहीं पी टी आइ की करी पिटाई मे तो नही फूट गया था..:-)

खैर अब अगला पिम्पल कब फूटेगा..?..महीना..दू महीना? :-)

शरद कोकास December 12, 2010 9:51 PM  

बहुत सौम्य सी सुन्दर कविता ।

रंजना December 14, 2010 12:57 PM  

वाह रे वाह !!!

लिखते रहा करो भाई...

प्रो० डा. जयजयराम आनंद December 16, 2010 5:11 PM  

kuchhko tobachpan yaad ayaa .kisiko methike parate yaadayaa jo mujhe yaaaayaa wah to mai bhoolhi gaya kavita ko padhkar.
Dr jaijairam anand

Neha January 10, 2011 8:29 PM  

bahut hi umda hai....kitni khubsurti se likha hai....bachpan ko hum sabhi kis tarh sahejna chahte hain...lekin ek pimple futte hi log humse bachpan bhulne ki umeed karne lagte hain

shikha varshney January 11, 2011 12:02 AM  

जाने कैसे रह गई यह कुश नुमा चीज़ पढ़ने से.....
जबर्दस्त्त है....

Patali-The-Village January 15, 2011 3:30 AM  

सुन्दर चित्रण किया है आपने परिवेश का, आभार|

shiva January 19, 2011 2:24 PM  

जवानी कुछ ही कदम दूर है ............. बहुत अच्छा लगा पढकर

shiva12877.blogspot.com

Prashant Singh January 28, 2011 9:39 PM  

Zinda dil kavita lagi...bachpan se bekhauf aur nadaan

"अर्श" January 29, 2011 7:19 PM  

जवानी की पहली दस्तक को बधाई

Parul January 31, 2011 10:24 PM  

malum nahi ye kaise miss kar gayi main....maja aa gaya :)

crazy devil February 16, 2011 12:09 AM  

pahli baar post padha...liked it man :)

आड़ी टेढी सी जिंदगी July 19, 2011 11:42 PM  

वाह वाह कुश जी..मज़ा आ गया...बचपन का एक गम याद आ गया...पतंग ना उड़ा सके कभी...पता नहीं क्यूँ बस नहीं उड़ा सके....

Archana August 3, 2011 5:46 PM  

Waah...waah...Kush....Ji too...Good....

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वो बात कह ही दी जानी चाहिए कि जिसका कहा जाना मुकरर्र है..

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जयपुर, राजस्थान, India
खुद को ढूँढने की कोशिश में कितने ही थानों पर अपनी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा चुका हूँ.. भूली हुई याददाश्त साथ लेकर जितना जिया जा सकता है उस से थोडा सा ज्यादा जी रहा हूँ.. ईश्वर की बनायीं दुनिया से अभी तक विश्वास उठा नहीं है.. इसलिए अभी तक यही पड़ा हूँ.. बर्दाश्त की हद से थोडा ज्यादा बर्दाश्त कर लेता हूँ.. गुलज़ार को समझने की कोशिश जारी है.. अनुराग जैसा सिनेमा बना लु तो कुछ सुकून मिले.. दोस्तों की फेहरिस्त लम्बी है.. पसंदीदा फिल्मो की फेहरिस्त लम्बी है, क्या कहूँ साला यहाँ ख्वाहिशो की फेहरिस्त लम्बी है.. यहाँ वहां जब कही कुछ बात नहीं बनी तो ब्लॉग बना लिया..देखते है इस से अब कब तक बनती है..

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