Monday, July 13, 2009

उछालता कोई मुझे तो..



उछालता कोई मुझे तो
खिलखिला देती...
मुस्कुराता कोई तो
पलकें हिला देती..

पूछता कोई जो कुछ
जवाब आँखें हिला कर देती..
गोद मैं उठाता कोई तो
उसे गीला कर देती..


डाँटता कोई मुझे तो
झटमूट् रोती..
आती जब नींद तो
माँ की गोद में सोती..

मम्मी की पहन साड़ी
श्रृंगार मैं करती..
आ जाए ना कोई कमरे में
इस बात से डरती...

दादा को पकड़ कर
घोड़ा मैं बनाती..
ज़्यादा तो नही पर
खाना, थोड़ा मैं बनाती..

होती जब बरसात
ख़ूब मैं नहाती..
काग़ज़ की कश्तिया
पानी में बहाती..

फिर बड़ी हो जाती और
झूलती झूलो पे..
बन जाती तितली कोई और
घूमती फूलो पे...

सोमवार की पूजा के
फूल मैं चुनती..
आएगा कोई जो
उसके ख्वाब मैं बुनती..

ले जाता मुझे कोई
डोली में बिठाकर..
पलकों की छाओ में
आँखो में लिटाकार...

अपना फिर छोटा सा
परिवार मैं बनाती..
खशियो से सज़ा सा
संसार बसाती..

बाँट प्यार सभी को
सबके दर्द मैं लेती..
गर माँ तेरी कोख से
जन्म मैं लेती....

-------------------

48 comments:

  1. बहुत प्यारी कविता कुश.. काश कोई समझ ले तो १००० पर ८०० न हो...

    ReplyDelete
  2. कुछ कहा नहीं जाता !

    गला रुँध गया है ,
    आँखें भर आयीं हैं,
    कविता ने दिल तो छू लिया है,
    हड्डियाँ हमने मुश्किल बचायीं हैं !

    ReplyDelete
  3. बाँट प्यार सभी को
    सबके दर्द मैं लेती..
    गर माँ तेरी कोख से
    जन्म मैं लेती....
    कुश जी लाजवाब रचना है बस लोग उसे जन्म ही नहीं लेने देते बहुत सुन्दर रचना के लिये बधाई आशीर्वाद्

    ReplyDelete
  4. बाँट प्यार सभी को
    सबके दर्द मैं लेती..
    गर माँ तेरी कोख से
    जन्म मैं लेती...
    IN PANKTIYON PAR SAB KUCHH KURABAN HO GAYA ......WAAH ....WAAH.....WAAH....WAAH ....ATISUNDAR

    ReplyDelete
  5. बाँट प्यार सभी को
    सबके दर्द मैं लेती..
    गर माँ तेरी कोख से
    जन्म मैं लेती....
    कुश भाई, सारा दर्शन इन्ही लाइनों में आपने निरुपित कर दिया है.

    ReplyDelete
  6. दुखद, किन्तु सत्य.

    ReplyDelete
  7. सादे शब्दों से एक कटु सत्य कह दिया।
    बाँट प्यार सभी को
    सबके दर्द मैं लेती..
    गर माँ तेरी कोख से
    जन्म मैं लेती....

    अद्भुत।

    ReplyDelete
  8. तुम्हारी इन पंक्तियों ने आवेश उद्वेग क्षोभ रुदन और न जाने क्या क्या भर दिया है.........

    मैंने अपने सामने अपने आस पास कईयों को ,जो किसी भी मायने में ऐसी आर्थिक परिस्थिति के नहीं जो की अपनी संतान का भरण पोषण विवाह न कर सकें....पुत्र लालसा में भ्रूण परीक्षण कराकर कन्या भ्रूण हत्या करवाते देखा है...एक नहीं कई कई बार......

    और यह पति या परिवार के दवाब में नहीं अधिकतर स्त्रियाँ स्वेच्छा से करती हैं....कुछेक के तो मैंने पैर तक पकडे....उन्हें पूर्ण आश्वासन दिया की वे उस बालिका को मुझे दे दें,मैं उन्हें अपनी संतान बनूंगी....पर किसी तरह उनके कठोर ह्रदय को न पिघला सकी..........

    क्या कहूँ.........आने वाले समय में पूरी मानवता इसका मूल्य चुकायेगी,देखना.....

    ReplyDelete
  9. सुन्दर कविता है. और क्या कहूँ?

    ReplyDelete
  10. ले जाता मुझे कोई
    डोली में बिठाकर..
    पलकों की छाओ में
    आँखो में लिटाकार...

    bahut achchha laga !!

    ReplyDelete
  11. ये पीड़ा एक अजन्‍मी बालि‍का का है, ये स्‍वप्‍न एक अजन्‍मी बालि‍का का है। मार्मि‍क अभि‍व्‍यक्‍ति।‍

    ReplyDelete
  12. हृदयस्पर्शी..

    ReplyDelete
  13. अत्यंत मार्मिक रचना...अजन्मी बच्ची का दुःख बहुत खूब कहा है आपने...पूरी रचना आपके आपने खास रंग में है...वाह
    नीरज

    ReplyDelete
  14. बहुत सुंदर कविता.

    रामराम.

    ReplyDelete
  15. भई होँठ सीले है, क्या बोलें?

    ReplyDelete
  16. विकट मार्मिक!!

    ReplyDelete
  17. बहुत ही कोमल एहसास हैं। तारीफ के लिए शब्‍द कम पड रहे हैं।

    ReplyDelete
  18. कुश भाई खुस कर दिया। कविता मे पारिवारिक सम्बन्धो मे अपकी अभिव्यक्ति ने प्यार, अपनापन, मेरे भी मन मे घोल दिया है। भाई मजा आ गया। अपने राजस्थान के परिवेश मे घर परिवार की मिठ्ठी यादो को सजोया जा सकता है। शहरी वातावरण ऐसी मुल्यवान पारिवारिक कृति बनने बनाने मे असमर्थ ही लगती है।

    आभार/मगलभवो के साथ
    मुम्बई टाईगर
    हे प्रभु य ह तेरापन्थ

    ReplyDelete
  19. कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एक मार्मिक रचना

    ReplyDelete
  20. बढ़े चलो, बढ़े चलो -- मगर बढे़ तो हम कहाँ?
    कि रास्ता ही जब नहीं, तो डाल दें कदम कहाँ?
    ---भारत भूषण अग्रवाल

    ReplyDelete
  21. पढ़ना अपने को दुखी करना है।
    अच्छा लिखा जी।

    ReplyDelete
  22. मार्मिक!
    काश सभी जन्मी-अजन्मी बेटियों का यह सपना पूरा होता।

    ReplyDelete
  23. बहुत अच्छी कविता है कुश भाई

    ReplyDelete
  24. अब क्या बोलें कुछ बोलने के लिए शब्द नहीं है मिल रहा है. बस आँखें नम हो गयी.

    ReplyDelete
  25. सुन्दर कविता

    ReplyDelete
  26. कन्या भ्रूण हत्या प्रकति से असंतुलन प्रक्रिया का एक ओर कदम है आदम जात का ...ठीक वैसे ही जैसे धीरे धीरे बाकी प्राणी लुप्त हो रहे है इस धरती से आदमी के सिवा...समलिंगी होना भी प्रकति का असंतुलन है ....जिस चीज से प्रकति आगे बढती है .जैसे की किसी नन्हे शिशु का जन्म ...वही कुदरत का नियम है ....हम इसमें अपनी दखलंदाजी करेगे .तो अपनी जाती ओर आगे आने वाले समाज का नुक्सान ही करेगे .

    ReplyDelete
  27. पता नही कैसे, मगर कभी कभी तुम इतना संवेदनशील लिख देते हो कि विश्वास ही नही होता कि तुम जैसा हमेशा मजाक करते रहने वाला व्यक्ति जिंदग के फलसफ़ों को इतनी गहराई से सोच कर फिर पन्ने पर उतारता होगा...!

    बहुत अच्छा लिखा कुश...!

    ReplyDelete
  28. नन्हा फूल कोख में ही जब मुरझा जाता है तो कुदरत भी रो देती होगी .कितने सपने यूँ ही खिलने से पहले ही टूट जाते हैं...मार्मिक लिखी है यह रचना ..

    ReplyDelete
  29. ankho ko to bhigoya hi anrman tak bhigo gai ye
    sarthak rachna .kalm jagrti to simit logo tak hi phunch payegi kuch aisi jagrti laye kalm ke sath jo jan jan tk phunch paye .

    ReplyDelete
  30. कविता दिल को छू गयी.

    न जाने कब sthiti sudheregi?

    ReplyDelete
  31. बेहतरीन कुश भाई.... दिल को छूने वाली पंक्तियाँ...

    ReplyDelete
  32. बाँट प्यार सभी को
    सबके दर्द मैं लेती..
    गर माँ तेरी कोख से
    जन्म मैं लेती....
    अरे आप की कविता सीधी दिल मै उतर गई, बहुत भावुक कर दिया आप ने.
    धन्यवाद
    अभी मैने इसे ब्लांगबाणी से खोलने कि कोशिश कि लेकिन वहा से आप का ब्लांग नही खुल रहा था.

    ReplyDelete
  33. मन की कितने परते भीगती चली गयी...सामान्य-साधारण शब्दों में एक अनूठी रचना...

    तुम नीरज जी से बार-बार "मंटो" के बारे में पूछते नजर आ रहे हो? यदि मासिक पत्रिका "नया ग्यानोदय" अभी मई वाला अंक पा सको कहीं से तो तुरत खरीद लो। ये अंक मंटो को समर्पित है। खास कर कृश्न चंदर द्वारा लिखा हुआ संस्मरण...पत्रिका नहीं मिले तो लिखना, मेरे पास दो प्रति है। एक भेज दूँगा!

    ReplyDelete
  34. संवेदनशील अभिव्यक्ति है..
    मासूम पर मार्मिक !!

    ReplyDelete
  35. pyari si kavita mein badi si chinta..........

    ReplyDelete
  36. अनुराग भाई का और कुश भाई आपका ब्लोग
    सिर्फ मोज़ील्ला से ही देख पा रही हूँ -
    खास आप दोनोँ के लिये मोज़ील्ला लगाया
    ताकि,
    कमेन्ट कर पाऊँ !
    ...ये कविता की चर्चा पहले पढ चुकी हूँ .
    .सँवेदना का सागर उमड पडा है ..
    काश !
    कोई माँ इसे पढे, जाने और ऐसी बच्ची
    सँसार की सुँदरता मेँ चार चाँद लगाने के लिये
    ज़िँदा रह जाये तो कितना अच्छा हो !
    ना जाने कब रुकेगी ये विनाश लीला ? :-(
    बहुत बढिया लिखा है ..
    यूँ ही लिखते रहेँ
    स स्नेह,
    - लावन्या

    ReplyDelete
  37. काश सभी जन्मी-अजन्मी बेटियों का यह सपना पूरा होता।

    ReplyDelete
  38. प्यारी सी तस्वीर घुमती रही आँखों के सामने बस आखिरी लाइन....

    ReplyDelete
  39. ग्रेट .....बस और क्या कहूँ शब्द नहीं हैं मेरे पास .

    ReplyDelete
  40. bahut badhiya Kush.... Antim panktiyan jaan dal gayi kavita me!!!

    ReplyDelete

  41. यह मासूम सी चाह बड़े मार्मिक तरीके से रखी गयी है, पग पग उलाहना देती हुई सी यह घुटी चीख ज़वाब माँगती है ।
    पर किससे... एक अपने समाज की माँगों को पूरा न कर पाने की भयभीत विकृत मानसिकता से, याकि उस सामाजिक व्यवस्था से जो इसकी जड़ों में है ? पहले बिन्दु पर तुम सफ़ल रहे हो.. पर इसके आगे ?

    ReplyDelete
  42. पुनः -







































    इसे एप्रूव कर देना जी !

    ReplyDelete
  43. Beshak...behtareen 'kavita' kahte hain aap...!

    http://kshama-bikharesitare.blogspot.com

    ReplyDelete
  44. जब केवल वाह निकले-बहुत सुंदर!

    ReplyDelete

वो बात कह ही दी जानी चाहिए कि जिसका कहा जाना मुकरर्र है..