Friday, November 28, 2014

मछली का नाम मार्गरेटा..!!

मछली का नाम मार्गरेटा.. 

यूँ तो मछली का नाम गुडिया पिंकी विमली शब्बो कुछ भी हो सकता था लेकिन मालकिन को मार्गरेटा नाम बहुत पसंद था.. मालकिन मुझे अलबत्ता झल्ली ही कहती थी.. पर मेरा भी एक नाम था.. लेकिन उसमे किसी को कोई दिलचस्पी नहीं थी.. घर कितने तो लोग आते थे.. कोई नहीं पूछता कि इस लड़की का नाम झल्ली क्यों है? पूछते तो बस यही की मछली का नाम मार्गरेटा? 

मुझे नहीं समझ आता कि ये नाम क्यों रखा मालकिन ने? नाम रखना ही था तो लक्ष्मी रख लेती, कितना तो प्यारा नाम है.. मेरी माँ का भी यही नाम था.. मेरी नानी मेरी माँ को लिछमी बोलती थी.. मेरी नानी होती तो इस मछली का नाम सुशीला रखती.. मेरी नानी को सुशीला नाम बहुत पसंद था लेकिन नाना को सुशील.. इसलिए मेरे मामा का नाम भी सुशील था.. नाना को सुमित नाम भी बहुत पसंद था लेकिन मामा की तीनो बेटियों का नाम नानी ने ही रखा.. मेरी नानी के घर में एक कछुआ था.. उसका नाम हमने कद्दू रखा था.. वो कद्दू जैसा दिखता था.. अब सोचती हूँ मालकिन होती तो कछुए का नाम रॉबर्ट डी कोस्टा रखती.. लेकिन इस नाम के लिए डी कोस्टा मालकिन को कोसता रहता.. हा हा हा हा...!

कही किसी ने मेरी हंसी सुन ना ली हो.. मालकिन को पता चल गया तो सोचेगी मैं यहाँ खुश हूँ.. मुझे यही रख लेगी.. जैसे मार्गरेटा को रख लिया है.. मालकिन बुरी नहीं है.. अच्छी है.. वो मुझे गाँव से यहाँ इसलिए लायी कि मैं स्कूल में पढ़ सकू.. अच्छे कपडे पहन सकू.. अच्छा खाना खा सकू.. पर मुझे तो गाँव में भी सब अच्छा लगता था.. लेकिन मालकिन कहती है वो मुझे और अच्छे से रखेगी.. जैसे मार्गरेटा को रखती है.. 

मार्गरेटा एक कांच के चमचमाते मर्तबान में रहती है.. जिसे मालकिन एक्के.. नहीं एव्के.. नहीं नहीं एक्वेरियम कहती है.. उसमे रहती है मार्गरेटा.. यूँ तो ये बंगला भी बहुत चमचमाता है.. जिसमे मालकिन रहती है.. कितनी तरह के तो फूल उगे है बगीचे में.. कितना बड़ा झरना है.. इतनी सारी सीढिया.. और मालकिन और मालिक की बड़ी बड़ी तस्वीरे.. लेकिन मालिक घर पे बहुत कम रहते है.. मालकिन ही घर की रानी है.. इतने बड़े घर की मालकिन.. मैं पीछे वाले कमरे में रहती हूँ.. ये कमरा भी बहुत बड़ा है.. हमारे गाँव के पुरे घर से भी बड़ा.. कितने तो सुन्दर रंग है दीवारों पे.. और कितना नर्म बुलायम बिस्तर.. मालकिन मेरा ख्याल भी तो कितना रखती है.. 


मेरी सहेली बिंदिया तो बोलती थी कि शहर ले जाके मालकिन मुझसे बहुत काम करवाएगी.. लेकिन ऐसा कुछ भी तो नहीं है.. झाड़ू लगाना.. पोंछा लगाना.. बर्तन धोना.. बस. ये कोई बड़ा काम थोड़े ही है..ये सब तो मैं गाँव में भी करती थी.. हाँ लेकिन मेरा छोटा भाई होता तो उसके लिए ज़रूर मुश्किल होता.. उसको तो ये सब कुछ भी नहीं आता.. एकदम लल्लू है लल्लू.. मेरी मां बहुत खुश है.. कि मैं यहाँ हूँ.. मेरे बापू भी हर महीने की एक तारीख को आते है मुझसे मिलने.. सबको लगता है कि मैं यहाँ बहुत खुश हूँ.. मैं भी यहाँ इसीलिए रहती हूँ क्योंकि सब खुश है.. मार्गरेटा भी शायद खुश ही होगी अपने चमचमाते मर्तबान में.. लेकिन मैं अगर मार्गरेटा होती तो कभी नहीं रहती उस कांच के डिब्बे में.. मैं तो समुन्दर में रहती.. अपनी सहेलियों के साथ पानी में तैरती रहती.. अपने सुनहरे पंखो से इठलाते हुए सीपियो से खेलती रहती.. लेकिन क्या पता मार्गरेटा भी यही चाहती हो.. और वो भी वैसे ही यहाँ है.. जैसे मैं हूँ.. और मालकिन?? क्या वो भी? नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता... वो तो पुरे घर की मालकिन है.. कितनी खुश रहती है.. लेकिन खुश तो मैं भी हूँ.. और मार्गरेटा भी.. तो फिर क्या हम तीनो..?? 

मैं भी क्या क्या सोचने लग गयी.. मुझे तो चिड़िया को दाना डालना है.. वही चिड़िया जो मेरी खिड़की पे आकर रोज़ बैठती है.. इस शहर में मेरी सबसे अच्छी दोस्त.. मैंने इसका नाम गुज्जी रखा है.. गाँव में मेरा सबसे अच्छा दोस्त था संकू, वो मुझे प्यार से गुज्जी बुलाता था.. अब हम दोनों कितने दूर हो गए.. लेकिन उसी को याद करके मैंने इस चिड़िया का नाम गुज्जी रखा है.. कितना तो प्यारा नाम है.. गुज्जी, वरना मालकिन को देखो मछली का नाम मार्गरेटा रखा है.. भला कोई रखता है मछली का नाम मार्गरेटा..!!

Tuesday, August 26, 2014

रंगमंच का प्यादा

बैकग्राउंड में बांसुरी का संगीत बज रहा है.. स्टेज पर एक आराम कुर्सी पड़ी है.. जिसकी कोई आवश्यकता ही नहीं बची है.. सब लोग व्यस्त है.. परदे पर आसमान भी बनाया हुआ है..  मगर उसमे अभी रात है.. आठ दस तारे बने हुए है परदे पर.. और कोने में एक चाँद पड़ा ऊंघ रहा है..  सामने दर्शक है. जो ताली बजाने से लेकर उबासी लेने तक का काम कुशलता से अंजाम दे सकते है.. “ये कैसी विडम्बना है कि जब मैं गलत था तो सब मेरे साथ थे पर अब जब मैं सच का साथ देना चाहता हूँ तो कोई मेरी बात सुनने को भी तैयार नहीं..” बैक ग्राउंड से आवाज़ आयी है और लाल रंग की मद्धिम रौशनी स्टेज पर उतरी है.. इसी रौशनी में एक दाढ़ी वाला चेहरा नमूदार होता है..  “मैं पूछता हु आखिर क्यों..? संवाद अदायगी में इसका कोई सानी नहीं.. आँखों में जला देने वाली आग और माथे पर भिगो देने वाला पसीना.. रेड स्पोट लाईट ठीक उसके चेहरे पर और आँखे ऐसी लाल के जैसे लहू उतर आया हो इनमे..

दर्शक सांस रोके बस उसी चेहरे पर टकटकी लगाये बैठे है.. अचानक स्वर में करुणा आ जाती है.. दर्शको के बीच अब संवेदनाये हिलोरे मार रही है.. चारो तरफ अँधेरा है बस एक नीली स्पोट लाईट का प्रकाश मंच पर बिखरा हुआ है.. बैकग्राउंड में अब वायलिन बजने लगी है..अक्सर ऐसे उदास पलो में हमें किसी ऐसी ही धुन के सहारे की जरुरत होती है.. इस धुन के साथ ही नायक का करूण  राग दर्शक दीर्घा में फैले अँधेरे को चीरता हुआ उनके भीतर उतरता जाता है.. 

नायक फिर से कहता है...
“ये कैसी विडम्बना है कि जब मैं गलत था तो सब मेरे साथ थे पर अब जब मैं सच का साथ देना चाहता हूँ तो कोई मेरी बात सुनने को भी तैयार नहीं.. क्यू इस दुनिया में गलत सही है और जो सही है वही गलत है.. क्यू सच्चाई और ईमानदारी मक्कारी के पैरो तले रौंदी जा रही है.. क्या सत्य का अंतिम समय आ चुका है? क्या आने वाली नस्लों को नहीं नज़र आएगा सच? जैसे हमारे पास डायनोसोर के सिर्फ किस्से है वैसे ही किस्से उनके हिस्से में होंगे सच के?” उसकी आँखों में आंसू ठहरे हुए है.. अभी गालो तक नहीं पहुंचे, लेकिन पहुंचेगे ज़रूर.. थियेटर में सारा खेल ही टाईमिंग का है, “तो क्या मैं भी चल पडू उसी राह में कि जिसकी मंजिल सिवाय झूठ और पाखण्ड के कुछ भी नहीं?”

दर्शक स्तब्ध बैठे है.. किसी का फोन वायब्रेट हो रहा है पर उससे कुछ ख़ास फर्क नहीं पड रहा किसी को. दो रक्तरंजित आँखो में सैकड़ो आँखे झाँक रही है.. ऐसा लग रहा है अब खून बह उठेगा इनसे.. मगर नहीं, “क्या कोई है जो दे सके मुझे दिलासा? अरे इतना ही कह दो कि मैं तुम्हारे साथ हूँ.. बाद में चाहे धोखा दे देना.. पर एक बार इतना तो कह दो कि मैं साथ हूँ.. डूबते को तिनके का सहारा ही तो चाहिए.. दे सको तो दे दो इतना वरना पूरी दुनिया तुम रख लो.. मैं लात मारता हूँ इस दुनिया को.. जो सिर्फ तब चिल्लाती है जब लात उसके पिछवाड़े पर पड़ती है.. नहीं रहना मुझे ऐसी दुनिया में.. मैं अपनी दुनिया खुद बसाऊंगा.. अपने नियम.. अपनी ख़ुशी के लिए.. और तुम्म!! हाँ हाँ तुम कायर लोगो को फटकने तक ना दूंगा अपनी दुनिया के आस पास भी कि मैं जानता हूँ गर तुम्हारे कदम पड़े उस ज़मी पर तो तुम उसे भी अपनी तरह बना दोगे.. क्योंकि मैं जानता हूँ खुदा ने सिर्फ जन्नत बनायीं थी दोज़ख की ईजाद तो तुम लोगो ने की...” और वो मुंह फेर लेता है दर्शको से

दर्शक खड़े होकर तालिया बजाते है.. मंच पर प्रकाश कम हो जाता है.. अभिनेता के चेहरे पर विजयी भाव है.. वो चाहता है कि जल्द से जल्द उसका नाम पुकारा जाए और वो मंच पे जाकर सबका शुक्रिया अदा करे.. जैसे ही उसका नाम पुकारा जाता है वो मंच पर पहुँचता है लेकिन नाशुक्रे लोग उठ उठ कर चल दिए है.. कुछ है जो फोन पर बात कर रहे है.. कुछ आगे वाली सीट के नीचे खिसक गए अपने जूते ढूंढ रहे है.. इन सबमें भी जो चेहरे मंच की तरफ है उनको देखकर वो खुश हो रहा है.. ये उसका मैडल है.. और जवाब भी कि अभी वो वक़्त नहीं आया है कि उसे अपनी दुनिया बनानी पड़े.. पर्दा गिर रहा है..!!


Monday, October 31, 2011

कहानी के इस भाग के प्रायोजक कौन है ?

मैं कहानी में पूरी तरह से डूबा हुआ था.. या यू कह लीजिये कि मुझे तैरना आता ही नहीं था.. एक छोटे से लकड़ी के तख्ते से लटका हुआ मैं आधा डूबा और आधा बचा हुआ सा लग रहा था.. लग क्या रहा था मैं बचा हुआ ही था.. कहानी में एक किरदार था जो मुझे भड़के हुए सांड सा लगा. ऐसा लगा जैसे अभी नाक से थू थू करता आएगा और अपने सींग मेरे पेट में घुसा देगा.. पर फिर मुझे गब्बर सिंह का वो वाला डायलोग याद आया जो अक्सर ऐसी सिचुएशन में याद आ ही जाता है कि जो डर गया समझो मर गया.. तो बस तभी गब्बर की एडवाईस फोलो करते हुए मैंने रिमोट को ठीक वैसे ही अनदेखा कर दिया जैसे कि प्रगति ने इस देश को.. 


फिर सांड जैसे कैरेक्टर ने कोई डायलोग मारा.. और कहानी की नायिका कान पे हाथ रख के चीख पड़ी.. वो रो तो रही थी पर उसके आंसु नहीं निकल रहे थे.. मुझे याद आया कि देश की विकास दर भी होती तो है मगर दिखती नहीं.. दिमाग माना नहीं पर दिल ने कहा जाने दो.. तो मैंने भी जाने दिया.. अगले सीन में बैकग्राउंड म्यूजिक टॉप पे था.. ये वाला म्यूजिक हर बार ऐसे सीन में आ ही जाता था.. पता नहीं कौन पीछे बैठा बैठा बजाता था..

सीन चेंज 
क्योंकि परिवर्तन इस द ब्लडी रुल ऑफ़ दिस संसार तो सीन भी चेंज हो जाता है.. इस सीन में ढाई सौ किलो की ज्वेलरी पहनी आंटी मत कहो ना टाईप आंटी की एंट्री होती है.. कैमरा चार बार बिना मकसद देश के युवाओ की तरह इधर उधर होता है.. आंटी डायलोग मारती है "अब देखती हु इस घर में किस की चलती है ?" ये बोलके वो चश्मा पहनती है.. मुझे लगा नज़र का होगा पर वो कोई रे बैन वे बैन टाईप का होता है.. चश्मा पहनते ही उसको सामने नज़र आता है बजाज.. अरे नहीं नहीं स्कूटर नहीं..... कैरक्टर, वैसे दोनों के एंड में टर देखकर मैं भी आप ही की तरह कन्फ्यूज हो गया था पर आपकी तरह मैं दुसरो के भरोसे नहीं रहा.. मैंने खुद ने आईडिया लगा लिया कि ये कैरेक्टर है..   वैसे भी फिल्मो और सीरियल्स में ये ही लोग भरे पड़े है.. बजाज, सिंघानिया, कपूर...... पता नहीं कौनसे कोटे के अंडर में घुसे हुए है... 

एनी वे 
बजाज की प्लास्टिक सर्जरी हो चुकी थी चेहरा बदल चुका था फिर भी सबने पहचान लिया... ये चौथा बजाज था जो हर बार अपने चौथे पे प्लास्टिक सर्जरी करवा के वापस आ जाता.. इसकी बीवी ने इस चक्कर में कई चूडिया भी फ़ोकट में तोड़ डाली... इधर वो चूड़िया तोडती की उधर वो वापस आ जाता.. अब तो मेरे भी ये समझ आने लग गया था कि रद्दी वाला अखबार तौलते तौलते क्यों पूछता रहता है कि भाईसाहब प्लास्टिक व्लास्टिक भी हो तो दे दो.. खैर बजाज आ तो गया था पर उसके आते ही एपिसोड ख़त्म हो गया.. नेक्स्ट एपिसोड में क्या दिखाया जाएगा वो बताया जा रहा था..ना चाहते हुए भी मैंने देखा कि अगले एपिसोड में क्या होगा.. पर जो दिखाया उन्होंने वो ना दिखाने के बराबर ही था.. 

फायनली 
रिमोट को पिस्तौल की तरह पकड़कर में टी वी के सामने तान चुका था.. अगर इसमें गोली होती तो मैं चला ही देता.. पर अच्छा हुआ कि गोली नहीं थी... क्योंकि टी वी की किश्ते भी अभी पूरी नहीं हुई है.. ऐसे में जज्बाती होना ठीक नहीं.. बस यही सोच के मैंने चैनल बदल दिया.. अब यहाँ एक सज्जन है जो बुरी नज़र से बचाने का तावीज़ बेच रहे है.. अगले चैनल पे सर पे बाल उगाने का तेल बेचा जा रहा है.. उस से अगले पे कोई श्री यंत्र है.. उस से अगले पे लोकेट.. ये क्या हो रहा है.. ये लोग थोडी देर पहले सीरियल्स दिखा रहे थे अचानक फूटपाथ पे सामान बेचने वालो जैसे लगने लगे है.. इनका कोई इमान धरम है या नहीं..

मुझे तो डाऊट हो रहा है कि मेरे ऑफिस के रास्ते में हिमालय की जड़ी बूटिया बेचने वाला भी किसी बड़ी कंपनी का डायरेक्टर होगा.. ऑफिस में ज़रूरी काम का बहाना मारके ज़रूर तिब्बती मार्केट में स्वेटर या शॉल बेचता होगा.. टी वी चैनल वाले पता नहीं क्या चाहते है.. जब मैं छोटा था तो टी वी ठीक करने के लिए छत पे चढके एंटीना हिलाता था.. मुझे नहीं पता था बाद में ये टी वी मेरी छाती पे चढ़के मेरे दिमाग का एंटीना हिलाएगा..... अब आप भी निकल लीजिये फटाफट..., पोस्ट ख़त्म हो चुकी है और मैं जा रहा हूँ टी वी ऑन करने वो क्या है ना कि बालिका वधु का रिपीट टेलीकास्ट शुरू होने वाला है.. कल रात देख नहीं पाया था.. लीजिये शुरू हो गया.. बता रहे है कि कहानी के इस भाग के प्रायोजक है...........

अब जाइये भी.. देखने भी ना दीजियेगा? 


Wednesday, August 24, 2011

Wednesday, June 29, 2011

कहानी शीला, मुन्नी, रज़िया और शालू की


बात ये है बॉस कि लेखक से किसी ने कहा कि आमिर खान इतने ईमानदार है कि अपनी फिल्म 'देहली बेली' को खुद ही 'ए' सर्टिफिकेट दिलवाने की सिफारिश किये रहे,  लेकिन लेकिन लेकिन.. हम आपको ये भी बता दे कि लेखक ने भी अपनी इस पोस्ट को सेंसर बोर्ड के पास ए सर्टिफिकेट लेने के लिए भेजा था पर सेंसर वालो ने ये बोल के लेखक को भगा दिया कि हम तुम्हारी दो दो टके की ब्लॉग पोस्टो को सर्टिफिकेट देने के लिए नहीं बैठे है कोई फिल्म विल्म हो तो लाओ.. तो अब चूँकि ब्लोगिंग का कोई सेंसर बोर्ड तो है नहीं.. इसलिए इस पोस्ट को बच्चा पढ़े या बडा या फिर बूढा पढ़ ले.. उसकी जिम्मेदारी लेखक की नहीं.. 
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डिस्क्लेमर - इस कहानी के पात्रो का किसी भी टी वी पे दिखाए जाने वाले गानों के नामो से कोई सम्बन्ध नहीं है और यदि है तो वो नाजायज़ सम्बन्ध है

चेतावनी - " कृपया पढ़ते वक़्त अपनी किडनी फ्रीज़र में रखकर पढ़े अन्यथा उसके जाम हो जाने का खतरा है "


तो क्या शीला जवान होने वाली थी?
नहीं ऐसा कुछ था तो नहीं.. यूँ उम्र उसकी जवानी की दहलीज़ तक पहुची नहीं थी.. पर कुछ मोहल्ले वालो ने... कुछ कोंलेज के लडको ने..., अपनी अपनी नजरो से उसे जवानी की दहलीज़ तक पंहुचा ही दिया था.. शीला समझ चुकी थी कि उसकी जवानी आने में अब टेम नहीं है.. सो टेम खोटी नहीं करना चाहिए..

इधर रजिया
टेलर मास्टर की बेटी, बचपन से ही समझदार, चाय में कितनी शक्कर और कितनी पत्ती.. इसका बखूबी हिसाब रखने वाली.. खूबसूरत इतनी कि गाल छू लो तो लाल पड़ जाए.. अब्बू की दुकान पे सिलाई मशीन चलाती.. रजिया के साथ साथ उसके अब्बू भी जानते थे कि लड़के जींस को ऑल्टर कराने उनकी दुकान में क्यों आते थे?? पर आने वाले को कौन रोंक सका है भला? (नोट : ये भला 'भला बुरा' वाला भला नहीं है)

और उधर मुन्नी
मुन्नी आज़ाद खयालो वाली लड़की.. जिसे हर जंग में जीतना और हर दुश्मन को पीटना ही गवारा था.. ऐसा नहीं था कि उसके मन में प्रेम नहीं था.. पर बचपन से अब तक जो भी उसने देखा.. या यू कहे कि झेला उसके बाद उसने नफरत को गोद ले लिया..

इन सबके बीच शालू
शालू ज्यादा समझदार नहीं थी पर उसकी समझ में एक बात आ गयी थी कि दुनिया जाए तेल लेने.. !! शालू को दुनिया से कोई मतलब नहीं था.. यू मतलब उसको इस बात से भी नहीं था कि दुनिया तेल लेने भला जाएगी कहा? वैसे शालू का एक ही उसूल था कि जैसे जीना है वैसे जियो.. बस जी..!!!

तो शीला
शीला जब भी घर से बाहर निकलती कुछ आँखे उसका दामन थाम लेती.. उसको घर से निकालकर गली के लास्ट कोर्नर तक छोडके आती.. ( ऐसी आँखों का राम भला करे ) इधर शीला को मोहल्ले की आँखों ने छोड़ा और उधर बस स्टॉप पे खड़े लडको ने थामा.. साथी हाथ बढ़ाना की तर्ज़ पे शीला के दामन को थामती आँखों की रिले रेस चलती रहती.. और जैसे ही शीला बस में चढ़ती कि वो टच स्क्रीन फोन बन जाती..सब पट्ठे उसके सारे फीचर्स चेक कर लेना चाहते थे.. वैसे भी मोबाईल वही लेना चाहिए जिसमे सारे फीचर्स मौजूद हो..

हाँ तो शीला
बस से उतरते ही शीला को कोंलेज के लड़के संभाल लेते.. उनका बस चलता तो वो शीला को लेने उसके घर तक चले जाते.. लेकिन वे लडकियों के आत्मनिर्भर होने वाली सोच के पक्षधर थे.. लडकियों और लडको को समान अधिकार मिलने चाहिए.. ऐसा उनका मानना था (और लेखक का भी यही मानना है) तो कोंलेज के गेट से वो हैंडल विद केयर टाईप से शीला को क्लासरूम में ले जाते.. यू ले जाना तो वो बैडरूम में चाहते थे पर इस दुष्ट समाज के ओछेपन जिसमे कि लडकियों को छेड़ना एक अपराध था, वो राम राज की उम्मीद करके बस क्लासरूम से ही काम चला लेते.. उन्हें इस बात की तसल्ली थी कि कम से कम रूम शब्द तो आ ही रहा है..

रज़िया याद है ना..
अब्बू की टेलर की दुकान में बैठी सिलाई मशीन का पहिया घुमाती रहती... यू उसकी ज़िन्दगी की गाडी खुद बिना पहियों वाली थी.. उमर उसकी बढती जा रही थी और बढती उमर में होने वाले परिवर्तन भी हो रहे थे.. अम्मी तो उसको अब्बू के हवाले करके निकल ली दुनिया से.. और अब्बू बेचारे हर सलवार कमीज़ सिलवाने आने वाली महिलाओ में उसकी अम्मी ढूंढते रहते.. इसी के चलते उनके चश्मे का नंबर बढ़ गया और धंधा घट गया..  "अब मियां आजकल कौन सिलवाने बैठा है कपडे.." इन्ही जुमलो के साथ रज़िया के अब्बू रंगे हाथो पकडे जाते.. 

रज़िया जो कि आपको याद है..
वो दिन भर लडको की जींसो को ऑल्टर करते करते ऐसी ऊब गयी थी कि उसकी शक्ल खुद टॉम अल्टर जैसी हो गयी.. पर उसकी शक्ल से ना किसी को कुछ देना था ना लेना था.. सो जींस ऑल्टर होने के लिए आये जा रही थी और उसके अब्बू को उसकी चिंता खाए जा रही थी... पर लड़की की शादी कराना कोई आस्तीन काटने जितना सरल काम तो था नहीं.. हाँ जेबे काटी जाती तो बात बन सकती थी.. पर ये काम भी उनके बस का नहीं था.. अब सलवार कमीज़ में जेबे जो नहीं होती.. 

तो रज़िया जो कि आपको अभी तक याद है 
दुसरो की जींस ऑल्टर करके छोटी करती रही पर अपनी बढती उम्र को छोटा करने का हुनर जानती नहीं थी.. सो जैसे जैसे उम्र बढ़ी वैसे वैसे जींस भी ऑल्टर के लिए कम आने लगी.. अब तो इक्का दुक्का जींस आती वो भी कोई तलाकशुदा लोगो की.. रज़िया चुपचाप ऑल्टर करती रहती.. जींस काटना तो उसके लिए आसान था पर दिन काटना उतना ही मुश्किल.. 

मुन्नी को भूल तो नहीं गए आप?
क्या कहा? उसे कैसे भूल सकते है भला... !! सो तो है. (लेखक आपके इस कथन से सहमत है कि मुन्नी को नहीं भूला जा सकता) तो जनाब मुन्नी जो है उसको जीतना और पीटना तो पसंद है ही.. बचपन में भी या तो वो किसी खेल को जीत लेती थी या हारने पर जीतने वाले को पीट देती थी.. लेन देन के मामले में बच्ची बचपन से ही बड़ी मुखर थी.. और वो लोग जो ये कहते फिरते है कि पूत के पांव पालने में ही नज़र आ जाते है.. उनको भी मुन्नी यदा कदा ढूंढती रहती.. कि यदि वो लोग मिल जाए तो उनके पालनो (आप समझ ही गए होंगे) पे दो लात जमा के बताये कि पूत ही नहीं पुत्रियों के पांव भी पालने में ही नज़र आते है..

मुन्नी जिसे कि आप भूल नहीं सकते   
मुन्नी उस वक़्त से मुन्नी नहीं रही जब वो मुन्नी थी.. और उसकी इस समझ को डेवलप कराने में जिन लोगो ने उसकी सहायता कि उनमे थे उसके पिताजी के दोस्त, मकान मालिक का साला, गणित की ट्यूशन वाले मास्टरजी, पुरानी कंपनी के मैनेजर और ऐसे कई सारे भले लोग जिनका जन्म ही मानव कल्याण हेतु हुआ है.. वे यथा संभव मुन्नी का कल्याण करने के प्रयास में लगे रहते.. हालाँकि मुन्नी बड़ी निष्ठुर हृदयी थी वो नहीं चाहती थी कि उसका कल्याण हो.. किसी न किसी बहाने से वो उन कल्याण कार्यो पर पानी फेर ही देती थी.. 

मुन्नी जिसे कि भूला ही नहीं जा सकता 
वो ऐसे ही कल्याणों के खिलाफ आवाज़ उठाने लगी.. कोई सेक्स्युअल हर्रेस्मेंट नाम की किसी चीज़ के विरोध में अभियान भी चलाया उसने.. बाद में सुनने में आया कि  ये अभियान समाज के विरोध में था.. मुन्नी नहीं चाहती थी कि ऑफिस में फ्रेंडली एन्वायरमेंट रहे.. उसके ऐसा करने से लोग तनाव में रहने लगे.. सुबह होते ही परेशान हो जाते कि आज ऑफिस में करेंगे क्या? वही कुछ मूर्ख महिलाये ना जाने क्यों इस अभियान से खुश थी.. खैर उन्होंने मुन्नी को फेमस कर दिया.. बोले तो मुन्नी का बहुत नाम हो गया..  

कि आयी अब शालू की बारी 
शालू को मुन्नी शीला या रज़िया से कोई मतलब नहीं था.. (वैसे लेखक ने आपको पूर्व में ही बता दिया है कि शालू को दुनिया से कोई मतलब नहीं है और दुर्भाग्य से रज़िया, मुन्नी और शालू भी इसी दुनिया में है तो शालू को उनसे कोई मतलब नहीं था..) शालू बचपन से ही नृत्य कला में प्रवीण थी.. जब भी घर में मेहमान आते शालू की मम्मी उसे अपने नृत्य का नमूना दिखाने को कहती.. और शालू नमूनों की तरह नमूनों के सामने अपने नृत्य का नमूना पेश करती.. वे लोग नृत्य के अंत में यही कहते पाए जाते कि बहनजी आपकी लड़की तो बड़ी होशियार है.. पर इसी होशियारी के चलते शालू पढाई में होशियार नहीं हो पाई.. हालाँकि उसे अंग्रेजी बोलना अच्छा लगता.. अंग्रेजी में ग्रामर व्रामर जैसे दिखावो और आडम्बरो से वो कोसो दूर थी.. भाषा में ग्रामर के दखल के खिलाफ थी शालू.. 

शालू, जो भाषा में ग्रामर के दखल के खिलाफ थी..
वो उन लोगो के भी खिलाफ थी जिनका ये कहना था कि शालू का नृत्य और उसकी भंगिमाए स्वस्थ समाज के अनुकूल नहीं है.. शालू का ये मानना था कि ये लोग जो उसके खिलाफ है घर में सी डी पे उसका नृत्य देखते है.. शालू को कतई ये गवारा नहीं था कि उसकी सीडी घर पे देखने वाले बाहर आकर उसको सीढ़ी बनाकर अपना उल्लू सीधा करे.. इसीलिए वो हमेशा उल्टी बात करती थी.. 

शालू, जो हमेशा उल्टी बात करती थी.
उसको कई बार उल्टी करते देख मोहल्ले वाले उल्टी सीधी बाते करते.. कई लोगो का ये भी कहना था कि शालू को नृत्य प्रेम के अलावा प्रकृति से भी प्रेम है..क्योंकि वो पृकृति प्रदत कुछ ऐसी क्रियाये.. ऐसे लोगो के साथ करती थी जिन लोगो की प्रकृति ठीक नहीं थी.. साथ ही उन लोगो का ये भी मानना था कि वे प्रकृति प्रेमी शालू के ऐसे प्रकृति प्रेम को देखते हुए उसे कुछ आर्थिक सहायता भी कर देते थे.. और ये बाते वो इतनी विश्वसनीयता से कहते थे जैसे पुरे घटनाक्रम के वे चश्मदीद गवाह हो.. या फिर शालू उनके खालू के घर ही गयी हो.. पर शालू को इन बातो से कोई फर्क नहीं पड़ता था... आपको याद होगा ही कि शालू का ये मानना था कि दुनिया जाए तेल लेने...

पोस्ट लम्बी हो रही है.. लगता है ऑल्टर करना पड़ेगा..
तो पोस्ट जो कि लम्बी हो रही है उसमे हमने तीन साल का लीप ले लिया है.. (तीन साल बाद)

तीन साल बाद शीला 
शीला जिसको कि इन तीन सालो में इतने प्रेम पत्र मिले कि उनको रद्दी में बेचने पर उसे साढे तीन सौ रूपये मिले (दरअसल लेखक ही वो रद्दी वाला है, जो भेष बदल कर रद्दी खरीदता है और उनमे मिली चिट्ठियों को अपने नाम से छापता है.. उनमे भी कुछ प्रेम पत्र ऐसे है जो छपने लायक है, पर वो फिर कभी) तो शीला ने दो साल तक उन पत्रों को एक करियर ऑप्शन की तरह चुना और कुछ को जवाब भेजकर अपने लिए दैनिक जीवन की आवश्यकताओ की पूर्ति भी की.. मसलन अपना मोबाईल रिचार्ज करवाना, सूने कानो के लिए टॉप्स खरीद्वाना, अपने लिए हैण्ड बैग्स, फास्टट्रेक की घडी और भी ऐसी कई चीज़े.. साथ ही कभी कभी हलवाई की जलेबिया और कचोरिया भी.. और सिनेमा तो आप खुद ही समझ जायेंगे.. 

खैर तीसरे साल शीला की ज़िन्दगी में आया रमेश जो कि शीला की ही तरह लुक्खा था.. बस दोनों की जोड़ी जम गयी.. पर शीला जो कि दीक्षित परिवार की बेटी थी उनको रमेश जैसे सिन्धी लड़के से अपनी बेटी की शादी नागवार गुजरी.. पर शीला ने हार नहीं मानी और घर से भाग गयी.. वो ये बात जानती थी कि माता पिता के आशीर्वाद के बिना कोई संतान खुश नहीं रह सकती.. इसलिए तिजोरी में से दस तोला सोना माता पिता के आशीर्वाद स्वरुप साथ ले गयी..  (भगवान ऐसी औलाद सबको दे).. 

रमेश कीजवानी से शादी हो गयी उसकी... सिन्धी फैमिली होने के बावजूद शीला वहा खुश है.. और अब कोई उसका नाम पूछता है तो वो कहती है कि माय नेम इज शीला... शीला कीजवानी

तीन साल बाद रज़िया 
आज से दो साल पहले एक साहब अपनी जींस ऑल्टर करवाने आये और रज़िया को दिल दे बैठे.. उम्र में वे रज़िया के अब्बू से ज्यादा तो नहीं थे पर कुछ कम भी नहीं थे.. रज़िया के पिता पहले तो बेटी के भविष्य के प्रति आशंकित थे.. पर जब उनकी आशंका देखते हुए उन साहब ने उन्हें पचास हज़ार रुपी विश्वास जताया तो वे खुदा की मर्ज़ी जानकर निकाह को राजी हो गए.. रज़िया दुल्हन बनके ससुराल पहुच गयी.. और साथ में ले गयी अपनी कैंची.. पगली, समझती होगी कि ज़िन्दगी भी इससे  कट जायेगी.. 

ज़िन्दगी में जो लोग सरप्राईजेस में बिलीव करते है उन्हें रज़िया की ज़िन्दगी देखनी चाहिए.. जिसे ससुराल में आकर कई सरप्राईजेस मिले.. आने के छ महीने बाद ही उसके पति ने उसके अन्दर छिपी प्रतिभा को खोज लिया.. और पहले से प्रतिभावान अपनी दो पत्नियों के सुपुर्द कर दिया... ये था रज़िया का दूसरा सरप्राईज़ कि उसकी माँ की उम्र की दो सौतन का होना.. वे दोनों थी भले सौतन लेकिन रज़िया का बहुत ख्याल रखती थी.. हालाँकि शुरू शुरू में रज़िया ने अपनी प्रतिभा से दुसरो को लाभान्वित करने में आनाकानी की.. पर उसकी दोनों सौतनो ने लोहे के गर्म चिमटे का सहारा लेकर उसे समझा ही दिया.. आखिर चोट खाकर ही पत्थर हीरा बनता है.. अब रज़िया से सब खुश है.. और उसके शौहर भी जो ये जानते थे कि पचास हज़ार तो यू ही निकाल आयेंगे.. 

रजिया अब कुछ बोलती नहीं बस मन ही मन अल्लाह से दुआ करती है.. कि अल्लाह बचाए मेरी जान कि रज़िया गुंडों में फस गयी.. 

तीन साल बाद मुन्नी 
मुन्नी जिसने कि महिलाओ की सेवा करके बहुत नाम कम लिया था वो अब और भी बड़ी समाज सुधारक बन गयी थी.. पर दो साल पहले ऐसा हुआ कि लेखक को भी अचंभा हुआ.. हुआ यू कि मुन्नी केरल गयी थी एक विधवा आश्रम का उद्घाटन करने.. बस वही पर उसकी मुलाक़ात डार्विन नामक व्यक्ति से हुई.. जो वहा एक एन जी ओ चलाता था.. और चाहता था कि मुन्नी जैसी समाज सुधारक उसके मिशन में उस से जुड़े.. पहले तो मुन्नी तैयार नहीं हुई लेकिन फिर जब उसने गाँधी जी की कई सारी तस्वीरो वाला बैग दिखाया.. तो गाँधी वादी विचारधारा वाली मुन्नी मना नहीं कर सकी.. 

बस फिर क्या था मुन्नी ने अब तक जितने भी महिला आश्रम खुलवाए थे वहा की महिलाओ को प्रभु के मार्ग पे चलने हेतु प्रेरित किया.. और साथ ही ये भी समझाया कि ईश्वर तो ईश्वर है फिर चाहे वो राम हो या ईशु.. जो महिलाये ये समझ गयी उन्होंने तो बात माँ ली पर जो नहीं मानी उन्हें भी गांधीवादी विचारो से मुन्नी ने मनवा ही लिया.. हालाँकि इस से कुछ मूढ़ मति लोग ये भूलकर कि ईश्वर एक है.. मुन्नी जैसी भली महिला के बारे में अनाप शनाप बकने लगे.. और तब तो उसके पुतले भी जलाये जब वो मुन्नी से मार्ग्रेट बन गयी और उसने डार्विन से शादी कर ली..

डार्विन का पूरा नाम डार्विन लिंगानुराजन था.. और मुन्नी उसे प्यार से डार्लिंग कहती थी.. अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि सुहागरात पर मुन्नी ने डार्विन से क्या कहा होगा.. जी हाँ! मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए..



तीन साल बाद शालू 
अब जनाब शालू का क्या कहे.. दुनिया उसके बारे में उल्टी बाते करती रही और वो उल्टिया करती रही.. टी वी पे तो वो हिट थी ही बाद में मोबाईल पर भी उसने झंडे गाद दिए.. जो लोग बड़े परदे पर काम नहीं मिलने की वजह से छोटे परदे पर आये थे वो शालू की उससे भी छोटे परदे पर कामयाबी देखकर जलने लगे.. शालू से जलने वालो की लिस्ट लम्बी होती गयी.. पर शालू को काम की कोई कमी नहीं रही.. 

दो साल पहले शालू ने टी वी पे अपना स्वयंवर भी रचाया था और एक बेचारे पे तरस खाके उससे शादी भी कर ली थी.. पर वो लड़का नालायक निकला उस ने शालू को सिर्फ इस बात पे तलाक दे दिया कि शालू ने उसे बिना बताये स्वयंवर पार्ट टू के कोंट्राक्ट पे साईन कर दिया.. हालाँकि शालू ने स्वयंवर पार्ट टू किया तो सही पर उसकी टी आर पी पिछले शो के मुकाबले कम रही.. तीसरे स्वयंवर में किसी और को लेने की बात पर शालू ने ही चैनल वालो को आईडिया दिया कि शादी ना सही तो तलाक पर ही प्रोग्राम बना दो.. चैनल वालो को ये सुझाव पसंद आया.. टी वी पे ही शालू ने दुसरे स्वयंवर में हुई जिस लड़के से शादी हुई थी उसी से तलाक ले लिया.. सुना है वो लड़का तीसरे स्वयंवर में फिर से पार्टिसिपेट कर रहा है.. 

जिस दुनिया ने शालू के बारे में लाख बाते कही पर फिर भी शालू सफल हो गयी.. उसी दुनिया को जवाब देते हुए शालू अपने किसी डांस शो में ये गाना गा रही थी.. कि मुन्नी भी मानी और शीला भी मानी.. शालू के ठुमके की दुनिया दीवानी  

तो दोस्तों ये थी कहानी शीला मुन्नी रज़िया और शालू की.. जो आपके चरणों में लेखक का तुच्छ प्रयास है 
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रिक्वेस्ट - जैसा कि आप जानते है कि महंगाई दिन ब दिन बढ़ रही है.. और ब्लॉग लेखन पर सरकार द्वारा कोई सब्सिडी भी नहीं मिलती इसलिए लेखक ने ब्लॉग लेखन के साथ साथ पार्ट टाईम दुकान भी खोली है जिसमे कहानी में प्रयुक्त वस्तुओ को बेचा जाएगा.. यदि आप खरीदना चाहे तो निम्न वस्स्तुओ का ऑर्डर दे सकते है.. दस परसेंट की विशेष छूट के साथ 
  1. शीला के पांच प्रेम पत्रों के सेट (जिसमे पांच के साथ एक फ्री है)
  2. रज़िया की कैंची 
  3. मुन्नी द्वारा लिखी किताब "ईश्वर एक है"
  4. और शालू के डांस की सीडी मय होंठोग्राफ (जो खुद शालू के होंठो द्वारा दिया गया है)

इनमे से किसी भी चीज़ को मंगवाने हेतु लेखक से संपर्क किया जा सकता है.. माल वी. पी. पी. द्वारा भेजा जाएगा.. 
(नोट - फैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा ना करे)

Thursday, March 31, 2011

सुगर क्यूब पिक्चर्स प्रजेंट्स "सिक्का"



उसे शौक था मरने का और मरके अमर होने का.. लोगो की यादो में.. तख्तियो पे नाम चाहता था.. स्कूलों अस्पतालों पर अपना नाम चाहता था.. यू चाहता तो वो ये भी था कि गली सड़क नहरों बांधो के नाम भी उसके नाम पर रख दिए जाए.. उसके मन में कीड़ा था अमर होने का होते जाने का.. लेकिन इसके लिए उसे मरना ज़रूरी था.. और यही एक काम था जो वो ठीक से नहीं कर पा रहा था.. उसने कई बार शाम ढले शहर की सबसे गहरी झील में डूब जाने की कोशिश की पर बात बनी नहीं.. कुछ देर तक तो वो पानी में पांव डाले बैठा रहता पर फिर थोडी देर बाद उसमे तैरती मछलियों को दाना डालकर लौट आता..

इस बार उसने पटरियों पर लेटकर ट्रेन से कट जाने का मन बनाया.. वो बहुत देर तक पटरी पे बने पुल के बीचो बीच बैठा रेलगाड़ियो को आते जाते हुए देखता रहा.. ट्रेन सामने से सीटी बजाती हुई आती.. इंजन से निकलता हुआ धुँआ उसकी साँसों में भी उतरता.. जब रेल ठीक पुल के नीचे से गुज़रती तो उसके दिल के साथ पुल भी थरथराता.. थोडी देर बाद वो हिम्मत करके सीढियों से नीचे उतर गया.. पास ही पड़ी लकड़ी उसने उठा ली.. और लकड़ी के एक सिरे को जमीन से रगड़ता हुआ वो पटरी के बराबर चलते हुए मरने के लिए सही जगह की तलाश में चलता रहा.. सूरज इस वक़्त ठीक सर के ऊपर था.. वो पटरी पर एक कोने पर बैठ गया.. सामने वाले ट्रैक पर कुछ कचरा बीनने वाले बच्चे ट्रेन के डिब्बो से फेंके गए चिप्स, बिस्किट के खाली पैकेट उठा रहे थे.. उनमे से किसी में एक चिप्स या बिस्कुट का चुरा मिल जाता तो चहक कर खा लेते.. वो बैठा यही सब देख रहा था कि उसके कानो में इंजन की आवाज़ गूंजी.. वो अपनी जगह से खड़ा हुआ.. वो चाहता था कि बच्चो को वहा से भगाकर ट्रेन के सामने खड़ा हो जाए.. पर इस से पहले की वो उन्हें भगाता उनमे से एक बच्चे ने पटरी पर सिक्का रख दिया और दुसरे से बोला कि ट्रेन गुजरने के बाद ये सिक्का सोने का बन जाएगा.. वो जानता था कि ऐसा कुछ होने नहीं वाला.. पर पटरी को घेरे उन चार चेहरों पर ठहरी आँखों में चमक देख कर वो रुक सा गया.. उसके कदम आगे नहीं बढे..

पर ट्रेन धीरे धीरे इसी तरफ बढ़ रही थी.. सीटी की आवाज़ कानो के और करीब आ रही थी.. गड गड की आवाज़ दिल दहलाने वाली मालूम पड़ती थी.. लड़के सब अपनी जगह ठहरे हुए थे.. सबकी निगाह इंजन पर टिकी हुई थी.. उसकी भी.. इंजन तेज़ी से उनकी तरफ आ रहा था.. लड़के एक कदम आगे सरक चुके थे और वो भी.. सिक्के के सोने में बदल जाने वाली असंभव सी बात के लिए वो आँखे गढ़ाए ये भी भूल गया कि वो यहाँ मरने के लिए आया था.. और इस ट्रेन के चले जाने के बाद उसे फिर साढे तीन घंटे इंतज़ार करना पड़ता.. लेकिन बिना ये जाने कि सिक्का सोना बना या नहीं वो कैसे मर सकता था? उसे लगा साढे तीन घंटे और इंतज़ार किया जा सकता.. फिर मरना तो है ही अभी मरो या साढे तीन घंटे बाद क्या फर्क पड़ता है..? इंजन मालगाड़ी का था.. जो अब उनके बिलकुल करीब आ चुका था.. पटरी के आस पास भीड़ देखकर इंजन ड्राईवर ने होर्न बजाया... पर लड़के हटे नहीं.. इंजन सिक्के के बिलकुल करीब आ गया.. कानफोडू आवाज़ के साथ रेल सिक्के के ऊपर से गुज़रने लगी.. सबकी निगाह उसी सिक्के पर थी.. जैसे ही हर डिब्बे का चक्का उस सिक्के पर से निकलता ट्रेन थोडी झुकी सी लगती.. बिजली की तेज़ी के साथ ट्रेन निकल गयी.. मिट्टी के गुबार के बीच चारो लड़के सिक्के की तरफ लपके और वो भी.. सिक्का सोना नहीं बन पाया.. अलबत्ता जो था उस से भी गया.. सिक्का चपटा हो गया जो अब किसी काम का नहीं रहा.. लड़के की आँख में आंसु आ गए.. बाकी तीनो लड़के हंसने लगे.. और अपना अपना थैला उठाके चल पड़े.. लड़का ठगा सा खड़ा कभी सिक्के को देखता तो कभी धुल उड़ाते जाती हुई ट्रेन को..

लड़के की बेवकूफी के चक्कर में उसने मरने का एक और मौका खो दिया.. उसे इस लफड़े में फसना ही नहीं था.. क्यों रुका वो यहाँ जबकि जानता था कि सिक्के का कुछ नहीं होने वाला.. पर लड़के की आँखों का विश्वास.. हाँ उसकी आँखों की चमक ही तो थी.. जिसने मजबूर कर दिया था उसे रुकने के लिए.. पर अब? साढे तीन घंटे बाद अगली ट्रेन आने तक वो क्या करेगा.. यही सोचते हुए.. उसने लड़के की तरफ नज़र घुमाई.. लड़का सिक्का वही पटरी पर फेंक कर चल पड़ा.. लड़का जा चुका था मगर सिक्का अभी भी पटरी पर पड़ा था..

Tuesday, February 15, 2011

प्यार को प्यार ही रहने दो.. कोई नाम ना दो...


उसका ये कहना कि गुलज़ार ने जो लिखा है उसके बाद प्यार का डेफिनेशन ही ख़त्म हो जाता है.. मुझे ठीक तभी याद आता है खामोशी का वो गीत..
हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू.. 

वो कहती है.. तुम खुद ही देखो ना.. क्या खूब कहा है.. सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो.. प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो.. सच है इस के बाद प्यार को कोई और क्या कहेगा.. इश्क में डूबा हुआ इंसान माशूक से ज्यादा गानों से प्यार करता है.. गोया संगीत के बिना मोहब्बत अधूरी है.. 

वो कहती है और नहीं तो क्या वैसे भी आधे शायर आशिक ही होते है.. 
और बाकी के? ये मैं पूछता हूँ.. 
माशूक...! ! 
 
वो हँसते हुए उठती है और अपनी लम्बी सी चोटी को इस काँधे से उठाकर उस काँधे पर रखती है. मेरी आँखे उसके बालो में बंधे गुलाबी रिबिन पर रुक जाती है.. ऐसे ही गुलाबी गाल हो जाते है उसके.. जब वो बहुत रोती है या फिर खिलखिलाके हँस देती है.. अब चलते हुए वो खिड़की के पास पहुँच जाती है.. और आसमान की तरफ देखती है.. मैं अपने चश्मे को टेबल पर रखके उसकी तरफ बढ़ता हूँ.... उसके चेहरे पर उगते चाँद और ढलते सूरज की रौशनी एक एबस्ट्रेक्ट सी पेंटिंग बनाती है.. मैं उसके करीब जाकर खड़ा हो जाता हूँ.. वो अभी भी चाँद को देख रही है.. मैं उसकी आँखे अपने हाथो से बंद करते हुए कहता हूँ.. तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं.. 

रात को रोंक लो... वो बंद आँखे किये कहती है..
मैं हाथ उसकी आँखों से हटाकर उसे शहर की रौशनी दिखाता हूँ.. वो देख रही हो.. हरे गुम्बद वाली मस्जिद.. वहां से आती अजानो में मुझे तुम्हारी हंसी घुली हुई सी लगती है.. 
हटो.. बहुत बड़े फंडेबाज हो तुम... वो शर्माते हुए कहती है.. कोई भी मौका नहीं छोड़ते.. 
तुम्हे छोड दे जो उसे आगरे शिफ्ट करवा देना चाहिए.. 
आगरे का पागलखाना तो खुद रांची शिफ्ट हो गया है.. 
वही रखना था.. मैं उसकी तरफ देखकर कहता हूँ.. 
वो मेरी तरफ देखती है.. उसकी निगाहों में सवाल है.. 
अरे अपने महबूब की याद में आधे लोग ताज महल जाते है 
और बाकी के..? वो पूछती है.. 
पागलखाने... !! 
 
मैं बोलके फिर से कमरे की तरफ चलता हूँ.. वो मेरे पीछे पीछे आती है.. 
 
मैं ट्रांजिस्टर उठाकर ट्यून करता हूँ.. ये वही ट्रांजिस्टर है जिस पर पिताजी गाने सुनते थे.. प्यार हुआ.. इकरार हुआ है.. प्यार से फिर क्यू डरता है दिल.. और रसोई में अपने पल्लू को कमर में फंसाए मेरी माँ गाती कि डरता है दिल रस्ता मुश्किल मालूम नहीं है कहाँ मंजिल...

 
क्या सोचने लगे मिस्टर..? वो मुझे फिर से उसी कमरे में खींच लाती है.. 
रेडियो में गाना बजने लगा है.. जीने के लिए सोचा ही नहीं दर्द सँभालने होंगे.. मुस्कुराओ तो मुस्कुराने के क़र्ज़ उतारने होंगे.. मुस्कुराओ कभी तो लगता है.. जैसे होंठो पे क़र्ज़ रखा है.. 

वो भी रेडियो की आवाज़ के साथ गुनगुनाने लगती है.. तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी.. हैरान हूँ मैं.. मैं रेडियो बंद कर देता हूँ.. और उसकी आवाज़ में डूब जाता हूँ.. 
 
मुझे ऐसा लगता है जैसे कोई कैमरा हम दोनों के क्लोज अप शोट ले रहा है.. बहुत धीरे धीरे हमारी तरफ ज़ूम होता हुआ..वो अपने दुपट्टे के छोर को अपनी नर्म उंगलियों से पकड़ लेती है.. वो ऐसा क्यू करती है ये जाने बिना मैं उसकी इस अदा को पसंद करता हूँ.. 

वो मेरी तरफ देखती है.. उसकी आँखों में आसमान के सितारे उतर आये है.. मैं दिवार पर लगी उस तस्वीर को देखता हूँ.. जिसमे रेल के दरवाजे पर एक लड़की खडी है.. और लड़का हाथ में पीले फूल लिए प्लेटफोर्म पर उसकी तरफ भागता है.. इश्क आसानी से हासिल हो जाये तो इश्क नहीं रहता.. ये सिर्फ मेरे मन का ख्याल है.. 

वो मेरी नज़र पढ़ लेती है.. और तस्वीर की तरफ बढती है.. उसके पायल की आवाज़ फर्श पर बिखरती जा रही है.. मैं एक एक आवाज़ को उठाकर अपने कानो में पहन रहा हूँ.. वो मुड़कर मुझे देखती है..
क्या देख रहे हो.. ? 
देख नहीं रहा हूँ सुन रहा हूँ... 
क्या सुन रहे हो?
म्यूजिक... 
यहाँ कहाँ म्यूजिक है ?
ये जो खामोशी पसरी हुई है कमरे में.. 
ख़ामोशी संगीत है?
यस...! ये भी एक म्यूजिक है.. गौर से सुनो इसे.. 
वो मेरे करीब आकर मेरी कुर्सी के पास बैठ जाती है.. मेरे घुटनों पर अपना सर टिका कर मेरे साथ साथ खामोशी को सुनती है... मेरी उंगलिया खुद ब खुद उसके बालो में उलझ जाती है.. मैं उसके बाल सहला रहा हूँ.. वो मेरे दायें पैर के अंगूठे से खेल रही है...उसकी मासूमियत मैं अपने अंगूठे पर महसूस करता हूँ..

तुम बालो को खुला रखा करो.. खुले बालो में तुम अच्छी लगती हो.. मैं पता नहीं क्यों उसे ऐसा कहता हूँ..
पर तुम कंघी मत किया करो.. बिखरे हुए बाल तुम पर अच्छे लगते है.. मैं तुम्हे हमेशा ऐसे ही देखना चाहती हूँ.. वो मेरे बाल बिखेर देती है.. मेरी नज़र उसकी कान की बालियों पर है..
ये वही है ना जो मैंने तुम्हे तुम्हारे इक्किस्वे जन्मदिन पर दी थी.. मैं छूकर देखता हूँ..
आउच. .अरे धीरे.. उसके कानो में दर्द होता है..
क्या कर रहे हो? वो पूछती है..
इस शाम को कैद करने की कोशिश... मैं अलमारी से कैमरा निकालता हूँ और मैक्रो मोड़ में उसके कानो की बालियों की फोटो लेता हूँ.. उसकी गर्दन पर हल्के हल्के बालो के बीच झूलती बालिया.. मैं इनमे अक्स देखता हूँ.. अपनी ज़िन्दगी का.. इस छोटे से लैंस में मुकम्मल नज़र आती है मुझे..

वो करीब आकर कैमरे के लैंस पर हाथ रख देती है.. मैं उसके माथे पर चूमता हूँ.. वो खुद ही खुद में सिमट जाती है.. मैं एक खामोश अंगड़ाई लेते हुए उठकर कॉफ़ी का प्याला उठाता हूँ..  उसकी नज़रे मेरी तरफ है.. मैं मुमताज़ मिर्ज़ा की ग़ज़ल का शेर पढता हूँ..

वो एहतराम ए गम था कि लब तक ना हिल सके.. 
नज़रे उठी तो सर ए हद ए गुफ्तार तक गयी.. 

ठीक उसी वक़्त सड़क  पर लगे लैम्प पोस्ट की रौशनी खिड़की से अन्दर आती है..  और वो कहती है

तन्हाईयो ने फासले सारे मिटा दिए.. 
परछाईयां मेरी.. तेरी दिवार तक गयी.. 

मेरी नज़र खिड़की की रौशनी से फर्श पर बनी उसकी परछाई पर जाती है.. वो ठीक मुझ तक पहुंची है.. मैं एक बार फिर उस पर मर मिटा हूँ.. वो मुस्कुराये जा रही है.. मैं दौड़कर उसे गोद में उठा लेता हूँ.. और पूछता हूँ.. 
विल यू बी माय वेलेंटाईन ?? 
वो कहती है ये तो मैं पहले से ही हूँ.. कुछ और बोलो.. 

मैं उसे उठाकर फ्रिज पर बिठा देता हूँ..  
आलवेज बी माय वेलेंटाईन.. मैं उसके मुलायम हाथो को अपने हाथ में लेकर कहता हूँ.. 
 
अब उसकी आँख में आंसु आ गए है.. और गाल गुलाबी हो गए है.. उसके गालो का गुलाबी रंग पुरे कमरे में बिखर गया है.. खामोशी अभी भी ठहरी हुई है कमरे में.. एक संगीत की तरह हमारी आवाज़े मिल रही है फजाओ से.. हवा ने खिड़की पर पर्दा उड़ा दिया है.. मैं उस से कहता हूँ.. कभी गुलज़ार साहब मिले तो उनसे कहूँगा कि हमने भी देखी है उन आँखों की महकती खुशबू..

वो अपने ऊँगली मेरे होंठो पर रखती है.. और मेरे कान में हौले से आकर कहती है.. प्यार को प्यार ही रहने दो.. कोई नाम ना दो...

Sunday, January 30, 2011

ज़िन्दगी में और भी रंग है खुदको रंगने के लिए..

 बीन बैग में अगर जुबान होती तो वो ज़रूर कहता कि इस बैडोल हो चुके शरीर को अब उठा क्यों नहीं लेती.. लेकिन ये भी खामोश है.. शाम उर्दू की एक किताब पढ़ते हुए मैं इस पर आ बैठी थी.. अभी रात के दो बजे जब दोबारा चाय की तलब हुई तो ख्याल आया कि रात का खाना पका हुआ ही रह गया.. वैसे भी जली हुई दाल और अधपके चावल खाने में कुछ भी अच्छा नहीं था.. बिना मन से बने खाने में जायका नहीं होता.. चाय बनाकर पांचवे और लास्ट कप में चाय डालकर फिर से बीन बैग पर जा बैठती हूँ.. मेरे पास पांच कप है.. और जब तक पांचो में चाय नहीं पी ली जाए वो धुलते नहीं.. अब किताब पढने का मन नहीं है.. दरअसल मन शाम से ही कुछ ठीक नहीं ऊपर से माँ का शादी के लिए बार बार फोन करना.. सिर्फ इसलिए कि मेरी उम्र बीत रही है, किसी से भी शादी कर लेना कहाँ तक जायज है.. मैं खुद को समझाती हूँ..

मोबाईल उठाकर कोंटेक्ट लिस्ट को छान मारा एक भी नंबर ऐसा नहीं जिस पर कॉल किया जा सके.. कुंवारे लडको से बात करने पर सिवाय फ्लर्ट के और कुछ नहीं मिलता.. ऐसा नहीं है कि मैं समझती नहीं पर अच्छा लगता है.. मेल फ्रेंड्स ज्यादा हो गए है अब मेरे.. जो लडकिया थी उन सबकी तो शादिया हो गयी.. एक दो बार फोन लगाया भी तो पीछे से उनके हसबैंड का बार बार फोन रखने की आवाज़ सुनकर दोबारा मन ही नहीं किया कॉल करने का.. लोग घर पर बुलाने से भी डरते है.. मेरी एक सहेली की सास को लगता है कि मेरा कैरेक्टर ठीक नहीं है इसलिए मेरी शादी नहीं हुई.. बुल शीट.! 

पर कभी कभी जब मेरी कॉलेज की वो सहेलिया घर आती है जिनकी शादी हो चुकी है.. तो ये सोचकर बड़ा अच्छा लगता है कि पहले जब वो आती थी तो अपने पति अपने ससुराल की बाते करती थी.. पर अब यहाँ आकर वो कहती है काश ऐसी लाईफ हम भी जी सकती.. मुझे क्यों ऐसा लगता है जैसे कुछ भी हमेशा नहीं रहने वाला.. ना शादी ना अकेलापन.. रहेंगे तो बस हम..

इस अकेलेपन से प्यार हो जाने के बाद भी कई बार किसी की जरुरत सी महसूस होती है.. लैम्प पोस्ट की पीली रौशनी खिड़की से कमरे में बिखर रही है.. चादर में सिलवटे कुछ बढ़ गयी है...दिवार पर मार्लिन मुनरो अपनी स्कर्ट उठाये खडी है.. उसके ठीक सामने बिना शर्ट के जॉन अब्राहम..  मैं अपनी आँखे बंद कर लेती हूँ.... मेरा हाथ कमर के नीचे जाता है.. बस कुछ और सालो की बात है.. उसके बाद इसकी भी जरुरत नहीं होगी.. आखिर ज़िन्दगी में और भी रंग है खुदको रंगने के लिए.. 

Monday, December 6, 2010

पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..












पतले चक्कों वाली सायकिल
पर पैंडल मारते मारते
शहर के दुसरे कोने
में आ गए..
अब बस्ते रख दिए है
पेड़ से सटाकर..
और मोजो को
जूतों में खिसका दिया है..
कोहनी का तकिया बनाकर.
लेट गए है मिट्टी में
और देखते हुए
आसमान में
मुस्कुराकर कहते है.. कि साला
पी टी आई जो पकड़
लेता तो धुनाई बहुत होती..

कुछ देर सुस्ताकर
खोलते है टिफिन
मेथी के परांठो
की खुशबू लुटा देते
है आसमानों में..
अब एक टांग पे टांग
टिकाये गिनते है
अंटी के सिक्को को..
और खरीद के पतंग
चाँद तारो वाली
बस्ते से चरखी..
निकाल लेते है..

लम्बी तान पतंग को देके..
बस ऊपर ही तकते है..
कट जायेगी जब
दस पांच पतंगे..
झाड के पैंट को अपनी..
बस्ते में चरखी धर लेंगे..
सायकिल पे रख के बस्ता अपना
फिर से घर को चल लेंगे..

जो कहते है
ऐसा हाल रहा तो
आगे जाकर क्या करोगे?
उनकी हमको फ़िक्र नहीं
आफ्टर आल अभी
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..

Thursday, September 16, 2010

सोशल मिडिया मैरिज..


सीन 1 

- सुनो जी रश्मि अब बड़ी हो गयी है.. कल रात भर लैपटॉप पर बैठे बैठे ना जाने किससे चैटिंग कर रही थी.. मुझे लगता है अब इसकी शादी करवा देनी चाहिए..  
- ठीक है मैं आज ही शादी.कॉम पर उसकी प्रोफाईल बना देता हूँ..  
- अरे उसकी क्या जरुरत है..? वो अपनी फेसबुक वाली मिसेज शर्मा है ना.. उनके कोई ऑरकुट फ्रेंड का लड़का है.. फ्लिकर पर फोटो अल्बम देखा उसका.. देखने में तो बड़ा सुन्दर है.. ट्विटर पर एक हज़ार से ज्यादा फोलोवर है उसके.. और तो और खुद के डोमेन पर अपना ब्लॉग भी बना रखा है.. आप कहे तो बात करू उनसे.
- हूँ..! ठीक है पर पहले रश्मि से भी पूछ लेना.. 

सीन 2

- रश्मि बेटा क्या कर रही हो.. ?
- कुछ नहीं मोम बस अपने स्टेटस मेसेज्स के रिप्लाई दे रही थी.. 
- बेटा हमने तेरे लिए एक लड़का पसंद किया है..  बहुत अच्छा लड़का है.. उनकी मम्मी से मेरी चैट भी हुई थी.. मैंने तुम्हारा ऑरकुट प्रोफाईल का लिंक भी दे दिया उनको.. 
 - ओ मोम इतनी जल्दी क्या है. .? और वैसे भी बिना किसी को जाने पहचाने कैसे शादी कर लु..?
 - अरे तो मैंने कब मना किया है..  तुझे उसकी प्रोफाईल का लिंक मेल कर देती हूँ.. देख ले कैसा दिखता है.. कैसे दोस्त है उसके.. अच्छी कंपनी में काम करता है.. तुझे लिंक्ड इन का भी लिंक दे दूंगी.. तु एक बार देख तो सही.. 
 - ठीक है मोम.. 
सीन 3 

rash003 : hi
jatin.kumar1984 : hi 
do i know u?
rash003 : meri mom ne aapka
id diya tha 
jatin.kumar1984 : oh ha mummy ne 
bataya tha.. ms. sharma ki follower 
hai na aapki mom..
rash003 : ya 
wo chahte hai hamari shadi ho jaye
jatin.kumar1984 : not bad
kya karti ho tum?
ye mera linked in ka id hai..
it company mein hu 
jatin.kumar1984 : nice job! main bhi it 
company mein hu ye mera profile hai
rash003 : ha main dekh chuki hu..
profile is good.. but main chahti hu ki
hum face 2 face bhi mile ek baar
u know itna bada decision hai  
jatin.kumar1984 : i understand.. in fact
main bhi chahta tha face 2 face baat karna
rash003 : good to u have web cam?
jatin.kumar1984 : ya 1 sec.
rash003 : u have nice hair cut
jatin.kumar1984 : thanks! tumhara chashma 
to kool hai.. 

सीन 4

- ये देखो.. रश्मि ने ब्लशिंग वाला स्माईली भेजा है लगता है शरमा गयी अपनी शादी की बात सुनके.. 
- वो सब तो ठीक है लेकिन उसे लड़का पसंद है या नहीं ?
- हाँ है ना आप खुद ही देख लो फेसबुक पे खुद लाईक किया है उसने 
- हूँ.. ठीक है तो फिर गूगल में कोई अच्छा सा मुहूर्त सर्च करके शादी करवा देते है दोनों की.. 


- परसों शाम का मुहूर्त निकला है.. 
- अरे लेकिन ये तो बहुत जल्दी होगा.. नेट की स्पीड भी स्लो है सबको इनविटेशन कैसे भेजेंगे ?
- अरे इसमें क्या है कार्ड अपलोड करके सबको लिंक शेयर कर देंगे. इसमें कितना तो टाईम लगता है.. सब हो जायेगा  
- ठीक है फिर..शादी के मन्त्र की एम् पी थ्री डाउनलोड करलो नेट से.. फोटो अल्बम के लिए पिकासा ठीक रहेगा और वीडियो के लिए यू ट्यूब पर अकाउंट बना लेता हु.. 
- आज मेरे लिए बहुत ख़ुशी का दिन है मैं अभी अपना स्टेटस अपडेट करती हु..  


सीन 5
जतिन और रश्मि ने अपना स्टेटस चेंज किया  

jatin is married now
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rashmi is married now
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सीन 6

- क्या कर रही हो रश्मि डार्लिंग?
- अरे स्पीड बहुत स्लो है जतिन सबने बधाईया ई ग्रीटिंग्स से भेजी है ना फ्लैश में है देर लग रही है खुलने में.. 
- कम ऑन रश्मि तुम्हारे पास मेरे लिए तो वक़्त ही नहीं है.. मैं कबसे तुम्हे पिंग कर रहा हूँ और तुम हो कि.. पता नहीं कहा बिजी हो..
- सोरी हनी डीसी हो गया था.. प्लीज डोंट माईंड..  

सीन 7

जतिन और रश्मि को हैप्पी वेडिंग एल्बम में टैग किया गया 
3 व्यक्तियों को ये पसंद है 




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Wednesday, September 8, 2010

सड़क पर औंधे मुंह पड़ा शहर..

सुना भी तो जा सकता है..


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शहर का गिरेबान पकड़ कर जैसे किसी ने उसे नीचे गिरा दिया हो.. सड़क पर औंधे मुंह पड़ा हुआ है.. सड़क पर ही पड़ी खाली शराब की बोतले.. एक दुसरे से टकरा टकराकर सन्नाटे को तोड़ने की कोशिशे कर रही है.. उनमे बची थोडी बहुत शराब नालियों में बहती जा रही है.. सिगरेट के कुछ बुझे पड़े ठूंठ रात की चिंगारियों से अभी तक खुद को अलग नहीं कर पाए है.. कुत्ते.. कुत्तो की तरह फूटपाथ पे लेटे हुए है.. और इन सब पे नज़र रखता लैम्पोस्ट बिना हिले अपनी जगह पर खड़ा खड़ा चुपचाप सबकुछ देखता जा रहा है..

तेज़ी से भागती गाडियों के चक्के सड़क की छाती पर निशान छोड़ गए है.. हवा निकल कर फुस्स हो चुके गुब्बारे सड़क के कोनो में बिखरे हुए है.. दो चार पतंगे बिजली के तारो में उलझी हुई है.. दीवारों पर लिखा दिल्ली चलो अब कुछ साफ़ नहीं दिखता.. सड़क पर जमा कचरे में चूहे मुंह मार रहे है..

दूर कही से रेडियो के गाने की आवाज़ आयी है.. ऊंची हील वाली एक सैंडल सड़क पर पड़ी है.. थोडी ही दूरी पर दूसरी सैंडल, आगे चलकर लेडिज पर्स और उसके आगे घुप्प अँधेरा.. लोग अभी तक सो रहे है.. सूरज थोडी देर में निकलेगा निकल ही आएगा.. अखबार से भरा हुआ ट्रक सड़क से गुज़रा है.. फूटपाथ पे लेटे आदमी की टांग से इंच भर के फासले से.. चमेली के पत्तो की महक सहमी सहमी सी सड़क तक आ रही है..

मंदिर में घंटीया बज रही है.. दरगाह से अजान की आवाज़ भी आ रही है.. कुत्ते भोंकते हुए भाग रहे है.. अखबार वाला सायकिल की घंटी बजाता हुआ निकला है... नीम के पेड़ पे बैठी चिड़ियाओ की आवाज़े आ रही है.. कुलमिलाकर अब कह सकते है कि सुबह हो रही है.. ये दिन गुजरेगा.. बीतेगा.. बीत ही जाएगा... फिर शाम होगी, रात होगी और सुबह होगी.. सब कुछ युही चलेगा... चलता ही है.. चलता ही जाएगा..

Monday, August 30, 2010

ज़िन्दगी के सबसे मुश्किल पलो में प्यार मिठास घोल देता है..


'अभी इतनी बूढी भी नहीं हुई हूँ कि तु कुछ भी कहे और मान लु मैं.. इस डिब्बे से कैसे हो जायेगी बात तेरे नानाजी से..?' बोलते हुए नानीजी अपनी दवाइयों वाली थैली में से दवाई निकालने लगी..
अरे आप तो बस देखती जाओ.. शाम को तैयार रहना मैं नानाजी के पास जाकर फोन करूँगा.. आप उठा लेना..

सत्तर की उम्र में भी एकदम चुस्त नानाजी एक दिन चलते चलते सड़क पर गिर पड़े.. आसपास वाले लोगो ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया.. बस तबसे वही है.. नानीजी ने तो तीन साल पहले ही बिस्तर से ऐसी दोस्ती गांठी कि फिर बिस्तर छोड़ने का सवाल ही नहीं उठा.. हर रोज़ नानाजी को याद करती रहती बस.. जैसे ही कोई अस्पताल जाकर आता उस से बस नानाजी के बारे में ही पूछती.. ठीक तो है ? कब वापस आयेंगे ?

जब भी घर के दरवाजे पर कोई आवाज़ होती है.. उन्हें लगता नानाजी आ गए.. जब मैं नानीजी के पास पंहुचा तो वो बोली 'क्यों रे तेरे नानाजी मेरे बारे में पूछते नहीं है.. ?'
'पूछते है ना' मैंने कहा..
'अच्छा क्या बोलते है ?' नानी जी आँखों में चमक लिए हुए बोली..

'बोलते है तेरी नानी तो मुझे भूल ही गयी है.. सब मिलने आते है वो ही नहीं आती.. '
'झूट..!' नानी बोली 'ऐसा तो हो ही नहीं सकता...  वो तो अब पांव उठते नहीं है वरना तो चली ही जाती.. पता नहीं कैसे होंगे वो? '
'अच्छे है नानी.. आप क्यों चिंता करती हो.. '
'लल्ला मेरा एक काम करेगा..' नानी बड़े प्यार से बोली
'हाँ कहो ना नानी.. '
'तु एक चिट्ठी लिख देगा उनके लिए.. जैसा मैं कहती हूँ बस वैसे.. '
'अरे वाह लव लैटर.. क्या बात है नानी.. '
'चुपकर बेसरम..! बस किसी को बताना नहीं.. '
ठीक है नानी बताओ क्या लिखना है..

छुटकी के पापा,
आप मेरे लिए उस दिन इमली लाने गए थे ना फिर अभी तक वापस क्यों नहीं आये..? बच्चो से पूछती हूँ तो कहते है पापा ठीक है.. पर मुझे लगता है कुछ ठीक नहीं.. जब आप पास नहीं होते हो तो कुछ ठीक क्यों नहीं लगता..? रोज़ शाम को सोचती हूँ आप आज आ जाओगे पर आप नहीं आते हों..  मेरा यहाँ अकेले मन नहीं लगता.. बस बैठी बैठी आपकी आराम कुर्सी को देखती रहती हूँ.. कभी खिड़की से हवा आ जाये तो इसे हिलती देखती रहती हूँ आप अखबार पढ़ते हुए ऐसे ही तो बैठते है इस पर..  और तो और कौनसी दवाई कब लेनी है कुछ पता नहीं चलता.. रोज़ खिड़की पर गाय आकर खडी हो जाती है वो अलग.. मुझसे तो उठकर रोटी दी नहीं जाती.. कल छोटा गया था उसको रोटी देने पर खायी ही नहीं.. आप आओगे तभी खाएगी.. और हाँ वो टेबल पर पड़ा कैलेण्डर भी नहीं बदला है किसी ने.. जिस तारीख को आप गए थे अभी भी वैसी की वैसी है.. बाहर ठण्ड भी पड़ने लग गयी अब तो.. आप जर्सी नहीं ले गए थे मैं लल्ला के साथ भिजवा दूंगी.. और कान खुले मत रखना आपको सर्दी जल्दी लग जाती है.. मेरी चिंता मत करना आप मैं यहाँ बिलकुल ठीक हूँ.. बस आप जल्दी से आ जाओ..

मैं पैन चलाते चलाते रुक कर नानी को देखने लगा.. आँखे कब भीग आयी पता ही नहीं चला.. नानी बोले जा रही थी बस.. मैं उन्हें देख रहा था..

क्या हुआ लल्ला ? लिखा कि नहीं? नानी ने मेरी ओर देखा..
'लिख दिया नानी..' मैंने नानी की हिदायतों के साथ उस चिट्ठी को जेब में डाला.. और नानी की दी हुई जर्सी ली..  

नानाजी.. कुछ बोलते नहीं थे.. पर हाँ सुन जरुर सकते थे.. मैंने मौका देखकर नानी जी वाली बात कही.. उन्होंने मेरी तरफ देखा.. कुछ बोलने की कोशिश की पर बोल नहीं पाए.. मैंने चिट्ठी निकालकर पढना शुरू किया.. नानाजी के हाथो में हलचल देखी.. ज्योंही चिट्ठी ख़त्म हुई नानाजी की आँख से एक आंसू गिर कर उनके गालो पर आ गया.. नानाजी ने हाथ उठाकर मुझे बुलाया.. मेरे पास जाते ही उन्होंने अपना हाथ मेरे सर पर रख दिया.. उस शाम मैं और नानाजी बहुत रोये..

मैं जानता था नानीजी को आज सारी रात नींद नहीं आयी होगी.. सुबह जब पहुंचा तो नानीजी बिस्तर पर बैठी अपनी दवाइयों से उलझ रही थी.. मेरे जाते ही उन्होंने पुछा क्यों लल्ला पढ़ा उन्होंने क्या कहा ? कब आ रहे है ?

जब नानीजी को बताया तो वो बहुत खुश हुई.. अब तो ये रोज़ का सिलसिला बन गया..
 मैं हर रोज़ नानीजी का लैटर लेकर अस्पताल जाता.. और नानाजी को पढ़कर सुनाता.. धीरे धीरे नानाजी बोलने भी लग गए थे..

एक दिन मैं अपने दोस्त से मोबाईल लेकर आया..

अभी इतनी बूढी भी नहीं हुई हूँ कि तु कुछ भी कहे और मान लु मैं.. इस डिब्बे से कैसे हो जायेगी बात तेरे नानाजी से.. बोलते हुए नानीजी अपनी दवाइयों वाले थैली में से दवाई निकालने लगी..
अरे आप तो बस देखती जाओ.. शाम को तैयार रहना मैं नानाजी के पास जाकर फोन करूँगा.. आप उठा लेना..

उस दिन मैं नानीजी के पास लैंडलाईन फोन रखकर गया और नानाजी  के पास जाकर मोबाईल से बात करवाई.. 'हल्लो हल्लो' नानाजी से जोर से बोल रहे थे.. शायद नानीजी को अब भी यकीन नहीं था.. कि वो नानाजी से बात कर रही थी..

'मुझे कहाँ कुछ हुआ है..' नानाजी बोल रहे थे..
'वो तो तु दिन भर परेशान करती रहती है,, इसलिए कुछ दिनों के लिए यहाँ चला आया.. थोड़े दिन तो आराम से रहूँगा यहाँ.. और तुझे कहाँ मेरी फ़िक्र है तुझे तो तेरी इमली की चिंता है..  इमली भी पड़ी है मेरे पास.. लल्ला के हाथ नहीं भेजूंगा.. खुद लेकर आऊंगा नहीं तो तू नाराज हो जाएगी.. और तु मेरी चिंता मत करना.. मैं यहाँ अच्छा हूँ.. बस दिन भर तेरी आवाज़ नहीं आती.. तु वो गाना गाती थी ना.. "अभी ना जाओ छोड़कर..." वो बड़ा याद आता है..  मैं तो सीख ही नहीं पाया.. इस बार मुझे याद करा देना पूरा.. अकेले में गा लिया करूँगा.. अरे लल्ला सुनता है तो क्या हुआ...? और हाँ तेरी दवाई की पर्ची अलमारी में रखी है लल्ला को बोलके सब टाईम पर ले लेना.. नहीं तो फिर खांसती रहेगी रात भर और मुझे भी नहीं सोने देगी.. मैंने जर्सी पहन ली है.. अभी भी वैसी की वैसी है.. जैसी तुने पहली बार सिलाई की थी.. तेरी सारी चिट्ठिया मिली मुझे. क्या जरुरत थी इन सबकी? अभी भी बच्ची की बच्ची है तू तो.. हाँ हाँ अपना ख्याल रखूँगा..मेरी चिंता मत करना तू बस अपना ख्याल रखना.. मैं जल्दी आऊंगा घर फिर से तेरी किचकिच सुनने .. ' अब रखता हूँ.. ख्याल रखना..

अगली बहुत देर तक मैं नानाजी को देख रहा था.. वो कौनसी डोर होंगी जिसने नाना नानी को उम्र के इस दौर में भी बाँध रखा है.. ज़िन्दगी के सबसे मुश्किल पलो में प्यार कैसी मिठास घोल देता है कि हम सब दर्द भूल जाते है.. नानी जी अपने सब दर्द भूलकर नानाजी को चिट्ठी लिखती है.. नानाजी साँसों से लड़ते हुए उनसे इस तरह बात करते है जैसे पहली बार बात कर रहे हो..  ज़िन्दगी के उस मोड़ पर जब दुनिया पीछे छूट जाती है.. तब प्यार ही दो रिश्तो में गर्माहट बरकरार रखता है..

दूसरी शाम जब मैं अस्पताल पहुंचा तो सब लोगो को नानाजी के आसपास खड़ा देखा.. नानाजी वादा तोड़कर जा चुके थे..

'लल्ला!...' नानी की आवाज़ ने चौंकाया..
नानाजी को गुज़रे हुए तीन हफ्ते बीत चुके थे.. नानीजी बिना कुछ बोले बस बिस्तर पर लेटी रहती थी.. आज जब मैं उनकी दवाईयो पर निशान लगा रहा था.. नानीजी बोली..
लल्ला... एक बात कहे.. ! तुम उस दिन वो लाये थे ना जिससे तुमने नानाजी से बात करायी थी..
'मोबाईल '
हाँ वही.. वो तो बड़ी अच्छी चीज थी.. उस से एक बार तेरे नानाजी से बात करा दे ना.. आज यहाँ मन नहीं लग रहा हमारा..

Thursday, August 19, 2010

खो जाने में जो मज़ा है वो पा जाने में कहाँ..?


आज थोडी देर के लिए सूरज को पीछे धकेल देते है.. गर्मी से हाल बुरा कर दिया ससुरे ने... चाँद को भी थोडा नीचे सरका देते है. साला धरती पे लाईट कम मारता है.. इन चिनार के पेडो की हाईट कम करनी पड़ेगी वरना लोग अमरुद समझ कर आसमान से तारे तोड़ लेंगे.. और बादल! बादलो का क्या करे..? पब्लिक ट्रांसपोर्ट में लगा देता हूँ.. इधर उधर घुमते रहते है दिन भर.. इसी बहाने लोगो को ठिकाने लगाते रहेंगे.. वो पिकासो वाली पेंटिंग लाना यार.. मोनालिसा वाली... एक काम करते है उसको आसमान पे एक साईड में लगा देते है.. धरती घूमेगी तो पूरी दुनिया देख लेगी.. पेंटिंग वाले ब्रश और कुछ वाटर कलर ले आओ.. सारे बच्चो को हाथ में देकर बादलो पे बिठा दो.. आसमान में रंग भरते रहेंगे.. एक काम करो ना यार कोई बढ़िया सा मोगरे वाला परफ्यूम लाकर स्प्रे मार दो.. पूरी दुनिया में..

दो बड़े वाले स्कूप भर के हिमालय की बर्फ उठा लों और शरबत डालकर बरफ के गोले बाँट दो सबको... दुनिया में बहने वाली सारी हवा को थोडी देर के लिए डीप फ्रीज़र में रख दो.. ताकि ठंडी ठंडी हवा सबके गालो को लगे... दो लोग जाओ और दुनिया के सारे नींबू तोड़ के समंदर में मिला दो.. इस बार बारिश में सबको नींबू पानी पिलायेंगे.. वो इन्द्रधनुष उधर कहाँ लटक रहा है.. उसको यहाँ सेंटर में रखो.. और लाल वाला रंग थोडा झुका के नीचे रखो ताकि लडकिया उसमे ऊँगली डुबाकर लिपस्टिक लगा ले..

ज़मीन का एक टुकड़ा काटकर पतंग बना दो उसकी.. आसमान में पेंच लड़ायेंगे सब.. और रेगिस्तान की मिट्टी के खिलौने बनाकर बाँट दो बच्चो में.. बादलो में जमा बूंदों में गुलाब जल मिला दो.. महकती हुई बारिशे मिट्टी की खुशबू को और हसीन बना देगी...

खो जाने में जो मज़ा है वो पा जाने में कहाँ..?

...............

मेरी बात सुनके हँसना मत..
कि मैं दौड़ना चाहता हूँ तितलियों के पीछे
और बनाना चाहता हूँ..
समंदर के करीब रेत के टीले
और पकड़ के खरगोश को
दोनों हाथो में... अपने गालो को
गुदगुदाना चाहता हूँ..
मैं भीगना चाहता हूँ बारिश में
और छातो को जमा पानी में
उल्टा बहाना चाहता हूँ..
मैं भागना चाहता हूँ.. नंगे पांव
और बात करना चाहता हूँ  हर अजनबी चेहरे से
या देखकर उन्हें बिना बात के मुस्कुराना चाहता हूँ..
मैं ठोंक के कील इसकी
पीठ में.. ज़िन्दगी को जीना चाहता हूँ..

Friday, August 6, 2010

कुत्ते का इंतकाम..

कुत्ता जो है वो टांग पे टांग टिकाये फूटपाथ पे लेटे लेटे सामने लगे खम्बे को घूर रहा है.. इस खम्बे ने ही उसकी धार से उसी को करंट दे दिया था.. और वो भी नुक्कड़ की मिसेज गुप्ता की हरमाईनी के सामने... जी जनाब आपने बिलकुल ठीक पढ़ा हरमाईनी.. अब ये जो मिसेज गुप्ता है ये पति के ऑफिस चले जाने के बाद अक्सर किताबो में घुस जाती है.. किताबे इन्हें अपने बच्चो सी लगती है खुद की कोई औलाद नहीं शायद इसलिए किताबो को गोद ले लिया इन्होने... खैर वजह चाहे जो भी हो हम उसमे अपना मुंह नहीं मारते.. और बात को आगे बढ़ाते है.. तो ये मिसेज गुप्ता जो है जिनकी बात मैं कर रहा हूँ.. इन्हें बच्चो की किताबे बहुत पसंद है.. और खासकर जे के रोलिंग की हैरी पोटर..   और उसी हैरी पोटर की किताब के एक किरदार हरमाईनी के नाम पर इन्होने अपनी प्यारी कुतिया का नामकरण किया है.. नहीं जनाब कुत्तो का नाम अंग्रेजी में रखके अपनी गुलामी का बदला नहीं लिया जा रहा है.. ये तो बस भावनात्मक दृष्टिकोण है.. अब रख लिया तो रख लिया जाने दीजिये.. खामख्वाह उत्तेजित होंकर क्यों अपना बी पी बढा रहे है..

अब पढ़िए चुपचाप...! तो हरमाईनी जो है.. अरे साहब वही हरमाईनी जिसके बारे में ऊपर बताया मैंने.. हाँ तो हरमाईनी जो है वो मिसेज गुप्ता के चार गोल चक्कर काटके फुदकती हुई सड़क किनारे जा लगी ही थी कि ठीक तभी अपनी कहानी का नायक उसी खम्बे पे टांग उठाये खड़ा हुआ जिस खम्बे की बात मैंने पहली ही पंक्ति में की है.. बस जनाब जैसे ही उसने धार लगायी की खम्बे ने करंट का झटका मारा और कुत्ता फटके से पीछे जा गिरा.. हरमाईनी बेशर्मी से खींसे निपोर कर मुस्कुराने लगी.. और कुत्ते की आँखों में खून उतर आया...पर स्थिति की गंभीरता और उष्णता को देखता हुआ बेचारा अपमान का घूँट गिलास में डालकर पी गया.. लेकिन उसी दिन से कुत्ता अपने अपमान का बदला उस नामाकूल खम्बे से लेना चाहता है पर मौका है कि मिलता ही नहीं..

और आज जब शहर के बाशिंदे लिहाफो में घुसे पड़े ऊंघ रहे है तब कुत्ता जो है वो टांग पे टांग टिकाये फूटपाथ पे लेटे लेटे सामने लगे खम्बे को घूर रहा है.. चाहता तो वो ये है कि मोहल्ले के सारे सड़क छाप कुत्तो को ले जाके धार लगाकर खम्बे को नाले में बहा दे.. पर जबसे उस कुत्ते की फजीती की खबर बाकी कुत्तो को मिली है सब उस खम्बे से कन्नी काटने लगे है.. कुत्ता मन ही मन बाकी कुत्तो को गाली देता है.. "इंसान साले"

कुत्ता अपनी बेबसी के चलते रात होते होते जैसे ही जोर से रोता है पड़ोस की खिड़की से एक चप्पल आके उसके मुंह पे दर्ज हो जाती है.. "हरामी कही के.. " कुत्ता शायद ऐसा ही कुछ मन में सोचता है.. अब नहीं सोचता तो नहीं सोचता होगा लोड क्यों ले रहे है.. जाने दीजिये.. तो कुत्ता खिसियाकर चुपचाप आंसु बहाने लग जाता है.. और एक बात मैं आपको बता दूँ.. कि जब भी कोई कुत्ता उदास होता है तो वो गाना गाता है.. अब गाना सुनने के लिए उतावले मत होइए..  कुत्ते का गाना तो मैं आपको सुनाने से रहा..

तो जनाब कुत्ता गाना वाना गाकर सो तो गया है पर उसके कुत्ते जैसे मुंह पर जो मुस्कराहट चम चम कर रही है उसकी वजह सपने में उसके और खम्बे के बीच हो रहे घमासान युद्ध का सीन है.. कुत्ता धनुष बाण लेकर हरमाईनी के घर के ठीक सामने खड़ा है.. खम्बा कुछ ही दूरी पर लगभग घबराया हुआ है.. हर्माइनी की जो उंगलिया है वो उसी के दांतों के तले दबी हुई है.. कुत्ता अपने धनुष से एक बाण छोड़ता है.. और हवा में एक से छ: बाण हो जाते है. और सभी बाणों के आगे लाल पीले सितारे चमक जाते है.. बाण तो खम्बा भी छोड़ता है पर कुत्ते के तीरों से टकराकर बाण टूटकर गिर जाते है.. कुत्ता मुस्कुराता है और हरमाईनी की तरफ विजयी भाव से देखता है.. हरमाईनी जो है वो बेवकुफो की तरह पता नहीं क्यू लाल हुए जा रही है..

कुत्ता तीर पे तीर चलाते चलाते भूल गया है कि सुबह हो चुकी है.. और बाकी के कुत्ते उसकी मुद्राओ को देखकर खी खी कर रहे है.. कल रात जिस खिड़की से चप्पल आयी थी उसके मकान मालिक सूरज को अर्क देने के लिए खिड़की खोले है और उलटे लेटे हुए हवा में पाँव किये कुत्ते की मुद्रा देखकर दूसरी चप्पल कुत्ते के पेट पर धढ़ाम से अर्पित करते है.. कुत्ता भक से उठता है और चप्पल फेंकने वाले को ऐसे शब्द कहता है कि जो मैं यहाँ लिख नहीं रहा हूँ..

थोडी दूरी पर जाते ही सामने खड़े कुत्तो को हँसते हुए देखकर.. कुत्ता अपने सपने को याद कर के खिसिया जाता है.. उसे ऐसा लगता है जैसे इस संसार में उसका अब कोई नहीं रहा.. वो धरती पर दो दो कौड़ी के खम्बो से झटके खाने के लिए ही पैदा हुआ है.. या फिर मुए मरदूदो की चप्पल झेलने के लिए.. पर इस कुत्ते जैसी ज़िन्दगी से तो मरना ही बेहतर है.. यही सोच के कुत्ता सामने से आ रही ट्रक के चक्के के कदमो तले शहीद होना चाहता है.. कि तभी हरमाईनी भागती हुई आकर उसकी पूँछ पर पांव रख देती है..

मुझे मर जाने दो मैं जीना नहीं चाहता.. कुत्ता फ़िल्मी डायलोग मारता है.. हरमाईनी उसके मुंह पर अपने हाथ रखके कहती है मरे तुम्हारे दुश्मन.. कुत्ता उसकी बात सुनकर खम्बे को देखता है.. पर खम्बा अपनी बत्ती को दिन में भी जलाकर जैसे कुत्ते के अरमानो की बत्ती बना देता है.. कुत्ता हरमाईनी की तरफ देखता है.. हरमाईनी कुत्ते की तरफ देखती है और फिर दोनों एक दुसरे की तरफ देखते है.. अरे आप उधर कहाँ देख रहे हो आप तो इधर देखो.. हाँ तो दोनों एक दुसरे को देख रहे है.. अचानक हरमाईनी कुत्ते के कान में कुछ कहती है.. और कुत्ता गुस्से से भोंकने लग जाता है.. हरमाईनी को वही छोडके भाग जाता है.. हरमाईनी उसे आँखों से ओझल हुए देखती जाती है... कुता दोबारा हरमाईनी के पास नहीं आता है..

और कई सालो बाद...

हरमाईनी कई बार दूसरी कोलोनी के किसी कुत्ते के साथ देखी गयी थी कालांतर में उसके आठ दस बच्चे भी हुए.. और मिसेज गुप्ता के भी पर वो दूसरी कोलोनी में नहीं गयी.. इसी कोलोनी में रहने वाले उनके पति से उन्हें एक प्यारी सी लड़की मिली... जी हाँ लड़की का नाम भी हरमाईनी रखा है.. मिसेज गुप्ता दोनों में कोई भेदभाव नहीं करती.. चप्पल वाले पडोसी की चप्पल एक बार एक कुत्ता मुंह में दबाकर नाले में फेंक आया था तभी से उन्होंने चप्पल फेंकनी बंद कर दी है.. पर इस बात से बेखबर की खम्बे में कभी किसी एक दिन बारिश की वजह से करंट था और कुत्ते के खम्बे के पास धार लगाने की कोशिश में उसे करंट लग गया था... वो कुत्ता अब भी कभी कभी आकर खम्बे के सामने भौंकके चला जाता है.. खम्बे में अब हाई मास्क लाईट लग चुकी है.. वो और ज्यादा रौशनी दे रहा है...कुत्ते के भौंकने का शायद ही खम्बे पर कोई असर हो...मोहल्ले में पुराना जो था वो सब कुछ ख़त्म हो चुका है बस बाकी है तो 'कुत्ते का इंतकाम'.......... जो ना जाने कब पूरा होगा..???

Tuesday, July 13, 2010

अ गर्ल एट क्वींस रोड़...

"अबे तुझे क्या पता... बाईक के पीछे लड़की बिठायी क्या तुने कभी,...? बार बार ब्रेक लगाने में जो मज़ा आता है वो तू क्या समझेगा प्यारे.. " आईने के सामने कंघी करते हुए वो बोला..

"तू तो साले कमीना का कमीना ही रहेगा.." उसका दोस्त हँसते हुए बोला.. "पर ये लडकिया रोज़ रोज़ कैसे मिल जाती है तुझे.. ?"

"अरे प्यारे ढूँढने से तो खुदा भी मिल जाता है.. वो क्वींस रोड पे फैक्ट्री है ना कपड़ो की.. वहां काम करने वाली लडकिया अक्सर रात को लिफ्ट ले ही लेती है.. बस अपना काम बन जाता है.. चल मैं निकलता हु ऑफिस के लिए आज की स्टोरी रात को आकर बताऊंगा.. "

"बाय!"
"बाय!"
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कहानी का मुख्य पात्र आज ऑफिस में देर तक रुका था.. घडी साढे दस बजा चुकी थी और वो सोच रहा था कि कही आज सारी लडकिया निकल नहीं जाए.. इतने में बॉस ने आकर उससे जाने के लिए कहा.. वो फ़ौरन हेलमेट उठाया और तेज़ कदमो से सीढिया उतर कर पार्किंग की ओर चला गया.. उसे जल्दी थी.. वैसे तो उसके ऑफिस से क्वींस रोड की दूरी करीब पांच दस मिनट थी पर वो और जल्दी जाना चाहता था.. फैक्ट्री के सामने वाले बस स्टैंड को खाली देखकर वो मायूस हो चुका था.. उसने रुक कर चारो तरफ नज़र दौडाई पर कोई लड़की नज़र नहीं आयी.. वो किक मारकर आगे बढ़ने लगा.. इतने में उसकी नज़र रोड लाईट के सहारे खडी लड़की पर पड़ी.. उसकी आँखों में एक चमक आ गयी.. वो बिना समय गवाए उस लड़की तक पहुंचा..

सफ़ेद सलवार कमीज और लाल दुपट्टा पहने खडी वो लड़की देखने में बहुत सुन्दर थी.. आँखों में गहरा काजल और माथे पर बड़ी लाल बिंदी.. कानो में बड़ी बड़ी बालिया और दोनों हाथो में एक दर्जन से भी ज्यादा चुडिया.. ऐसी लड़की उसने यहाँ पहले कभी नहीं देखी थी.. वो उसे देखता ही रह गया.. "हेल्लो" वो लड़की बोली.. सकपकाकर उसने बोला "जी..? इतनी रात गए यहाँ क्या कर रही है आप..?"

"मुझे लिंक रोड जाना है.. बहुत देर से वेट कर रही हूँ.. ना कोई बस मिल रही है ना ऑटो.. फिर रात भी काफी हो रही है.. "

"नो प्रोब्लम बैठो मैं छोड़ देता हूँ.. "
"लेकिन रात काफी हो गयी है और... "
"अरे डरिये मत मैं कुछ नहीं करूँगा.. वैसे भी मुझे लिंक रोड ही जाना है वहां से अपनी सिस्टर को लेकर घर जाऊँगा मैं.. "
"नहीं वो बात नहीं है.. पर "
"अरे मैडम आप यकीन करिए.. कुछ नहीं होगा वैसे भी यहाँ अकेले खड़े रहने में खतरा ज्यादा है.. और इस इलाके में सिर्फ फेक्ट्रिया है ज्यादा ट्रैफिक रहता नहीं है पता नहीं आपको ऑटो मिले ना मिले.. "

लड़की ने थोडा सोचकर हाँ कर दी.. वो मन ही मन खुश हो गया.. और जानबूझकर वो थोडा पीछे बैठ गया सीट पर जगह काफी कम बची थी.. लड़की सहमी हुई सी बैठ गयी.. अब वो मन ही मन खुश था.. गाडी बिलकुल धीरे धीरे चला रहा था.. साथ साथ लडकियों के रात को अकेले ना घूमने पर लेक्चर भी सुना रहा था.. वो लड़की चुपचाप बैठी सुन रही थी.. इस रस्ते को वो अच्छी तरह जानता था.. उसे पता था आगे स्पीड ब्रेकर आने वाला है.. उसने बाईक की रफ़्तार थोडी बढा दी... और स्पीड ब्रेकर के बिलकुल नजदीक जाकर जोर से ब्रेक लगाया.. अचानक झटका लगा.. लड़की का हाथ उसके कंधे पर आ गया.. वो रोमांचित हो उठा..

"आप ठीक तो है ना..! वो दरअसल स्पीड ब्रेकर नज़र नहीं आया था.. " वो बोला
"कोई बात नहीं.." लड़की धीरे से बोली..

उसने फिर से बाईक की रफ़्तार बढा ली थी.. और अपनी बाईक का रियर मिरर इस तरह से सेट करने लगा कि जिसमे पीछे बैठी लड़की का चेहरा साफ़ नज़र आये.. उसने देखा लड़की के चेहरे पर मुस्कान थी.. वो खुश हो गया. एक गढ्ढे के पास फिर से उसने ब्रेक लगाया.. और मिरर में देखा लड़की मुस्कुरा रही थी.. अब तो उसके मन की मुराद पुरी हो गयी थी.. वो पुरे रास्ते ब्रेक लगाता और मिरर में लड़की को मुस्कुराते हुए देखता.. मिरर में मुस्कुराता हुआ चेहरा देखकर वो खुश होता जा रहा था.. इतने में लड़की बोली..

"बस यही रोंक दीजिये.. "
"लेकिन लिंक रोड तो वो सामने की तरफ है.. "
"नहीं बस मुझे यही तक आना था वो पिछली गली में मेरा घर है मैं चली जाउंगी "
"तो मैं आपको घर तक छोड़ देता हूँ.. "
"नहीं नहीं उसकी कोई जरुरत नहीं.. आपने मेरी इतनी हेल्प की इसके लिए थैंक्स "
"अरे इसमें थैंक्स की क्या बात है... "
"अच्छा तो मैं चलती हु.. " और वो पलटकर जाने लगी..

"ज़रा सुनिए.. " वो बोला....... "आप फिर कब मिलेगी वहा..  "
"मिल जाउंगी.. चिंता मत करिए इतनी आसानी से आपका पीछा नहीं छोडूंगी.." वो हँसते हुए बोली..
"हाहाहा.. ज़रूर..!" वो भी हंस दिया और बाईक को स्टार्ट करके वापस जाने लगा..

रास्ते भर वो बार बार उस लड़की को याद कर रहा था.. कैसे ब्रेक लगते ही वो लड़की उससे चिपक सी जाती थी.. और जब उसने कंधे पर हाथ रखा था एक सरसराहट फ़ैल गयी थी जिस्म में.. इतनी खूबसूरत लड़की उसे पहले कभी नहीं मिली थी.. यही सोचते सोचते उसकी नज़र रियर मिरर पर पड़ी.. उसने देखा वही लड़की उसमे मुस्कुरा रही थी.. उसने अचानक ब्रेक लगाये.. पीछे देखा तो कोई नहीं था.. उसने मिरर में देखा तो वो लड़की नहीं थी.. वो मुस्कुराया.. ज़रूर कोई वहम होगा..

उसने गाडी स्टार्ट की थोडा आगे ही बढा था कि उसे फिर से आईने में वो नज़र आयी.. ठीक वैसे ही मुस्कुराते हुए.. उसने घबराकर गाडी रोकी और गौर से देखा तो वो लड़की नहीं थी.. उसने अपनी पीछे की सीट पर हाथ फिराकर देखा कुछ भी नहीं था.. सुनसान सड़क पर वो अकेला खड़ा था.. अब वो घबरा रहा था.. उसने बाईक स्टार्ट की और चलने लगा.. थोडी दूरी पर जाके उसने जैसे ही मिरर में देखा.. वो लड़की मुस्कुरा रही थी.. 

अब तो वो बुरी तरह से डर गया था.. वो समझ नहीं पाया ये क्या हो रहा है.. उसने बाईक को वापस उलटी तरफ घुमाया.. और तेज़ी से उसी तरफ चल पड़ा.. जहाँ से वो आया था.. पुरे रास्ते भर उसे मिरर में वो लड़की मुस्कुराते हुए नज़र आ रही थी.. उसकी आँखों से लगातार आंसु बह रहे थे.. वो घबरा चुका था... थोडी ही देर में वो फिर से क्वींस रोड पर आ चुका था.. उसकी साँसे बढ़ी हुई थी.. उसने वहा आकर जैसे ही गाडी रोकी उसका कलेजा काँप उठा.. उसका शरीर सुन्न हो गया..पूरा बदन पसीने में भीग उठा.. उसकी आँखों से खून बहने लगा.. और वो भक्क से जमीन पर गिर पड़ा... जिस लड़की को वो लिंक रोड पर छोड़ आया था वो अभी सड़क के दूसरी तरफ उसी रोड लाईट के सहारे खडी थी जहाँ से उसने लिफ्ट दी थी...

Monday, June 7, 2010

बादल ऑन ड्यूटी हो.. और चाय की तलब..!

बादल ऑन ड्यूटी हो.. और चाय की तलब..!  ऊपरवाले क्या खालिस ज़िंदगी दी है तूने....!  इस से बढ़िया कॉम्बिनेशन तो हो ही नही सकता..  झमाझम बारिश में नहाना किसी एक्स्ट्रा केरिकुलर एक्टिविटी की तरह हर ऑफीस मे होना चाहिए.. वरना सीट पे बैठे बैठे ठंडे मौसम में जो गर्म आहें निकलती है की  सी भी तड़प कर चार गाली दे मारता है..

वैसे इधर मौसम दो चार दिनों से अच्छा है.. ठंडी हवा चल रही है.. देखते है इंदर बाबू कब तक मेहरबान रहते है. प्लास्टिक की थैलिया जेब में रख कर घूम लो बॉ... मोबाइल और पर्स गीले नही हो जाए.. एंड डोंट माइंड थैलिया प्लीज़..! प्लास्टिक कैरी बैग्स भी बोल सकता था..  पर उस से मेरी भारतीयता को ठेस पहुचती और मैं तो ठहरा पक्का देसी.. वैसे बारिश की बात करे तो किसी ने ठीक ही कहा है.. हर बारिश की अपनी अलग कहानी है..


ड्रीम : ऑफिस की खिड़की से बाहर हवा में छलांग लगाके भीगना.. और कंप्यूटर को नाव की तरह पानी में बहा देना..
फैक्ट : ऑफिस की खिड़की से बाहर गिरती हुई बूंदों को देखना.. और फिर दिल पर चट्टानें रखकर कंप्यूटर की स्क्रीन में नज़रे गड़ा लेना..
 












ये गिरी एक और बूँद खिड़की पे..
रात
नौ से बारह राजनीति देखने का प्रोग्राम है ..अभी के लिए टाटा रहेगा..