Thursday, March 31, 2011

सुगर क्यूब पिक्चर्स प्रजेंट्स "सिक्का"



उसे शौक था मरने का और मरके अमर होने का.. लोगो की यादो में.. तख्तियो पे नाम चाहता था.. स्कूलों अस्पतालों पर अपना नाम चाहता था.. यू चाहता तो वो ये भी था कि गली सड़क नहरों बांधो के नाम भी उसके नाम पर रख दिए जाए.. उसके मन में कीड़ा था अमर होने का होते जाने का.. लेकिन इसके लिए उसे मरना ज़रूरी था.. और यही एक काम था जो वो ठीक से नहीं कर पा रहा था.. उसने कई बार शाम ढले शहर की सबसे गहरी झील में डूब जाने की कोशिश की पर बात बनी नहीं.. कुछ देर तक तो वो पानी में पांव डाले बैठा रहता पर फिर थोडी देर बाद उसमे तैरती मछलियों को दाना डालकर लौट आता..

इस बार उसने पटरियों पर लेटकर ट्रेन से कट जाने का मन बनाया.. वो बहुत देर तक पटरी पे बने पुल के बीचो बीच बैठा रेलगाड़ियो को आते जाते हुए देखता रहा.. ट्रेन सामने से सीटी बजाती हुई आती.. इंजन से निकलता हुआ धुँआ उसकी साँसों में भी उतरता.. जब रेल ठीक पुल के नीचे से गुज़रती तो उसके दिल के साथ पुल भी थरथराता.. थोडी देर बाद वो हिम्मत करके सीढियों से नीचे उतर गया.. पास ही पड़ी लकड़ी उसने उठा ली.. और लकड़ी के एक सिरे को जमीन से रगड़ता हुआ वो पटरी के बराबर चलते हुए मरने के लिए सही जगह की तलाश में चलता रहा.. सूरज इस वक़्त ठीक सर के ऊपर था.. वो पटरी पर एक कोने पर बैठ गया.. सामने वाले ट्रैक पर कुछ कचरा बीनने वाले बच्चे ट्रेन के डिब्बो से फेंके गए चिप्स, बिस्किट के खाली पैकेट उठा रहे थे.. उनमे से किसी में एक चिप्स या बिस्कुट का चुरा मिल जाता तो चहक कर खा लेते.. वो बैठा यही सब देख रहा था कि उसके कानो में इंजन की आवाज़ गूंजी.. वो अपनी जगह से खड़ा हुआ.. वो चाहता था कि बच्चो को वहा से भगाकर ट्रेन के सामने खड़ा हो जाए.. पर इस से पहले की वो उन्हें भगाता उनमे से एक बच्चे ने पटरी पर सिक्का रख दिया और दुसरे से बोला कि ट्रेन गुजरने के बाद ये सिक्का सोने का बन जाएगा.. वो जानता था कि ऐसा कुछ होने नहीं वाला.. पर पटरी को घेरे उन चार चेहरों पर ठहरी आँखों में चमक देख कर वो रुक सा गया.. उसके कदम आगे नहीं बढे..

पर ट्रेन धीरे धीरे इसी तरफ बढ़ रही थी.. सीटी की आवाज़ कानो के और करीब आ रही थी.. गड गड की आवाज़ दिल दहलाने वाली मालूम पड़ती थी.. लड़के सब अपनी जगह ठहरे हुए थे.. सबकी निगाह इंजन पर टिकी हुई थी.. उसकी भी.. इंजन तेज़ी से उनकी तरफ आ रहा था.. लड़के एक कदम आगे सरक चुके थे और वो भी.. सिक्के के सोने में बदल जाने वाली असंभव सी बात के लिए वो आँखे गढ़ाए ये भी भूल गया कि वो यहाँ मरने के लिए आया था.. और इस ट्रेन के चले जाने के बाद उसे फिर साढे तीन घंटे इंतज़ार करना पड़ता.. लेकिन बिना ये जाने कि सिक्का सोना बना या नहीं वो कैसे मर सकता था? उसे लगा साढे तीन घंटे और इंतज़ार किया जा सकता.. फिर मरना तो है ही अभी मरो या साढे तीन घंटे बाद क्या फर्क पड़ता है..? इंजन मालगाड़ी का था.. जो अब उनके बिलकुल करीब आ चुका था.. पटरी के आस पास भीड़ देखकर इंजन ड्राईवर ने होर्न बजाया... पर लड़के हटे नहीं.. इंजन सिक्के के बिलकुल करीब आ गया.. कानफोडू आवाज़ के साथ रेल सिक्के के ऊपर से गुज़रने लगी.. सबकी निगाह उसी सिक्के पर थी.. जैसे ही हर डिब्बे का चक्का उस सिक्के पर से निकलता ट्रेन थोडी झुकी सी लगती.. बिजली की तेज़ी के साथ ट्रेन निकल गयी.. मिट्टी के गुबार के बीच चारो लड़के सिक्के की तरफ लपके और वो भी.. सिक्का सोना नहीं बन पाया.. अलबत्ता जो था उस से भी गया.. सिक्का चपटा हो गया जो अब किसी काम का नहीं रहा.. लड़के की आँख में आंसु आ गए.. बाकी तीनो लड़के हंसने लगे.. और अपना अपना थैला उठाके चल पड़े.. लड़का ठगा सा खड़ा कभी सिक्के को देखता तो कभी धुल उड़ाते जाती हुई ट्रेन को..

लड़के की बेवकूफी के चक्कर में उसने मरने का एक और मौका खो दिया.. उसे इस लफड़े में फसना ही नहीं था.. क्यों रुका वो यहाँ जबकि जानता था कि सिक्के का कुछ नहीं होने वाला.. पर लड़के की आँखों का विश्वास.. हाँ उसकी आँखों की चमक ही तो थी.. जिसने मजबूर कर दिया था उसे रुकने के लिए.. पर अब? साढे तीन घंटे बाद अगली ट्रेन आने तक वो क्या करेगा.. यही सोचते हुए.. उसने लड़के की तरफ नज़र घुमाई.. लड़का सिक्का वही पटरी पर फेंक कर चल पड़ा.. लड़का जा चुका था मगर सिक्का अभी भी पटरी पर पड़ा था..

Tuesday, February 15, 2011

प्यार को प्यार ही रहने दो.. कोई नाम ना दो...


उसका ये कहना कि गुलज़ार ने जो लिखा है उसके बाद प्यार का डेफिनेशन ही ख़त्म हो जाता है.. मुझे ठीक तभी याद आता है खामोशी का वो गीत..
हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू.. 

वो कहती है.. तुम खुद ही देखो ना.. क्या खूब कहा है.. सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो.. प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो.. सच है इस के बाद प्यार को कोई और क्या कहेगा.. इश्क में डूबा हुआ इंसान माशूक से ज्यादा गानों से प्यार करता है.. गोया संगीत के बिना मोहब्बत अधूरी है.. 

वो कहती है और नहीं तो क्या वैसे भी आधे शायर आशिक ही होते है.. 
और बाकी के? ये मैं पूछता हूँ.. 
माशूक...! ! 
 
वो हँसते हुए उठती है और अपनी लम्बी सी चोटी को इस काँधे से उठाकर उस काँधे पर रखती है. मेरी आँखे उसके बालो में बंधे गुलाबी रिबिन पर रुक जाती है.. ऐसे ही गुलाबी गाल हो जाते है उसके.. जब वो बहुत रोती है या फिर खिलखिलाके हँस देती है.. अब चलते हुए वो खिड़की के पास पहुँच जाती है.. और आसमान की तरफ देखती है.. मैं अपने चश्मे को टेबल पर रखके उसकी तरफ बढ़ता हूँ.... उसके चेहरे पर उगते चाँद और ढलते सूरज की रौशनी एक एबस्ट्रेक्ट सी पेंटिंग बनाती है.. मैं उसके करीब जाकर खड़ा हो जाता हूँ.. वो अभी भी चाँद को देख रही है.. मैं उसकी आँखे अपने हाथो से बंद करते हुए कहता हूँ.. तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं.. 

रात को रोंक लो... वो बंद आँखे किये कहती है..
मैं हाथ उसकी आँखों से हटाकर उसे शहर की रौशनी दिखाता हूँ.. वो देख रही हो.. हरे गुम्बद वाली मस्जिद.. वहां से आती अजानो में मुझे तुम्हारी हंसी घुली हुई सी लगती है.. 
हटो.. बहुत बड़े फंडेबाज हो तुम... वो शर्माते हुए कहती है.. कोई भी मौका नहीं छोड़ते.. 
तुम्हे छोड दे जो उसे आगरे शिफ्ट करवा देना चाहिए.. 
आगरे का पागलखाना तो खुद रांची शिफ्ट हो गया है.. 
वही रखना था.. मैं उसकी तरफ देखकर कहता हूँ.. 
वो मेरी तरफ देखती है.. उसकी निगाहों में सवाल है.. 
अरे अपने महबूब की याद में आधे लोग ताज महल जाते है 
और बाकी के..? वो पूछती है.. 
पागलखाने... !! 
 
मैं बोलके फिर से कमरे की तरफ चलता हूँ.. वो मेरे पीछे पीछे आती है.. 
 
मैं ट्रांजिस्टर उठाकर ट्यून करता हूँ.. ये वही ट्रांजिस्टर है जिस पर पिताजी गाने सुनते थे.. प्यार हुआ.. इकरार हुआ है.. प्यार से फिर क्यू डरता है दिल.. और रसोई में अपने पल्लू को कमर में फंसाए मेरी माँ गाती कि डरता है दिल रस्ता मुश्किल मालूम नहीं है कहाँ मंजिल...

 
क्या सोचने लगे मिस्टर..? वो मुझे फिर से उसी कमरे में खींच लाती है.. 
रेडियो में गाना बजने लगा है.. जीने के लिए सोचा ही नहीं दर्द सँभालने होंगे.. मुस्कुराओ तो मुस्कुराने के क़र्ज़ उतारने होंगे.. मुस्कुराओ कभी तो लगता है.. जैसे होंठो पे क़र्ज़ रखा है.. 

वो भी रेडियो की आवाज़ के साथ गुनगुनाने लगती है.. तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी.. हैरान हूँ मैं.. मैं रेडियो बंद कर देता हूँ.. और उसकी आवाज़ में डूब जाता हूँ.. 
 
मुझे ऐसा लगता है जैसे कोई कैमरा हम दोनों के क्लोज अप शोट ले रहा है.. बहुत धीरे धीरे हमारी तरफ ज़ूम होता हुआ..वो अपने दुपट्टे के छोर को अपनी नर्म उंगलियों से पकड़ लेती है.. वो ऐसा क्यू करती है ये जाने बिना मैं उसकी इस अदा को पसंद करता हूँ.. 

वो मेरी तरफ देखती है.. उसकी आँखों में आसमान के सितारे उतर आये है.. मैं दिवार पर लगी उस तस्वीर को देखता हूँ.. जिसमे रेल के दरवाजे पर एक लड़की खडी है.. और लड़का हाथ में पीले फूल लिए प्लेटफोर्म पर उसकी तरफ भागता है.. इश्क आसानी से हासिल हो जाये तो इश्क नहीं रहता.. ये सिर्फ मेरे मन का ख्याल है.. 

वो मेरी नज़र पढ़ लेती है.. और तस्वीर की तरफ बढती है.. उसके पायल की आवाज़ फर्श पर बिखरती जा रही है.. मैं एक एक आवाज़ को उठाकर अपने कानो में पहन रहा हूँ.. वो मुड़कर मुझे देखती है..
क्या देख रहे हो.. ? 
देख नहीं रहा हूँ सुन रहा हूँ... 
क्या सुन रहे हो?
म्यूजिक... 
यहाँ कहाँ म्यूजिक है ?
ये जो खामोशी पसरी हुई है कमरे में.. 
ख़ामोशी संगीत है?
यस...! ये भी एक म्यूजिक है.. गौर से सुनो इसे.. 
वो मेरे करीब आकर मेरी कुर्सी के पास बैठ जाती है.. मेरे घुटनों पर अपना सर टिका कर मेरे साथ साथ खामोशी को सुनती है... मेरी उंगलिया खुद ब खुद उसके बालो में उलझ जाती है.. मैं उसके बाल सहला रहा हूँ.. वो मेरे दायें पैर के अंगूठे से खेल रही है...उसकी मासूमियत मैं अपने अंगूठे पर महसूस करता हूँ..

तुम बालो को खुला रखा करो.. खुले बालो में तुम अच्छी लगती हो.. मैं पता नहीं क्यों उसे ऐसा कहता हूँ..
पर तुम कंघी मत किया करो.. बिखरे हुए बाल तुम पर अच्छे लगते है.. मैं तुम्हे हमेशा ऐसे ही देखना चाहती हूँ.. वो मेरे बाल बिखेर देती है.. मेरी नज़र उसकी कान की बालियों पर है..
ये वही है ना जो मैंने तुम्हे तुम्हारे इक्किस्वे जन्मदिन पर दी थी.. मैं छूकर देखता हूँ..
आउच. .अरे धीरे.. उसके कानो में दर्द होता है..
क्या कर रहे हो? वो पूछती है..
इस शाम को कैद करने की कोशिश... मैं अलमारी से कैमरा निकालता हूँ और मैक्रो मोड़ में उसके कानो की बालियों की फोटो लेता हूँ.. उसकी गर्दन पर हल्के हल्के बालो के बीच झूलती बालिया.. मैं इनमे अक्स देखता हूँ.. अपनी ज़िन्दगी का.. इस छोटे से लैंस में मुकम्मल नज़र आती है मुझे..

वो करीब आकर कैमरे के लैंस पर हाथ रख देती है.. मैं उसके माथे पर चूमता हूँ.. वो खुद ही खुद में सिमट जाती है.. मैं एक खामोश अंगड़ाई लेते हुए उठकर कॉफ़ी का प्याला उठाता हूँ..  उसकी नज़रे मेरी तरफ है.. मैं मुमताज़ मिर्ज़ा की ग़ज़ल का शेर पढता हूँ..

वो एहतराम ए गम था कि लब तक ना हिल सके.. 
नज़रे उठी तो सर ए हद ए गुफ्तार तक गयी.. 

ठीक उसी वक़्त सड़क  पर लगे लैम्प पोस्ट की रौशनी खिड़की से अन्दर आती है..  और वो कहती है

तन्हाईयो ने फासले सारे मिटा दिए.. 
परछाईयां मेरी.. तेरी दिवार तक गयी.. 

मेरी नज़र खिड़की की रौशनी से फर्श पर बनी उसकी परछाई पर जाती है.. वो ठीक मुझ तक पहुंची है.. मैं एक बार फिर उस पर मर मिटा हूँ.. वो मुस्कुराये जा रही है.. मैं दौड़कर उसे गोद में उठा लेता हूँ.. और पूछता हूँ.. 
विल यू बी माय वेलेंटाईन ?? 
वो कहती है ये तो मैं पहले से ही हूँ.. कुछ और बोलो.. 

मैं उसे उठाकर फ्रिज पर बिठा देता हूँ..  
आलवेज बी माय वेलेंटाईन.. मैं उसके मुलायम हाथो को अपने हाथ में लेकर कहता हूँ.. 
 
अब उसकी आँख में आंसु आ गए है.. और गाल गुलाबी हो गए है.. उसके गालो का गुलाबी रंग पुरे कमरे में बिखर गया है.. खामोशी अभी भी ठहरी हुई है कमरे में.. एक संगीत की तरह हमारी आवाज़े मिल रही है फजाओ से.. हवा ने खिड़की पर पर्दा उड़ा दिया है.. मैं उस से कहता हूँ.. कभी गुलज़ार साहब मिले तो उनसे कहूँगा कि हमने भी देखी है उन आँखों की महकती खुशबू..

वो अपने ऊँगली मेरे होंठो पर रखती है.. और मेरे कान में हौले से आकर कहती है.. प्यार को प्यार ही रहने दो.. कोई नाम ना दो...

Sunday, January 30, 2011

ज़िन्दगी में और भी रंग है खुदको रंगने के लिए..

 बीन बैग में अगर जुबान होती तो वो ज़रूर कहता कि इस बैडोल हो चुके शरीर को अब उठा क्यों नहीं लेती.. लेकिन ये भी खामोश है.. शाम उर्दू की एक किताब पढ़ते हुए मैं इस पर आ बैठी थी.. अभी रात के दो बजे जब दोबारा चाय की तलब हुई तो ख्याल आया कि रात का खाना पका हुआ ही रह गया.. वैसे भी जली हुई दाल और अधपके चावल खाने में कुछ भी अच्छा नहीं था.. बिना मन से बने खाने में जायका नहीं होता.. चाय बनाकर पांचवे और लास्ट कप में चाय डालकर फिर से बीन बैग पर जा बैठती हूँ.. मेरे पास पांच कप है.. और जब तक पांचो में चाय नहीं पी ली जाए वो धुलते नहीं.. अब किताब पढने का मन नहीं है.. दरअसल मन शाम से ही कुछ ठीक नहीं ऊपर से माँ का शादी के लिए बार बार फोन करना.. सिर्फ इसलिए कि मेरी उम्र बीत रही है, किसी से भी शादी कर लेना कहाँ तक जायज है.. मैं खुद को समझाती हूँ..

मोबाईल उठाकर कोंटेक्ट लिस्ट को छान मारा एक भी नंबर ऐसा नहीं जिस पर कॉल किया जा सके.. कुंवारे लडको से बात करने पर सिवाय फ्लर्ट के और कुछ नहीं मिलता.. ऐसा नहीं है कि मैं समझती नहीं पर अच्छा लगता है.. मेल फ्रेंड्स ज्यादा हो गए है अब मेरे.. जो लडकिया थी उन सबकी तो शादिया हो गयी.. एक दो बार फोन लगाया भी तो पीछे से उनके हसबैंड का बार बार फोन रखने की आवाज़ सुनकर दोबारा मन ही नहीं किया कॉल करने का.. लोग घर पर बुलाने से भी डरते है.. मेरी एक सहेली की सास को लगता है कि मेरा कैरेक्टर ठीक नहीं है इसलिए मेरी शादी नहीं हुई.. बुल शीट.! 

पर कभी कभी जब मेरी कॉलेज की वो सहेलिया घर आती है जिनकी शादी हो चुकी है.. तो ये सोचकर बड़ा अच्छा लगता है कि पहले जब वो आती थी तो अपने पति अपने ससुराल की बाते करती थी.. पर अब यहाँ आकर वो कहती है काश ऐसी लाईफ हम भी जी सकती.. मुझे क्यों ऐसा लगता है जैसे कुछ भी हमेशा नहीं रहने वाला.. ना शादी ना अकेलापन.. रहेंगे तो बस हम..

इस अकेलेपन से प्यार हो जाने के बाद भी कई बार किसी की जरुरत सी महसूस होती है.. लैम्प पोस्ट की पीली रौशनी खिड़की से कमरे में बिखर रही है.. चादर में सिलवटे कुछ बढ़ गयी है...दिवार पर मार्लिन मुनरो अपनी स्कर्ट उठाये खडी है.. उसके ठीक सामने बिना शर्ट के जॉन अब्राहम..  मैं अपनी आँखे बंद कर लेती हूँ.... मेरा हाथ कमर के नीचे जाता है.. बस कुछ और सालो की बात है.. उसके बाद इसकी भी जरुरत नहीं होगी.. आखिर ज़िन्दगी में और भी रंग है खुदको रंगने के लिए.. 

Monday, December 6, 2010

पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..












पतले चक्कों वाली सायकिल
पर पैंडल मारते मारते
शहर के दुसरे कोने
में आ गए..
अब बस्ते रख दिए है
पेड़ से सटाकर..
और मोजो को
जूतों में खिसका दिया है..
कोहनी का तकिया बनाकर.
लेट गए है मिट्टी में
और देखते हुए
आसमान में
मुस्कुराकर कहते है.. कि साला
पी टी आई जो पकड़
लेता तो धुनाई बहुत होती..

कुछ देर सुस्ताकर
खोलते है टिफिन
मेथी के परांठो
की खुशबू लुटा देते
है आसमानों में..
अब एक टांग पे टांग
टिकाये गिनते है
अंटी के सिक्को को..
और खरीद के पतंग
चाँद तारो वाली
बस्ते से चरखी..
निकाल लेते है..

लम्बी तान पतंग को देके..
बस ऊपर ही तकते है..
कट जायेगी जब
दस पांच पतंगे..
झाड के पैंट को अपनी..
बस्ते में चरखी धर लेंगे..
सायकिल पे रख के बस्ता अपना
फिर से घर को चल लेंगे..

जो कहते है
ऐसा हाल रहा तो
आगे जाकर क्या करोगे?
उनकी हमको फ़िक्र नहीं
आफ्टर आल अभी
पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..

Thursday, September 16, 2010

सोशल मिडिया मैरिज..


सीन 1 

- सुनो जी रश्मि अब बड़ी हो गयी है.. कल रात भर लैपटॉप पर बैठे बैठे ना जाने किससे चैटिंग कर रही थी.. मुझे लगता है अब इसकी शादी करवा देनी चाहिए..  
- ठीक है मैं आज ही शादी.कॉम पर उसकी प्रोफाईल बना देता हूँ..  
- अरे उसकी क्या जरुरत है..? वो अपनी फेसबुक वाली मिसेज शर्मा है ना.. उनके कोई ऑरकुट फ्रेंड का लड़का है.. फ्लिकर पर फोटो अल्बम देखा उसका.. देखने में तो बड़ा सुन्दर है.. ट्विटर पर एक हज़ार से ज्यादा फोलोवर है उसके.. और तो और खुद के डोमेन पर अपना ब्लॉग भी बना रखा है.. आप कहे तो बात करू उनसे.
- हूँ..! ठीक है पर पहले रश्मि से भी पूछ लेना.. 

सीन 2

- रश्मि बेटा क्या कर रही हो.. ?
- कुछ नहीं मोम बस अपने स्टेटस मेसेज्स के रिप्लाई दे रही थी.. 
- बेटा हमने तेरे लिए एक लड़का पसंद किया है..  बहुत अच्छा लड़का है.. उनकी मम्मी से मेरी चैट भी हुई थी.. मैंने तुम्हारा ऑरकुट प्रोफाईल का लिंक भी दे दिया उनको.. 
 - ओ मोम इतनी जल्दी क्या है. .? और वैसे भी बिना किसी को जाने पहचाने कैसे शादी कर लु..?
 - अरे तो मैंने कब मना किया है..  तुझे उसकी प्रोफाईल का लिंक मेल कर देती हूँ.. देख ले कैसा दिखता है.. कैसे दोस्त है उसके.. अच्छी कंपनी में काम करता है.. तुझे लिंक्ड इन का भी लिंक दे दूंगी.. तु एक बार देख तो सही.. 
 - ठीक है मोम.. 
सीन 3 

rash003 : hi
jatin.kumar1984 : hi 
do i know u?
rash003 : meri mom ne aapka
id diya tha 
jatin.kumar1984 : oh ha mummy ne 
bataya tha.. ms. sharma ki follower 
hai na aapki mom..
rash003 : ya 
wo chahte hai hamari shadi ho jaye
jatin.kumar1984 : not bad
kya karti ho tum?
ye mera linked in ka id hai..
it company mein hu 
jatin.kumar1984 : nice job! main bhi it 
company mein hu ye mera profile hai
rash003 : ha main dekh chuki hu..
profile is good.. but main chahti hu ki
hum face 2 face bhi mile ek baar
u know itna bada decision hai  
jatin.kumar1984 : i understand.. in fact
main bhi chahta tha face 2 face baat karna
rash003 : good to u have web cam?
jatin.kumar1984 : ya 1 sec.
rash003 : u have nice hair cut
jatin.kumar1984 : thanks! tumhara chashma 
to kool hai.. 

सीन 4

- ये देखो.. रश्मि ने ब्लशिंग वाला स्माईली भेजा है लगता है शरमा गयी अपनी शादी की बात सुनके.. 
- वो सब तो ठीक है लेकिन उसे लड़का पसंद है या नहीं ?
- हाँ है ना आप खुद ही देख लो फेसबुक पे खुद लाईक किया है उसने 
- हूँ.. ठीक है तो फिर गूगल में कोई अच्छा सा मुहूर्त सर्च करके शादी करवा देते है दोनों की.. 


- परसों शाम का मुहूर्त निकला है.. 
- अरे लेकिन ये तो बहुत जल्दी होगा.. नेट की स्पीड भी स्लो है सबको इनविटेशन कैसे भेजेंगे ?
- अरे इसमें क्या है कार्ड अपलोड करके सबको लिंक शेयर कर देंगे. इसमें कितना तो टाईम लगता है.. सब हो जायेगा  
- ठीक है फिर..शादी के मन्त्र की एम् पी थ्री डाउनलोड करलो नेट से.. फोटो अल्बम के लिए पिकासा ठीक रहेगा और वीडियो के लिए यू ट्यूब पर अकाउंट बना लेता हु.. 
- आज मेरे लिए बहुत ख़ुशी का दिन है मैं अभी अपना स्टेटस अपडेट करती हु..  


सीन 5
जतिन और रश्मि ने अपना स्टेटस चेंज किया  

jatin is married now
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rashmi is married now
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सीन 6

- क्या कर रही हो रश्मि डार्लिंग?
- अरे स्पीड बहुत स्लो है जतिन सबने बधाईया ई ग्रीटिंग्स से भेजी है ना फ्लैश में है देर लग रही है खुलने में.. 
- कम ऑन रश्मि तुम्हारे पास मेरे लिए तो वक़्त ही नहीं है.. मैं कबसे तुम्हे पिंग कर रहा हूँ और तुम हो कि.. पता नहीं कहा बिजी हो..
- सोरी हनी डीसी हो गया था.. प्लीज डोंट माईंड..  

सीन 7

जतिन और रश्मि को हैप्पी वेडिंग एल्बम में टैग किया गया 
3 व्यक्तियों को ये पसंद है 




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