
पतले चक्कों वाली सायकिल
पर पैंडल मारते मारते
शहर के दुसरे कोने
में आ गए..
अब बस्ते रख दिए है
पेड़ से सटाकर..
और मोजो को
जूतों में खिसका दिया है..
कोहनी का तकिया बनाकर.
लेट गए है मिट्टी में
और देखते हुए
आसमान में
मुस्कुराकर कहते है.. कि साला
पी टी आई जो पकड़
लेता तो धुनाई बहुत होती..
कुछ देर सुस्ताकर
खोलते है टिफिन
मेथी के परांठो
की खुशबू लुटा देते
है आसमानों में..
अब एक टांग पे टांग
टिकाये गिनते है
अंटी के सिक्को को..
और खरीद के पतंग
चाँद तारो वाली
बस्ते से चरखी..
निकाल लेते है..
लम्बी तान पतंग को देके..
बस ऊपर ही तकते है..
कट जायेगी जब
दस पांच पतंगे..
झाड के पैंट को अपनी..
बस्ते में चरखी धर लेंगे..
सायकिल पे रख के बस्ता अपना
फिर से घर को चल लेंगे..
जो कहते है
ऐसा हाल रहा तो
आगे जाकर क्या करोगे?
उनकी हमको फ़िक्र नहीं
आफ्टर आल अभी
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..



51 comments:
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Mast hai
मस्त!!
सुन्दर चित्रण किया है आपने परिवेश का, आभार स्वीकार करें.
जियो गुरु.. जवानी छा रही है पहले पिम्पल फूटने के बाद.. :)
अच्छा है। कर लो यह सब। हमने नहीं किया तो अब तरसते हैं कि मिस कर दिया कुछ।
कुछ न कुछ मिस करना है, तो जो बच सकता है, बचा लो!
अरसे बाद वो कुश मिला ......
love you in this mood.......keep it up bro.....
original ...कुश. मजा आ गया.
जवानी कुछ ही कदम दूर है ............. बहुत अच्छा लगा पढकर
नये बिम्ब, जीवन को व्यक्त करने के।
नये बिम्ब, जीवन को व्यक्त करने के।
aapke post ne school ki yaad dila de!
जो कहते है
ऐसा हाल रहा तो
आगे जाकर क्या करोगे?
उनकी हमको फ़िक्र नहीं
आफ्टर आल अभी
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..
उम्र का दौर जो बना दे या बिगाड़ दे ...... नए बिम्ब के साथ हकीकत परक चित्रण .......
वाह ही वाह
कैसे कैसे दिन याद दिलाते हो. वाह
ए
आसमान में
मुस्कुराकर कहते है.. कि साला
पी टी आई जो पकड़
लेता तो धुनाई बहुत होती..
mast likha hai...ekdum mast.
आफ्टर आल अभी
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है.
बिंदास..... बधाई हो.......
गलत मत समझना - पिम्पले फूटने की.
हाय कित्ता क्यूट पिम्पल फूटा है लड़के को...बड़े दिन बाद इस मूड की पोस्ट लिखी है. झकाझक है एकदम.
डा.अनुराग सही कह रहे हैं...खोया कुश वापस लौट आया है...ये है पक्की कुश नुमा रचना जिसे पढ़ कर इंसान हो जाता है खुश...वाह रे कुश.
नीरज
हाय दैय्या! पोट्टा जवान हो चला:)
pimple phootna ..... jawan hona
leo kuch to sikh ke jaoon....
thora bakhat kam lijiye....bar bar lautna
achha nahi lagta....mast rahiye...bindas likhiye..
कुछ ऐसी बचपन वाली पोस्ट और डालिए.. मौसम ताज़ा हो जाता है
उफ़ ! जवानी के दिन याद आ गए :-)
मस्त है कुश भाई...मस्त एकदम :)
बोले तो एकदम झक्कास.खूब लिखा है.
उन्मुक्त भाव को दिए हैं बढ़िया शब्द.
unbelievable...!! main yahan pehle kyun nahin aayi...jus simply tooooo good
loved it
:-/)
:) :)
:D :D :D
बहुत बढ़िया सर...आखिर "सुखा" खत्म हुआ..वो भी एक बेहतरीन "पिम्पल" पोस्ट के साथ...:)
अच्छी अभिव्यक्ति ..स्कूल से भाग कर जवानी को समझती हुई ...
wow... awesome...
बचपन को कितने अच्छे से सजा दिया इस कविता में...
पर मेथी के पराठे... भूख लग गई...
but pimple??? ;)
बहुत शानदार, मज़ेदार, बचपन कितना कीमती होता है...
रिफ्रेशिंग !
..
किशोरावस्था में दाखिल हों या युवावस्था में ..बस बचपन ऊँगली थामे ताउम्र साथ ही चलता रहे..
----
चित्र ने नर्सरी राईम्स की किताब की याद दिला दी.
क्या यार! हमने पढ़ पढ़ के लाइफ खराब कर दी |
कहाँ गायब हो जाते हो यार… ऐसा लिखोगे तो पता नहीं क्या होगा हमारा… :)
यादे, कुछ यादे रह जाती है । अलि हैदरका पुरानी जिन्सवाला गाना याद आया । अब की बार इस के बाद उसकी बारी आती है । पुरा पढा और अपनी फ्लैस ब्याक पे चला गया । धन्यवाद
अरे वाह.....
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..
बहुत खूब!!!!!
पिम्पल, बड़ा सताता था किशोरावस्था में। एक फोडो तो दूसरा निकल आता था, सुंदर प्रतीकों से वयक्त किया आपने उस संक्रमणकालीन उमर को।
पढ़ कर लगा कि अपने बचपन में लौट गई. बात पतंग कि हो या गुड्डे-गुड़ियों की,हम सभी की याद तारो-ताज़ा हो गई. वो बेफिक्री के दिन अब जिंदगी में फिर कहाँ? टिफिन खोलते ही पराठे-आम के अचार की खुशबू...वाह वाह!!! गाने को दिल करता है --कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन... जो अब वापस नहीं आने हैं. खूबसूरत एहसास बचपन का......
आफ़्टर आल..एकदम क्लेरेसिल मार्का पोस्ट लिखी है..पिम्पल को नजर न लग जाये..बाइ द वे वो पिम्पल कहीं पी टी आइ की करी पिटाई मे तो नही फूट गया था..:-)
खैर अब अगला पिम्पल कब फूटेगा..?..महीना..दू महीना? :-)
बहुत सौम्य सी सुन्दर कविता ।
वाह रे वाह !!!
लिखते रहा करो भाई...
kuchhko tobachpan yaad ayaa .kisiko methike parate yaadayaa jo mujhe yaaaayaa wah to mai bhoolhi gaya kavita ko padhkar.
Dr jaijairam anand
bahut hi umda hai....kitni khubsurti se likha hai....bachpan ko hum sabhi kis tarh sahejna chahte hain...lekin ek pimple futte hi log humse bachpan bhulne ki umeed karne lagte hain
जाने कैसे रह गई यह कुश नुमा चीज़ पढ़ने से.....
जबर्दस्त्त है....
सुन्दर चित्रण किया है आपने परिवेश का, आभार|
जवानी कुछ ही कदम दूर है ............. बहुत अच्छा लगा पढकर
shiva12877.blogspot.com
Zinda dil kavita lagi...bachpan se bekhauf aur nadaan
जवानी की पहली दस्तक को बधाई
malum nahi ye kaise miss kar gayi main....maja aa gaya :)
pahli baar post padha...liked it man :)
वाह वाह कुश जी..मज़ा आ गया...बचपन का एक गम याद आ गया...पतंग ना उड़ा सके कभी...पता नहीं क्यूँ बस नहीं उड़ा सके....
Waah...waah...Kush....Ji too...Good....
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वो बात कह ही दी जानी चाहिए कि जिसका कहा जाना मुकरर्र है..