Tuesday, January 20, 2009

मुस्कुराहट उधार मिल सकती है क्या ??

मुस्कुराहट उधार
मिल सकती है क्या ??

सुबह सुबह एक सज्जन फोन पर कहने लगे..
हम सकपकाए, भय्ये पहले ये तो बताओ की बोल कौन रिया है.. सामने से आवाज़ आई हम लल्लन लखनवी बोल रहे है.. वैसे तो हम ऐसे अंजान लोगो से बात नही करते पर जब लखनऊ का नाम जुड़ा था तो हम भी सोचे की बात कर ली जाए.. वो क्या है लखनऊ हमे बड़ा प्रिय है भले ही हम कभी गये नही वहा.. पर गये तो चाँद पे भी नही है मामा मामा तो कहते ही है.. खैर वो छोड़िए.. बात लल्लन की करते है.. हम बोले लल्लन मिया कहा नंबर मिलाया है आपने.. किस से बात करनी है..

लल्लन भाई बोले जो मिल जाए उसी से बात कर लेंगे.. हम बोले भाई अभी तो हम मिले हुए है. और धीरू भाई की मेहरबानी से इनकमिंग फ्री है, परमपिता की मेहरबानी से हम भी फ्री है तो अपना मूह खोलकर जो बोलना हो बोलिए.. हम निस्वार्थ भाव से सुनेंगे..

लल्लन जी को शायद हमारी बात समझ नही आई.. पर फिर भी अपनी बात करते रहे.. बोले आप जो भी हो आपको एक पीड़ित व्यक्ति की सहयता करनी चाहिए.. सहायता का नाम सुनकर हुमारी घंटी बजी.. हम बोले भाई साहब आपको ग़लतफ़हमी हुई है मेरे ससुराल से दहेज में मिले मोबाइल पर मत जाइए.. मैं तो बहुत मामूली आदमी हू.. लल्लन मिया बोले लाहोल विला कूवत तुम साले आम आदमी सहायता का नाम सुनते ही बटुए की तरफ देखते हो.. अमाँ मियां हर मदद पैसो से थोड़े ही होती है.. लल्लन मियां की बात सुनकर हम थोड़े सहमे... हमने भी फंटा मारा ऐसी बात नही है लल्लन जी पहले हम भी लोगो की बहुत मदद किया करते थे वो तो अब उम्र का तक़ाज़ा है वरना.. खैर आप बताइए.. कौन पीड़ित है..

इतना सुनते ही लल्लन मिया सेंटिमेंटल हो गये.. बोले अब तुम तो जानते हो छोटू.. आईला छोटू ये लल्लन मिया को कैसे पता की बचपन में हमारा कद छोटा होने से सब हमको छोटू कहते थे.. छोटू शब्द सुनते ही हमने बचपन की यादो में गोते लगा लिए वो चिल्लाए कहा गुम हो जाते हो छोटू.. हमने कहा जी माफ़ कीजिए यूही ज़रा.. आप बताइए.. क्या पीड़ा है आपको.. वो बोले रोज़ शाम को ऑफीस से घर आता हू.... बॉस की डाँट सुनके और घर आते ही बीवी परेशान करती है.. तंग आकर टीवी ऑन करता हू.. तो देखता हू हर चॅनेल लाफ्टर थेरेपी चला रहा है. .. राजू के ठहाके . .हसी के हंस्गुल्ले.. रंगीन मिज़ाज़ राजू.. सुनील पाल के क़हक़हे..

ऐसे ऐसे हँसी के प्रोग्राम आते रहते है.. की क्या बताऊ रोना जाता हैएक ही जोक हर चेनल पर इतनी बार दिखाया जाता है की वो जोक कम और जोंक ज्यादा लगता है। चेनल आपको तब तक हँसाने का दावा करता है जब तक की आप रो ना पड़े .. अब क्या बताऊ तुम्हे छोटू की हँसे हुए एक ज़माना गुज़र गया.. इसलिए सोचा की फोन करके किसी से हसी उधार ले लू.. ऐसे छिछोरे प्रोग्राम देख कर दूसरो की ही हँसी बर्बाद की जा सकती है.. अपनी नही.. इसलिए उधार माँग रहा हू.. तुम क्या कहते हो छोटू?

मैं क्या कहता उनकी बात सुनकर मुझे मेरी पीड़ा याद गयीमैं टे टे करके रोने लगालल्लन मियांघबरा गये... उन्हे लगा की यहा से तो हँसी मिलना मुश्किल है उन्होने कहा मैं फोन रखता हू..... तुम अपना ख्याल रखना छोटू.. छोटू शब्द के सम्बोधन ने और रुला दिया.. परेशानी दूर करने के लिए मैने टीवी ऑन किया तो देखा हसी के गुलगुले रहा है.. मैं और ज़ोर से रोने लगा.. फिर फट से मोबाइल उठाया और कॉल किया.. सामने से आवाज़ आई कौन.. हम बोले

मुस्कुराहट उधार
मिल सकती है क्या ??

Thursday, January 15, 2009

रेड लाइट.

रेड लाइट...



नही ये वो रेड लाईट एरिया नही जहाँ पर मजबूरिया कुछ जरूरतों से जद्दोजहद करती हो.. ये तो शहर के व्यस्त चौराहे पर लगी वो तीन लाईट है जहा इंसान कुछ देर के लिए ही सही पर रुकता है..

मैं भी रुकता हू.. मेरे पास में एक साइकिल रिक्शा खड़ा है.. जिसमे पीछे एक लड़का और लड़की बैठे है.. ठंड बहुत तेज़ है.. लड़के ने गले में अभिषेक बच्चन की स्टाइल में मफ्लर डाल रखा है.. लड़का लड़की दोनो आगे बैठे रिक्शा वाले को देखकर हंस रहे है.. मेरी नज़र रिक्शा वाले पर जाती है.. उसने नीले कलर का स्वेटेर पहन रखा है.. जो बगल से फटा हुआ है.. उसी के बीच एक अख़बार फसाया हुआ है.. शायद सर्दी से बचने के लिए..

रोड लाइट के बिल्कुल करीब एक लड़कीनुमा महिला की आवाज़ आ रही है.. भैया ऐसे क्या करते हो.. शायद उन्होने कार चलाते वक़्त बेल्ट नही लगा रखा था.. पुलिस वाला कह रहा है आप समझती नही मैडम! साहब आए हुए है.. चालान तो बनेगा ही बनेगा.. वो गाड़ी की तरफ मुडी.. शायद लाइसेंस माँगा हो पुलिस वाले ने.., पर नही उसने अपना फ़ोन निकाला है.... अब वो पुलिस वाले को फ़ोन दे रही है.. पुलिस वाले ने गाड़ी की चाबी वापस दे दी है.. वो लड़कीनुमा महिला फिर से अपनी गाड़ी में बैठकर जा रही है... पुलिस वाला गुस्से में कुछ बड़बड़ा रहा है..

उसने देखा रिक्शे वाले का रिक्शा लाइन से थोड़ा आगे बढ़ गया.. गुस्से में उसने आव देखा ना ताँव और रिक्शे की हवा निकाल दी.. रिक्शा वाले के पास मोबाइल नही है...वो अब बड़बड़ा रहा है...

लड़के लड़की उतर गये रिक्शे से.. अरे भई अब हम कैसे जाएँगे? रिक्शे वाले ने कहा दो मिनट रूको हवा भरवा लेता हू.. लड़के ने मना कर दिया.. हम नही रुकेंगे.. रिक्शे वाला कह रहा है पैसे तो पूरे लूँगा.. लड़का मना कर रहा है.. रिक्शे वाला चिल्ला रहा है.. लड़की ने अपने पर्स में से निकाल कर दे दिए.. अब लड़का मन ही मन कुछ बड़बड़ा रहा है..

और भी बहुत सारे लोग है.. एक भाईसाहब तेज़ी से आए अपना स्कूटर लेकर.. थोड़ी सी टक्कर लग गयी कार को.. वो मुस्कुरा कर बोले सॉरी सर.. और आगे आकर खड़े हो गये.. एक साइकिल वाला आगे जाने के चक्कर में उनके स्कूटर के काँच से अपना हेंडल छु के निकल गया.. वो भाई साहब चिल्लाए.. अबे अँधा है क्या.. दिखता नही.. साले पता नही कहा कहा से आ जाते है..

एक बच्चा भीख माँगते हुए आया.. और साइकिल वाले के टायर से टकराया.. साइकिल वाले ने उसको थप्पड़ मारा.. और बोला चल भाग यहा से..

वो लड़का भीख माँगते हुए किसी कार की खिड़की पर खड़ा है.. भीख मांगने के चक्कर में कांच पर उसकी उंगलियों के निशान बन गए.. अंदर बैठे आदमी ने उसे धक्का देकर पीछे हटाया... वो बच्चा खिड़की में से उस आदमी के मुँह पर थूक कर चला गया है...

बस में बैठे एक आदमी ने खिड़की में से बाहर पान थूक दिया है.. जो एक भाईसाहब के कंधे पर गिरा.. उन्हे गुस्सा आ गया.. वो बोलना तो चाहते थे पर बोल नही पा रहे थे.. वो इधर उधर देखने लगे. फिर सड़क पर गुटका थूका और बोले भले आदमी थूकने से पहले देख तो लो कोई नीचे खड़ा है या नही..

मैं बस खड़े खड़े सोच रहा हूँ.. मुझे किसी से कोई सहानुभूति क्यो नही हो रही है.. ? क्या मैं बदल रहा हू? क्या मुझमे अब भावनाए नही बची है? ..क्या मेरी लाइफ मटीरियलीस्टिक हो रही है....?

सोचते सोचते पता ही नही चला लाइट कब ग्रीन हो गयी.. अब तो सिर्फ़ तीन सेकेंड बचे है.. ओह नो ! फिर से रेड लाइट..

अक्सर ज़िंदगी में ऐसा हो जाता है.. लाइट ग्रीन हो जाती है और हमे पता नही चलता.. फिर कुछ देर के लिए खड़ा रहना पड़ता है.. मैने सोच लिया है.. इस बार लाइट ग्रीन होते ही निकल जाऊँगा...

वैसे रेड लाइट पर अभी भी बहुत कुछ हो रहा है.. पर वो फिर कभी बताऊँगा... आप देखिए कही आपकी लाइट ग्रीन तो नही है..

Monday, January 5, 2009

एक और साल.. एक और रेजोलुशन

नए साल का पहला दिन है... मैं उनिंदी आँखो को मलते हुए उठता हू और दरवाज़ा खोलता हू.. कोई मेरे आँगन में पूरी दुनिया का बंडल बाँध कर फैंकता है.. मैं उसे उठाता हु.. ऊपर नज़र जाती है... सुबह सुबह फिर आसमान में किसी ने सोने का एक सिक्का रख दिया है..

कभी सोचा है की कोई रात को पैदा हो और सुबह मर जाए.. ? ये ओस की बूंदे, रात को आई थी..
मेरे आँगन में लगे गुलाब पर आख़िरी साँसे गिन रही है.. छोटी सी ज़िंदगी भी कितनी खूबसूरती से जी जाती है..

रात को कितने लोगो ने नशा किया होगा...मुझे सुबह की चाय का नशा है.. चाय बनाता हु .. और हाथ में पूरी दुनिया लेकर बैठ जाता हू.. नया साल है.. नये साल की बधाई दी जा रही है.. नये साल पर रेजोलुशन लीजिए.. लिखा है स्मोकिंग छोड़िए.. ड्रिंकिंग छोड़िए.. गाड़ी धीरे चलाइए.. पर ये सब तो मैं पहले ही नही करता.. फिर रेजोलुशन क्या लिया जाए..

और फिर क्या करेंगे.. रेजोलुशन लेकर.. जो कभी पूरे ही नही होते.. क्यो कभी कुछ भी पूरा नही होता. ऐसा लगता है सब कुछ अधूरा है.. अधुरी खुशिया.. अधूरे काम.. अधूरे दिन.. अधूरी राते.. कभी पुरा होने की चाह में कितनी ही ज़िंदगिया अधूरी ही बीत जाती है..

मेरे पापा... अचानक याद आया..

पापा की कितनी ही हसरते मेरे कपड़ो की सिलाई के कुछ धागो के बीच उलझी हुई होगी.. कितने ही सपने मेरी किताबो के उपर चढ़े अख़बारो के कवर में दबे होंगे.. कितना गिल्ट महीने के आखिरी दिनों में मेरे स्कूल के फटे हुए जूतों के बीच से झांक रहा होगा..

पापा..

आज अचानक मुझे सुबह सुबह पापा की याद क्यो आ रही है.. पापा को रिटायर हुए तीन साल हो चुके है.. अब एक और साल बीत गया है.. सब कहते है पैसा हो तो खुशिया मिल जाती है.. क्या पापा के सामने जाकर रख दू चेक बुक.. और कहु की पापा आपके लिए ढेर सारी खुशिया लाया हू..

पर पापा के लिए खुशिया ये नही.. मैं जानता हू.. उन्हे इसमे खुशी नही मिलेगी.. पापा को खुशी तब मिलती थी जब मेरा कोई दोस्त घर के बाहर आकर मुझे आवाज़ लगाता और पापा अंदर मम्मी को मेरे दोस्त का नाम बताते की वो होगा.. और जब बाहर मेरा वही दोस्त होता जिसका नाम पापा ने लिया.. तो उनको बहुत खुशी होती थी..

मगर अब? अब तो दोस्त लोग घर नही आते मैं जो नही हू वहा.. आ जाए तो पहले ही फोन कर लेते है.. मिस कॉल मारू तो बाहर आ जाना.. पापा अब गेस नही करते..

ओस की बूंदे कभी मरती नही.. एक बूँद अभी अभी अख़बार पर गिरी..

अपनी उंगली से उसे हटाया.. एक खबर थी दिल्ली का अप्पू घर बंद होकर अब जयपुर में शुरू होने वाला है.. दोस्तो की फरमाइश याद आई.. इस बार रोलर कोस्टर की राइड पर चलेंगे.. कितना मज़ा आया था ना पिछली बार..

पापा के कंधो की राइड.. जब मम्मी खाना बनाती थी... पापा मुझे कंधे पर बिठाकर बाहर घुमाने ले जाते..पापा के कंधो की राइड के आगे कौन से रोलर कोस्टर की राइड होगी..

ओस की बूंदे मर कर भी नही मरती.. फिर गिर पड़ी..

अख़बार में फिर लिखा है किसी ने रेजोलुशन लिया है.. मोटा होना है.. पतला होना है.. लंबा होना है..

पापा को कोई गिफ्ट दू अच्छा सा? क्या दू?

वक्त ! ........... हाँ यही ठीक रहेगा.. पापा को थोड़ा वक़्त देता हू.. यही रेजोलुशन ठीक रहेगा.. ये साल पूरा पापा के नाम है.. बस

अख़बार बंद कर दिया है.. चाय ख़त्म हो चुकी है.. आसमान में टंगा सोने का सिक्का पिघल रहा है.. एक और दिन बाहर दरवाजे पर मेरा इंतेज़ार कर रहा है... मैं आदतन देर करता हू.. वो बाहर हॉर्न बजा रहा है..

पापा डांट रहे है.. रोज़ स्कूल बस को वेट करवाते हो.. हर काम में देर लगाते हो..

मैं तैयार होकर ऑफीस के लिए निकलता हू... आज का दिन मेरे साथ है.. अब देर नही करूँगा पापा...

Monday, December 29, 2008

उसकी धड़कने बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी..

उसकी धड़कने बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी..

कही आज फिर बॉस ने रात को देर तक रोक लिया तो..? नही वो साफ़ कह देगी.. ऑफीस टाइम के बाद मैं नही रुक सकती.. पहले तो गर्मिया थी शाम देरी से होती थी पर अब नही अब अंधेरा जल्दी हो जाता है.. मगर वो बॉस को कैसे मना करे समझ नही पा रही थी.. नौकरी का भी सवाल था.. अगर ये नौकरी भी हाथ से गयी.. तो क्या होगा..

उसकी धड़कने बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी..

अगर पहले कभी ऐसा होता तो वो कभी मना नही करती.. लेकिन पिछले सात दिनों से जो उसके साथ हो रहा है.. उसने उसे विचलित कर दिया है.. इन सात दिनों में तीन बार उन लड़को ने उसके साथ बदतमीज़ी की है.. रोहित को इस बारे में बताया पर उसका कहना है तुम घर बदल दो.. कही और घर ले लो.. मगर कैसे? ये घर कितनी मुश्किलो से मिला है.. फिर यहा किराया भी कम है.. लेकिन उन लड़को का क्या.. पहले वो बैठे बैठे कुछ भी बोलते रहते थे.. तब तक तो ठीक था मगर.. कल, कल रात तो वो मेरा रास्ता रोक कर खड़ा हो गया..

अकेले अकेले कहा जा रहे हो?

अचानक सब कुछ फिर से उसके चेहरे के सामने आ गया.. कल रात ऑफीस की केब उसे गली के बाहर तक छोड़ के गयी थी.. उसने तेज़ कदमो से घर की तरफ बढ़ना शुरू किया..

उसकी धड़कने बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी..

जैसे ही वो थोड़ा आगे बढ़ी. की एक लड़के ने उसका रास्ता रोक लिया..

अकेले अकेले कहा जा रहे हो?

दूसरा जो पीछे बैठा था वही से बोला.. हमे भी तो साथ ले लो जहा जा रहे हो? और सब ज़ोर से हँसने लगे..

प्लीज़ मुझे जाने दिजिये.. बोलते हुए उसकी धड़कने बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी..

अरे तो हमने कहा मना किया है.. जाइए ना.. पर हमे भी तो साथ ले जाइए..

उसकी आँखो में आँसू आ गये..

लड़का बोला अरे ये तो रोने लग गयी.. विदाई का वक़्त आ गया है..

वो रोते हुए भागने लगी.. लड़के उसके पीछे पीछे चलने लगे.. वो रोती जा रही थी.. तेज़ कदमो से जाने लगी.. थोड़ी दूर तक चलने के बाद लड़के लौट गये.. वो रोती हुई घर में चली गयी..


उसकी धड़कने बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी..

उसको गुस्सा आ रहा था खुद पर.. कितना कुछ बोल के आई थी घर पर.. माँ मैं सब संभाल लूँगी.. पापा मैं हू आपकी बहादुर बेटी.. कुछ नही होगा पापा.. कितनी लड़किया अकेली रहती है बाहर.. मैं सब संभाल लूँगी..

कुछ भी तो नही संभाल पाई थी वो.. क्यो लड़ झगड़ कर आ गयी वो यहा.. अपनी सहेलियो से बोला था उसने.. तुम्हारी तरह नही रहूंगी.. रसोई में जीकर रसोई में नही मरना मुझे.. मैं सबको दिखा दूँगी मैं कौन हू..

आज जो हुआ.. उसने रोहित को फ़ोन पे बताया.. रोहित ने फिर से इस बार उसको घर बदलने के लिए कहा..

मैने तो तुम्हे पहले ही मना किया था.. वहा मत रहो.. अब भुगतो इतना बोल कर रोहित ने फ़ोन रख दिया..

उसने फ़ोन को उठाकर ज़ोर से दीवार पर फेंका..

क्या हुआ मैडम? ऑफीस का चपरासी भागता हुआ उसके कॅबिन की तरफ आया..

कुछ नही एक गिलास पानी ले आओ..

उसने फोन लगाया और अपनी माँ को सब कुछ बताया.. उसे लगा उसकी माँ उसे वापस घर बुला लेंगी..

पर उसकी माँ बोली.. "तू मेरी बेटी होकर डर गई..पगली तू एक औरत है.. जा और जाकर बता की एक औरत की शक्ति क्या है.. औरत सिर्फ़ लक्ष्मी या सरस्वती ही नही होती.. वक़्त पड़ने पर वो काली और दुर्गा का रूप भी ले सकती है.. क्या यही सिखाया है मैने तुझे डर के हार मान जाएगी तू.. आज अगर तू डर गयी तो वो तुझे रोज़ डराएँगे.. डरने से कुछ नही होगा बेटी जाकर बता तू किसकी बेटी है बता दे.. बता दे.."

वो अपनी कुर्सी से खड़ी हुई.. एक अनोखी शक्ति का अनुभव हुआ उसे.. उसकी आँखो में एक फ़ैसला था..

उसकी धड़कने बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी..

चपरासी पानी देकर जाने लगा..

"सुनो.. ये लिस्ट लो और सामने से ये सामान ले आओ.." वो बोली

मैडम जी ये सामान ?

"जो कहा वो करो.. जाओ.." उसने फ़ैसला कर लिया था.. आज पहली बार वो देर होने से घबरा नही रही थी..

केब ने उसे छोड़ा .. वो गली की तरफ़ बढ़ी ..

उसकी धड़कने बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी..

सारे लड़के वही बैठे हुए थे.. वो उनकी तरफ़ बढ़ी.. एक लड़के की बाइक के पास जाकर उसने बाइक को लात मारकर गिरा दिया.. हे दम तो आ.. वो गरज़ी .. लड़के सहम गये.. वो कुछ समझे नही.. उसने अपने बालो में लगा क्लचर खोला और बोली आ अगर अपनी माँ अपनी का दूध पिया है तो..

उनमे से एक लड़का तेज़ी से उसकी और बढ़ा.. वो तैयार थी.. जैसे ही वो पास आया.. उसने अपने पर्स में रखा डियो निकाला.. और उसकी आँखो में स्प्रे किया.. लड़का ज़ोर से चिल्लाया.. वो आगे बढ़ी और उस लड़के के पेट पे ज़ोर से लात मारी..

बाकी के लड़के आगे आए.. साली तेरी ये हिम्मत... और चारो लड़के उसके सामने आए.. उसने अपने पर्स में से लाल मिर्च निकाली और उनकी आँखो में उछाल दी.. एक लड़के ने उसे धक्का दिया.. वो नीचे गिर गयी.. उसका पर्स दूर जा गिरा.. वो लड़का आया और उसके बाल पकड़ कर.. घुमा दिया..

उसने अपनी कोहनी से लड़के के पेट में मारा.. लड़का संभल नही पाया.. वो उछली... दूसरा लड़का आया... लड़की ने उसकी टाँगो के बीच में ज़ोर से लात जमा दी.. लड़का उछलकर पीछे जा गिरा.. वो आगे बढ़ी.. बाकी तीनो लड़को को धक्का दिया.. और उनके पेट में ज़ोर से लात मार के तीनो को गिरा दिया..

उनमे से एक उठा.. उसने चाकू निकाला.. और लड़की के सामने खड़ा हो गया.. लड़की ने अपनी आँखे बंद की और ज़ोर से चिल्लाते हुए छलाँग लगाई.. लड़के की बाइक पर एक पाँव लगाते हुए दूसरे पाँव से लड़के के मुँह पर वार किया.. लड़का तैयार नही था.. उसके हाथ से चाकू छूट कर गिर गया.. लड़की ने चाकू हाथ में लिया और लड़के के सीने पर पाँव रखकर खड़ी हो गयी..

उग्रचंडा प्रचंडा च चंडोग्रा चंडनायिका..
चन्डा चंडवती चैव चंडरूपातिचंडिका..


उसके खुले बाल हवा में लहरा रहे थे..बालो के बीच से झांकती उसकी रक्त सी लाल आँखों को देखकर लड़के काँप उठे.. गिरा हुआ लड़का हाथ जोड़कर माफी माँग रहा था... बाकी चारो लड़के उसके पाँव में गिरकर माफी माँगने लगे.. उसने चाकू फैंका...अपना पर्स उठाया और अपने हाथ झटकते हुए आगे बढ़ गई..

लड़के सहमे हुए उसे जाते हुए देख रहे थे..

ज्वालाकारालाम्त्युग्रमं अशेषासुरसूदनं..
त्रिशूलं पातुनोऽर्भीते भद्रकाली नमोस्तुते..


वो घर पहुँची... रोहित के बीस मिस काल थे.. उसने रोहित को फ़ोन किया... रोहित बोला कहा हो तुम मैं कब से तुम्हे फ़ोन कर रहा हू.. मैने तुम्हारे लिए घर देख लिया है..

क्या हुआ.. कुछ बोल क्यो नही रही हो.. जवाब दो ना..

तुम मेरे लिए अब परेशान मत होना रोहित... मुझे घर नही बदलना.. मैने अब अपना इरादा बदल दिया है.. गुड बाय

नमस्चंडिके चंडोर्दंडलीला लसत्खण्डिताखण्डलाशेषशत्रो..
त्वमेका गतिर्देवी निस्तार्हेतु नमस्ते जगत् तारिणी त्राहि दुर्गे..

Wednesday, December 24, 2008

गर खाली बैठे है तो ऊब जाइए... वरना चुल्लू भर पानी में डूब जाइए.

गर खाली बैठे है तो ऊब जाइए...
वरना चुल्लू भर पानी में डूब जाइए..


उपरोक्त पंक्तियो का किसी भी व्यक्ति या घटना से कोई संबंध नही है.. और यदि है तो वो पूर्णतया काल्पनिक है..


अब चलते है आज की पोस्ट की तरफ..

"परिवर्तन प्रक्रति का नियम है" छोटा था तब पड़ोस के एक घर में पोस्टर पे लिखा था.. बाद में उस पोस्टर को बदल के वहा रिकी मार्टिन का पोस्टर लग गया.. कुछ दिनों बाद वहा लियनार्डो आ गया.. और आज वहा दो बिल्लियों की तस्वीर लगी है.. वाकई परिवर्तन संसार का नियम है..

सब कुछ बदल रहा है.. ज़िंदगी लाइफ हो गयी है.. दोस्त ड्यूड हो गये है.. माँ पिघल कर मोंम बन गयी है.. मुन्ना अब मॉंटी बन गया है.. मनोहर काका का बेटा राकेशनाथ अब रिंकू बन गया है..


बहुत कुछ हमारे घर में भी बदला है.. कभी टेबल फ़ैन को घूमते हुए रखकर चारो भाई एक कमरे में सो जाते थे.. आज सबका अपना कमरा बन गया है उनमे कूलर लग चुके है.. पहले पड़ोसी के यहा टी वी देखने जाते थे.. और वो भी उन पडोसियों के यहाँ जो साले इतने कमीने थे की नीचे ज़मीन पर बिठा देते थे.. ये भी नही सोचते की बच्चे की चड्डी फटी हुई है.. पर आज सबके कमरे में अपना टी वी है.. डिश टी वी और टाटा स्काइ के साथ.. बदल रहा है. सब कुछ..


अगर आप पढ़ते हुए ऊब रहे थे.. तो एक बार सबसे उपर लिखी दो लाइन पढ़ लीजिए.. मुझे लगता है आप डूबना पसंद करेंगे.. तो इस पोस्ट में डूब जाइए.. या फिर वेले बैठे ऊब जाइए..

बदलाव ज़रूरी है.. हर चीज़ में..

जो पीढ़ी बदलाव में विश्वास नही करती वो तुच्छ व्यक्तियों की पीढ़ी कहलाती है..- अनूप शुक्ल "नैनीताल वाले" ..


तो अब चलते है बदलाव की तरफ बदलाव कैसे किए जाए...

लाइब्रेरी में जाकर यदि आपके मन को शांति नही मिल रही है.. तो वहा बैठकर ऊबने से अच्छा है किताब लेकर किसी ऐसी जगह जाए जहा आपको शांति मिलती हो..

ऑफीस में अगर आज कोई काम नही है तो बैठे बैठे समय वेस्ट ना करके दोस्तो या रिश्तेदारो से मिलने चले जाए.. सच मानिए उन्हे भी बहुत खुशी होगी की आप उनके लिए वक़्त निकालते है..

जिस रास्ते से रोज़ घर जाते है.. उसे आज बदल दीजिए.. किसी नये मोड़ से मुड़कर देखिए..

अपने फ़ोन में कुछ खास दोस्तो के नाम बदल दीजिए.. जैसे अपनी वाइफ का मोबाइल नंबर एमरजेंसी के नाम से डाल दीजिए.. अपनी मम्मी के लिए लिखिए गोड'स गिफ्ट... बॉस का नाम भूतनाथ और किसी खास दोस्त का नाम उसकी गर्ल फ्रेंड के नाम से सेव कर दीजिए..

अगर आप ब्लोगर है और रोज़ एक ही तरह की पोस्ट लिखते लिखते ऊब गये है.. तो अपना विषय बदलिए.. उदहारण के लिए अगर आप बहुत ही रोने धोने वाली पोस्ट लिखते है.. तो अब अंट शंट लिखिए.. अपनी शैली बदलिए..

कुछ भी जो आप बदलकर जीवन में नये रंग भर सकते है.. वैसा करिए.. वरना आप खाली समय में बैठे बैठे ऊब कर ईश्वर की दी हुई ज़िंदगी का समय वेस्ट कर सकते है.. लेकिन ये पल लौट कर नही आने वाले ...


अब एक खबर -


खबर मिली है की शेयर मार्केट के गिरने की अति तीव्र प्रक्रिया से लोग ऊबने लगे है..

क्या कहा? तीव्र प्रक्रिया से भी लोग ऊबते है????