Tuesday, April 7, 2009

दस पैतालीस की आखिरी मेट्रो

दस पैतालीस की आखिरी मेट्रो थी.. द्वारका से इन्द्रप्रस्थ की तरफ जा रहा था.. कैब आई नहीं थी तो मेट्रो ही लास्ट आप्शन था.. मैं ट्रेन में जाकर बैठ गया.. हाथ में राहेजा की किताब 'एनिथिंग फॉर यु मेम थी.' मैं किताब पढ़ रहा था.. जनकपुरी स्टेशन आया ट्रेन रुकी और फिर चल पड़ी.. मुझे पता भी नहीं चलता ट्रेन में कौन चढा अगर वो आकर मुझे मेरे मोबाइल के बारे में नहीं बताती.. मेरा मोबाइल नीचे गिरा हुआ था..

"थैंक्स "...मैंने कहा..
इट्स ओके ..

मुझे अजीब लगा पर वो मुझे देख रही थी.. ट्रेन में बहुत कम लोग थे और सब काफी दूर दूर बैठे थे.. जगह होने के बाद भी वो मेरे बगल में आकर बैठ गयी..

" कहा जा रहे हो.. ? " उसने पुछा..

मैं.. ! इन्द्रप्रस्थ..
और आप?

वहा तक जहा ये मेट्रो नहीं जाती..
मैं समझा नहीं..

समझदार लगते भी नहीं हो..
मतलब ?

देखा..! नहीं समझे मतलब इसी लिए कहा था..

मैं समझ नहीं पा रहा था वो क्या कह रही थी.. मैंने अपनी आँखे फिर किताब में घुसा ली..

क्या करते हो? वो बोली..
जी मैं कॉल सेंटर में काम करता हूँ..
अरे मैं भी तो वही करती हु..

आप ?
हा ऑर क्या तुम कॉल बॉय हो और मैं कॉल गर्ल..
व्हाट?
मेरे बिलकुल करीब एक कॉल गर्ल बैठी थी.. उसे देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा था.. मुझे थोडी हिचकिचाहट हुई मैंने आस पास नज़र उठाकर देखा किसी की नज़र हमारी तरफ नहीं थी.. मैंने किताब बंद करके रख दी..

खुद को मुझसे कम्पेयर मत करो.. मैं तुम्हारी तरह नहीं हु..
क्यों ऐसा क्या अलग करते हो तुम? तुम्हारा क्या काम है ?
मैं फ़ोन पर, कस्टमर्स को होने वाली प्रोब्लम का सॉल्यूशन बताता हु..
तो मैं भी तो वही करती हूँ.. तुम्हारा काम भी ग्राहक को खुश रखना है और मेरा काम भी..

वेरी स्मार्ट..! लेकिन तुम जिसके लिए ये काम करती हो मैं उसके लिए नही करता..
मैं तो पैसे के लिए करती हूँ.. तुम किसके लिए करते हो?

मैं भी पैसो के लिए ही करता हूँ.. लेकिन...
लेकिन वेकिन क्या .. ही बताओ क्या फर्क है..

अरे कैसी बात कर रही हो .. हमारा काम सिस्टेमेटिक होता है.. हमारे टारगेट्स होते है जो हमें हमारा बॉस देता है.. हर महीने का एक टारगेट होता है..

अरे तो मैं तो यही करती हूँ.. तुम्हारा तो एक महीने का टारगेट है मुझे तो रोज़ का टार्गेट मिलता है.. ये जो मेरा पेट है ना रोज सुबह, इसको शाम तक भरने का टारगेट देता है.. मैं तो इसी के लिए काम करती हूँ.. यही मेरा बॉस है..

हुह.. मजाक अच्छा है ..
क्या करे.. मेरी लाइफ सबको मजाक ही लगती है..


नहीं मेरा वो मतलब नहीं था.. मैं समझ सकता हु दिल्ली जैसे शहर में कैसे सर्वाइव करते है.. मेरी शादी हो चुकी है पर अपना घर तक नहीं है... सच कहू तो हमारे जैसे लोगो का शादी करना आसान है पर घर.. घर बनाना बहुत मुश्किल.. तुमको नहीं लगता ?

बिल्कुल नही बल्कि हमारे जैसे लोगो के लिए घर बनाना आसान है पर शादी करना बहुत ही मुश्किल.. तुमको नहीं लगता ?

जिस तरह से जवाब दे रही थी.. मैं हैरत में था..

समझ सकता हूँ.... मेरी दोस्त बनोगी? मैंने कहा..
दोस्त ?
क्यों क्या हुआ?
पता नहीं.. पर इस वर्ड से कोई दोस्ती नहीं है मेरी.. दोस्त तो कई मिले पर सबको एक ही चीज़ चाहिए थी.. तुमको नहीं चाहिए ?

क्या?
या तो तुम बहुत बेवकूफ हो या फिर बहुत शातिर..!

अरे ये क्या बात हुई.. ठीक है मत बनो दोस्त..
नहीं नहीं ऐसा नहीं है.. चलो ठीक है दोस्ती पक्की..

ऑर उसने हाथ आगे बढाया.. उससे हाथ मिलाते ही एक अजीब सी सनसनी फ़ैल गयी.. अब तक तो ऐसी कोई फिलिंग थी नहीं पर उसका हाथ थामते ही एक अजीब सी बैचेनी होने लगी.. बहुत देर तक मैं चुप रहा.. बार बार हम दोनों की नज़रे एक दुसरे से मिल ही जाती थी..
अगला स्टेशन करोल बाग़ था.. गेट खुलते ही एक ठंडी हवा का झोंका अन्दर आया.. वो मेरे और करीब चुकी थी.. मैं नहीं जानता था मुझे क्या हो रहा है.. दो चार लोग और उतर गए थे..

कुछ बात है जो शायद तुम कह नहीं पा रहे हो.. वो बोली
नहीं ऐसी कोई बात नहीं..
अब जब दोस्त कह ही दिया है तो बोल दो..
सच में कुछ भी तो नहीं है..

जैसी तुम्हारी मर्ज़ी..

वो कैसे सब कुछ जानती थी थोडी ही देर में हम लोग उतरने वाले थे.. मैं कोशिश कर रहा था कि जितना जल्दी हो मैं उसे कह सकु..

वो मेरी तरफ मुडी और मैंने उससे कहा क्या तुम मेरे साथ....
उसका चेहरा थोडा बदल चुका था.. गले में एक हलचल देखी मैंने.. वो बोली
मगर तुमने तो मुझे दोस्त कहा था.. और तुम भी??
प्लीज मुझे गलत मत समझना.. तुमको देखकर एक ख्याल आया बस.. तुम भी चाहो तो कोई बात नहीं हमारी दोस्ती ऐसी ही रहेगी..

तुम्हारी बीवी भी तो है घर पे ?
हाँ है मगर..
मगर क्या ?
तुम नहीं समझोगी.. जाने दो..
हुह.. मैं सब समझ समझती हूँ डियर.
नहीं तुम मुझे गलत समझ रही हो मैं सिर्फ तुम्हारा दोस्त हूँ और दोस्ती के रिश्ते से ही चाहता हूँ.. मेरे लिए तुम कोई कॉल गर्ल नहीं हो..

वाह.. क्या बात कही है.. अच्छे घर के लगते हो ?
थैंक्स.. !
हुह.. मैंने कहा कुछ नहीं समझते हो..

वो सब छोडो तुम ये बताओ हाँ कि ना ? मैंने पुछा..
ठीक है.. अब जब दोस्त बोल ही दिया है तो ठीक है मगर एक बात याद रखना ये मैं पैसो के लिए नहीं कर रही हूँ..

जानता हूँ.. लेकिन कहाँ पर? ट्रेन में तो पोसिबल नहीं है..
ट्रेन नहीं डफर स्टेशन पर.. मंडी हाउस वाले स्टेशन पर..

उसके बाद जो कुछ हुआ वो तो तू जानता ही है.. और क्या बताऊ..
साले चैम्प तू नहीं सुधरेगा..तेरा रोज़ का है ये..
अबे सुधरने के लिए तो सारी ज़िन्दगी पड़ी है.. पर बिगड़ने की उम्र तो यही है.. देख ले आज ये निन्यानवे नंबर की थी.. बस इस शनिवार को सेंचुरी मार लेंगे..
तू भी साले पुरा कमीना है.. अच्छा ये बता उसका नंबर शम्बर लिया या नहीं कुछ हमारा भी भला कर देता..
नहीं यार उसने दिया नहीं.. पर मेरा नंबर उसने लिया है वो मुझे कर लेगी फोन..

बीप! बीप! बीप! बीप!

मेसेज आया लगता है..
देख तो कही उसी का तो नहीं..
देखता हु..
क्या हुआ बे.. क्या हुआ? कुछ बोलता क्यों नहीं? क्या लिखा है.. क्या हुआ?

" तुम्हारे साथ वाली कल की रात.. बहुत ही बढ़िया थी.. ठीक वैसी ही जैसे आज से सात महीने पहले इसी ट्रेन में मुझे एक दोस्त मिला था.. जिसने मेरी दोस्ती का ग़लत फायदा उठाया.. और मुझे ये बीमारी दी .. उसके बाद से कई बार यहाँ आई हूँ.. उसके जैसे और भी मिलते है.. तुम भी मिले.. पता है तुम निन्यानवे थे.. इस शनिवार को सेंचुरी हो जायेगी..."

Friday, April 3, 2009

ब्लोगर मिस्ट्री ऑफ़ प्राचीन काल !! हेव डेयर टू सॉल्व इट ?

एक फिल्म नहीं मगर इसमें कुछ पात्र तो है क्या करे अगर वो काल्पनिक नहीं है तो.. नाम न ले.. इशारों में समझा दे.. उस दौर में चले जाये जब लोगो के पास भाषा नहीं थी इशारों इशारों में बाते होती थी.. नहीं मैं किसी प्रेमी युगल के बारे में बात नहीं कर रहा उनसे मुझे पूरी सहानुभूति है मैंने खुद भी कई बार अपने सीधे हाथ की ऊँगली को उल्टे हाथ की कलाई पर लगाते हुए फिर सीधे हाथ की उंगलियों से पांच बजाते हुए इशारे किये है.. मगर ये वो इशारा नहीं है.. नहीं नहीं ये बी इशारा भी नहीं.. जिनकी फिल्म कभी आपने देखी हो.. ये तो इशारों इशारों में होने वाली बातो की बात है..

क्या कहा आपको नहीं पता? हे संकट मोचन काहे ब्लोगर बनाया इनको?? ब्लोगर होकर भी यदि इशारों को नहीं समझो तो नालत है आप पर.. यहाँ पर इशारों इशारों पर पोस्ट लिखी जाती है.. इशारों इशारों में नाम ले लिया जाता है.. जिसको इशारा किया है वो इशारा समझ कर अपने ब्लॉग पर इशारा करने वाले की तरफ इशारा करते हुए पोस्ट लिख देते है.. देखिये न कैसे इशारों इशारों में बात हो जाती है और हम बूझ ही नहीं पाते की लफडा क्या था..

हालाँकि बूझने के मामले में हमारा भी कोई जवाब नहीं.. जब भी हम जोधपुर में अपने भाई बंधुओ के साथ होते है तो हमारा प्रिय खेल डम्ब शराज खेलते है.. ये खेल तो हमारे डा. अनुराग का भी फेवरेट है उन्होंने तो अपने साहबजादे आर्यन (अगला आमिर खान वही है.. क्या पता आमिर से दुगुना हो.. वो क्या है कि आजकल दुगुने का ही ज़माना है ) के जन्मदिन की पार्टी में भी बच्चो को डम्ब शराज ही खिलाया था.. नहीं नहीं खाने में नहीं जी.. ये तो खेल खिलाने वाला खाना है.. बाकी खाना तो बच्चो ने शानदार खाया था.. पर उसके विषय में फिर कभी.. हम डम्ब शराज पर आते है.. दो टीम बनती है हर टीम के एक बन्दे को दूसरी टीम का बंदा एक फिल्म का नाम बताता है.. और जिसे नाम बताया गया है उसे फिल्म का नाम अपनी टीम को इशारों में समझाना होता है.. बस इशारों को समझने की पॉवर आपमें होनी चाहिए..


जब हम पिछले साल अपने ऑफिस की तरफ से एनुअल ट्रिप के लिए जबलपुर (जबलपुर के ब्लोगरो से तो आप परिचित है ही... देखिये तस्वीर में जबलपुर का प्रसिद्द धुँआधार जल प्रपात, तस्वीर रोप वे से ली गई है ) गए थे तो पुरे रास्ते ट्रेन में हमने यही खेल खेला था.. और जब सुबह उठे तो हमारे पास के एक सज्जन ने कहा भाईसाहब कल रात मैंने फिल्मो के जो नाम सुने वो अपनी ज़िन्दगी में भी कभी नहीं सुने.. ऐसे ही एक नाम मेरे कुलीग मनोज (जिनकी साईट का बैनर आप मेरे ब्लॉग पर साइडबार में देख सकते है) ने दिया था.. उस फिल्म का नाम था "हावडा ब्रिज पर लटकता खुनी खंज़र" अब आप भी बताइए क्या ऐसी कोई फिल्म है ? पर हमने फिर भी बूझ लिया हमारे साथी की हरकतों से..

तो ये होती है बूझने की कला.. खैर बूझने की कला तो ये है मगर बुझाने की कला क्या? नहीं नहीं इशारों से लगने वाली आग को बुझाने कि कला नहीं पहेलिया बूझने की कला.. अरे नहीं फिर भटक गए आप.. ये ताऊ की पहेली नहीं वो तो बूझना अपने बस की बात नहीं.. ये तो वो पहेली जो हम बूझाते है और लोग बूझते है.. कुछ लोगो को तो एक बार में ही सब समझ में आ जाता है पर कुछ लोगो को समय लगता है.. किन्तु ये भी तो सही है की समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता.. एक कप कॉफी पी भी नहीं..

बूझने की बात होती ही रहती है प्रत्यक्षा जी पोस्ट में पूछती है तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ? अंकित अपने दोस्त के घर पर देखता है प्रत्यक्षा जी को तो पूछता है तैमूर घोड़ा युस करता था? वो तो लंगडा था ना? प्रत्यक्षा जी कहती है.. जी अंकित तैमूर लंगड़ा ही था , तभी घोड़ा चाहिये था .... ओह आई सी टाइप का तो कोई रिप्लाई आता नहीं है अंकित की तरफ से.. पर उसके दोस्त को कोई बूझ नहीं पाता.. खुद अंकित भी नहीं..


पर इस दोस्त के घर पर और भी कई दोस्त मिलते है उनमे से कई तो ब्लोगर भी है.. उन ब्लोगर दोस्तों के भी और कई दोस्त होंगे बढती दोस्ती को देखते है तो कुछ धव्निया उत्पन्न होती सी प्रतीत होती है.. कुछ गुट गुट टाइप की आवाज़ आती है.. थोडी ही देर में घुट घुट में तब्दील हो जाती है.. और घुटने में दर्द होने लग जाता है कहते है जिसको भी दिल से तकलीफ होती है वो घुटने के दर्द से परेशान रहते है.. घुटने पर बाहर कोई जख्म लगा हो तो फिर भी मलहम लगा दे पर अन्दर से घुटने की तकलीफ का क्या किया जाए..

अब हमारे पास एक्स रे आईस तो है नहीं कि देख ले अन्दर झाँक कर क्या चल रहा है?

किलाईमेक्स का टाईम

अब किलाईमेक्स का टाईम आ गया है ठीक वैसे ही जैसे बर्खुर्दारो का किलाईमेक्स का टाईम आता है और वो पिक्चर ख़त्म कर देते है.. लेकिन शाहरुख़ खान के डायलोग 'पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!' की तर्ज पर उनके सिक्वल भी जल्दी आ जाते है.. पर ये किलाईमेक्स वैसा नहीं है ये चिटठा चर्चा वाला किलाईमेक्स है.. जब अनूप जी लिखते है अंत में.. और अंतत सब मोहित हो जाते है..

अनूप जी को मोहित करने की कला आती है.. उनकी एक लाईना
से सीख कर तो जेंटलमैनत्व को प्राप्त नौजवान, संस्कारी और उर्जावान (ऐसा हम नहीं कहते Source देखिये) शिव कुमार मिश्र ने बाकायदा अनूप जी के नाम के साथ एक लाईना लिख मारी थी.. हमने तो पहले ही कहा था कि अपनी इन एक लाईना का पेटेंट करवा लीजिये पर उन्होंने अपने विवेक से काम नहीं लिया.. और देखिये ना कितनी बड़ा नुकसान हुआ.. आज हर कोई उनके फोर्मेट को चुराकर एक लाईना लिख रहा है.. यकीन ना हो तो हमारे टिपण्णी बक्से की तरफ आँख उठाकर देखिये एक लाईनों से भरा पड़ा है..


Thursday, March 19, 2009

कवि मन को जिंदा रखने की एक साजिश..


जब देर रात तक
खामोशी बैठी
रही थी.. उस कमरे में
तुमने भी एक
नमी महसूस क़ी
होगी अपने सीने पर
एक दूसरे से लिपट कर
कितना रोए थे ना हम...


प्रेका मतलब सिर्फ़ पाना ही तो नही होता.. दे जाने में जो प्यार है उसकी खुमारी तो सांसो में घुल जाती है.. इतनी कोमल जैसे रूही का कोई फ़ाहा ले रखा हो हाथो में.. बस उसी को भिगो कर अपनी आँखो से सहला दे कोई गालो को तो ऐसा लगता है जैसे रेत हिचकोले खाती हुई बह रही है किनारों पर आती जाती हुई लहरो के संग.. बस उन्ही लहरो के साथ प्रेम के समंदर में डूब जाने का जो मज़ा है.. वो डिज्नीलैंड के रोलर कोस्टर में बैठकर भी नही पाता..







पर ये मज़ा और ये रोमांच सबको नही मिलता.. कुछ लोगो का किरदार बहुत छोटा होता है ज़िंदगी में.. हम खींचते रहते है.. धागे को.. वो ख़त्म ही नही होता.. फिर एक दिन लगता है अब खींचने से कुछ होगा नही. तो चलते चलते मुड जाते है किसी अलग मोड़ से.. फिर उस पर चलना भी तो ज़िंदगी है.. और जब चलते चलते कही ठहरते है तो पुरानी राह क़ी याद भी जाती है.. अब जो सांसो में घुला है.. प्यार तो उसमे भी है पर दो चार बूंदे मलाल क़ी दिख जाती है...

पता है जब घर
पहुँची तो एक
पायल वही छोड़ आई
अब एक पायल लेकर
घूमती हू पाँव में
काश क़ी वो पायल
मैं भूल आती नही
ये जोड़ी तो सलामत रहती..

Friday, March 13, 2009

छम्मक छल्लो.


कौन वो छम्मक छल्लो..

अरे तू भी कहा लेकर बैठ गया उसको.. आने दे हम निपट लेंगे उससे.. तू टेंशन मत ले उसकी.. भाई जी ने इतना बोलके माहोल को ठीक किया.. चाय का ऑर्डर दे दिया गया.. रेडियो पर मैच की कमेंट्री चल रही थी.. और ये मारा सचिन ने सिक्सर.. जय हो.. सब एक साथ चिल्लाए.. छोटू ज़रा आवाज़ तेज करियो रेडियो की..

खटाक और रेडियो बंद.. सबने नज़र उठाकर देखा.. सामने वो खड़ी थी..

"क्या देख रहा है बे?" आते ही वो गरजी

"जो देखना है वो दिखाएगी क्या?" लड़का बोला.. और सब उसकी मर्दानगी पर हो हो करके हँसने लगे..

पीली सलवार कमीज़ पहने एक लड़की पीछे खड़ी थी.. उस लड़की ने आगे बुलाया.. "मुझे बता कौन था इनमे से.."

"मैं था.. बोल के करेगी?" एक और बोला..

"तेरे बड़े हाथ चलते है.. लड़कियों पर," वो लड़की बोली

तुझपर भी चलाऊ क्या?

उस दिन तो बहुत बोल रहा तू मेरे कपड़ो के बारे में की ऐसे कपड़े पहनोगी तो छेड़ेंगे नही तो क्या करेंगे... आज तो सलवार कमीज़ पहनी थी इसने.. फिर क्या हो गया..

"तू कौन कलेक्टर है?.. ज़्यादा सती सावित्री ना बन.. सब खबर है मणे.." भाई जी बोले

तुझसे बात नही कर रही हूँ तू चुप कर..

क्यो चुप करे भाई.. तू कैसी है सब जानते है.. उस रात को होस्टल से तू भी तो गायब थी.. बड़ी आई वकालत करने..

तू अपने काम से मतलब रख.. इन लड़कियों को छेड़कर मर्द बनता है.. मुझे हाथ लगाता फ़िर देखती..

"लो बोलो ये देखती भी है.. मुझे तो लगा सिर्फ़ दिखाती होगी.." फिर से उसकी मर्दानगी पर सब ज़ोर से हँसे..

देख तू हमसे पंगा मत ले वरना बीच बाजार जो हालत करूँगा तेरी.. किसी को मुँह दिखाने लायक नही रहेगी..

और तू कर भी क्या सकता है.. लड़कियो के पीछे हाथ मारकर मर्द बनता है..

ए छोरी! बहुत हो गयी रे तेरी ठिकचिक ठिकचिक.. चल अभी रस्ता नाप वरना अभी तक तो सिर्फ़ हाथ मारा है..तू हमें जानती नही हम और भी क्या क्या कर सकते है

दीदी चलो.. पीछे खड़ी सलवार कमीज़ वाली लड़की बोली.. दीदी प्लीज़ चलो. मुझे कुछ नही करना..

सुन ले क्या बोल रही है वो.. और निकल ले यहाँ से..

"पहले माफी माँग इस से.." लड़की बोली

देख भई छम्मक छल्लो सीधी बात तो थारे भेजे में ना घुसे.. अब तू सुन मारी बात.. ये कॉलेज है शिक्षा का मंदिर.. यहाँ पर थारे जैसी छोरी की कोई जगह नही.. जो जीण पहने.. दारू पिए.. रात बिरात देर से होस्टल में घुसने वाली छोरी हमारे कॉलेज में तो ना पढ़ सके है.. क्यो भाइयो..

हा हा और क्या हमने तो सुना है.. कल रात चार चार लोंडो के साथ थी ये..

तमीज़ से बात कर साले वरना ज़बान खींच लूँगी..

"चुप कर साली !" भाई जी बोले
वीरू ज़रा बुला के ला रे सबको.. इसका फ़ैसला यही कर डालते है.. अब या तो ये रहेगी कॉलेज में या हम..

सारे लड़के लड़कियो को मैदान में इक्कठा कर लिया गया.. वीरू की गर्लफ्रेंड अपने साथ बाकी की लड़कियो को ले आई.. सारे लड़के लड़की आकर खड़े हो गये.. भाई जी उठा और लड़की के शॉर्ट टॉप की तरफ इशारा करके बोला.. ये देखो ये उघाडे बदन घूमने वाली छोरी मर्यादा की बात करती है.. जैसे कपड़े ये पहनती है.. उसका हमारी बहनो पे बुरा असर पड़ता है.. हम ऐसी छोरियों के कॉलेज में रहते पढ़ाई नही करेंगे..

पीले सलवार कमीज़ वाली लड़की की बहन भी आ गयी थी.. उस से दो साल सीनियर उसने आते ही भाई जी से माफी माँगी और अपनी बहन को ले गयी..

कितनी बार मना किया तुझे इस लड़की के साथ मत रहा कर..

पर दीदी वो..

चुप कर.. किसने कहा था अकेले क्लास रूम जाने को.. अगर घर पे पता चल गया ना तो इंजीनियर बनने के ख्वाब भूल जाना..

"भाईयो आप ही बताओ क्या ऐसी लड़की कॉलेज में रहनी चाहिए.." भाई जी की आवाज़ गूंजी

नही बिल्कुल नही.. सबने यही जवाब दिया.. जो कुछ नही कहना चाहते थे उन्होने भी नही कहना ही ठीक समझा..सारी लड़किया भी यही कह रही थी ऐसी लड़कियों को नही रहना चाहिए कोलेज में.. पीली सलवार कमीज़ वाली ने हाथ तो उठा रखा था पर नज़रे नही

"तो ठीक है फिर कल सुबह डाइरेक्टर तक अर्जी पहुँचा दी जाएगी.." इतना बोल के भाई जी उसकी तरफ़ मुडे

देख लिया हमसे भिड़ने का अंजाम.. कॉलेज से भी जाएगी और इज़्ज़त से भी.. और जे तू चाहती है इन लफडो में नही पड़ना.. तो भाई जी की बात मान और शाम को होस्टल के इक्कीस नंबर कमरे में आ जाना..तेरे सारे पाप धुल जायेंगे..

The End

Friday, March 6, 2009

जब ब्लोगरो ने खेली होली..

टॉम कहे चलो होलियाए
डिक कहे चलो होलियाए
हैरी कहे चलो होलियाए
हम कहा चलो हम भी होलियाए..

उपरोक्त पंक्तियो का किसी भी घटना या किसी व्यक्ति से संबंध है तो सही.. पर किस से है ये पता नही चल पा रहा है.. पता चलते ही आपको सूचित किया जायेगा..


तो जी बात ऐसी है.. कि कल शायद हम खिसकले अपनी जन्मभूमि जोधपुर क़ी ओर.. और लौट कर तो होली बाद ही आएँगे.. तो फिर होली खेलने का चानस कैसे जाने दे.. तो हमने फ़ैसला किया है.. क़ी हम एक ठेला लेकर उसमे गुलाल सुलाल डालकर जा रहे है होली खेलने.. कहाँ? अजी ब्लॉगीवूड़ में.. तो आप हो जाइए तैयार.. हम आ रहे है ठेला लेकर..

ठेले में हर तरह के गुलाल लेकर होली खेले रघुवीरा टाइप गाना गाते हुए हम जा पहुँचे शिव कुमार मिश्रा जी के यहाँ.. मिश्रा जी बैठे बैठे गुझिया बना रहे थे.. हमे देखते ही बोले "कूस (कुश) कैसे हो भई?" हमने कहा जी मेल मिलाप तो होता रहेगा.. पर आप आज बचेंगे नही.. ये कहके हमने उनके माथे पर तिलक लगा दिया..

हमको तिलक लगाता देखते ही अनिल पुसदकर जी आ गये.. आते ही गरजे अरे भई ये क्या? तिलक क्यो लगा रहे हो पानी से खेलो.. कोई सुखी होली नही चलेगी.. हमने कहा ऐसी बात नही है अनिल जी होली तो अपुन भी पानी से खेल ले.. पर क्या है क़ी मंदी है थोड़ी पहले ही.. रंग उतारने में जो साबुन लगेगा वो बड़ा महंगा पड़ेगा..

हमारी बात मानकर वो भी साथ में हो लिए.. ओर हम पहुचे ज्ञान जी के घर.. बाहर छोटे छोटे पिल्ले बैठे थे.. हमने उनसे बचते बचाते घंटी बजाई.. अंदर से आवाज़ आई कौन? अपने मिसिर जी बोले भैया मैं,आपका लक्ष्मण.. इतना सुनते ही ज्ञान जी बाहर आए ओर हमने गुलाल लेकर उनके गालो पर लगाया.. वो बोले अरे ये कही नकली गुलाल तो नही.. हिन्दुस्तान में प्रति वर्ष तीनसौ क्विंटल नकली गुलाल का उत्पादन होता है.. अगर क्रम यही रहा तो.... हमने बात बीच में ही काटी अरे सर जी आप क्यो चिंता करते है.. स्किन को कुछ हो भी गया तो अपने डा अनुराग कब काम आएँगे... आख़िर हमारे लिए ही तो वो डर्मेटोलॉजिस्ट बने..

हमारी बात मान कर ज्ञान जी भी हो लिए हमारे साथ.. ओर दोनो हाथ जेब में डालकर चल पड़े .. डा अनुराग बाहर बैठे मिल गये हमको.. हमने पूछा डा साहब बाहर क्या कर रहे है.. तो उन्होने कहा..
रोज़ ज़िंदगी लिख देती है फ़लसफ़े
ईमान क़िस्सो में भी अब नही मिलते

आईने में एक शख्स नज़र आता है मुझे...

मिसिर जी ओर ज्ञान जी एक दूसरे क़ी तरफ देखने लगे.. हम आगे गये ओर उनके माथे पर तिलक लगाया.. डा साहब बोले होली तो हम होस्टल में खेलते थे अब तो केवल रस्म अदायगी होती है.. पर हम तो ऐसे नही खेलेंगे .. इतना बोलके उन्होने पास में पड़ी कलर वाले पानी क़ी बाल्टी हमारे ऊपर डाल दी.. ये देखते ही अनिल जी खुश हो गये.. बोले साधु वाद आपको..

साधु वाद क़ी बात आते ही हम समीर जी के घर क़ी ओर निकले.. ज्ञान जी ने कहा उनके लिए एक्स्ट्रा गुलाल लेना पड़ेगा.. तो ओर गुलाल लिया गया.. जैसे ही समीर जी के यहा पहुँचे तो पता चला वो तो पहले ही होली खेल रहे थे.. सभी जबलपुर भाइयो के साथ.. वही हमे महेंद्र मिश्रा जी, बवाल भाईसाहब सब मिल गये.. सबने एक दूसरे को रंग लगाया.. समीर जी बोले अब तो हम कुछ सुनाएँगे होली पर..

कभी ना भूलना यार मेरी बोली
त्योहारों में एक ही त्यौहार है होली
त्योहारों में एक ही त्यौहार है होली
तो फिर चल पड़ी है यारो क़ी टोली..

सभी बहुत उम्दा, वाह, सुंदर अभिव्यक्ति टाइप कहने लगे.. इतने में अनूप शुक्ल जी सड़क के उस तरफ से आते दिखे.. हमने कहा आप वहा क्या कर रहे थे.. वे बोले समीर जी के गाना ख़त्म करने का इंतेज़ार..

ओर सभी ठहाका मार कर हंस पड़े.. समीर जी भी मुस्कुराने लगे ओर मुस्कुराते हुए उन्होने अनूप जी के गाल खींचते हुए कहा ''यू नॉटी बॉय" इस पर अनूप जी बोले अजी हम कहा नॉटी बॉय है.. नॉटी बॉय तो अभी टंकी पर बैठा है..

इतने में मिसिर जी बोले अरे भई टंकी से उतारो उसको वरना कही टंकी के पानी में रंग वॅंग मिला दिया तो शाम को सोडे से काम चलाना पड़ेगा.. ओर सभी पहुँच गये विवेक बाबू को पकड़ने टंकी पर..

सबने रिकवेस्ट क़ी पर विवेक नीचे नही उतरे.. तब अपने अनुराग जी ने कहा अरे ये नीचे पाँच का सिक्का किसका पड़ा है.. इतना सुनते ही विवेक बोले अरे शायद मेरा गिर गया होगा.. रूको मैं अभी लेता हू.. ओर जैसे ही वो नीचे आए सबने उनको रंग दिया.. समीर जी भी आगे आए ओर विवेक के माथे पर रंग लगाया ओर गले मिलते हुए बोले हेप्पी होली...

इतने में अमर कुमार जी आ गये.. बोले यार मेरी कॉफी अटका के कहा चले गये तुम .. हमने कहा डा साहब कॉफी भी पिलाएँगे.. पहले होली तो मना ले.. इतना बोलके सबने एक एक करके डा साहब को रंग लगाया.. ज्ञान जी बोले भई मैं तो गले मिलकर बधाई दूँगा.. ओर दोनो ने गले मिलकर एक दूसरे को बधाई दी..

बधाई चल ही रही थी.. इतने में किसी कुत्ते के भोंकने क़ी आवाज़ आई.. ज्ञान जी बोले कही मेरे घर के पिल्ले पीछे पीछे तो नही आ गये.. पर ऐसा नही था.. ये तो अपना बीनू फिरंगी था. जो भोंक भोंक कर शायद ये कह रहा हो क़ी बा अदब बामुलाहिजा होशियार.. ठगो के सरदार पहेलियो के असरदार ताऊ पधार रहे है..

ताऊ अपनी रामप्यारी पर बैठे सबपर गुलाल फेंकते फेंकते आ रहे थे.. जैसे पास में आए सबने मिलकर ताऊ को पकड़ लिया ओर खूब गुलाल लगाया.. ताऊ क़ी ही दूसरी भैंस पर बैठा था अपना पी डी.. जब हमने कहा नीचे उतरो तो बोला हमारी टाँग में सूजन है.. इसलिए नही आ सकते.. सबने कहा कोई बात नही ओर सबने पी डी को भैंस पर बैठे बैठे ही रंग लगा दिया..

इतने में अपना अभिषेक आ गया.. आते ही अभिषेक ने कहा आप क़ी गिनती तो बढ़ती जा रही है.. समय के हिसाब से अगर मैं लोगो का गुना करू तो थोड़ी देर में यहा ओर लोगो आने वाले है.. ओर दिल से दिल क़ी जोड़ तो बहुत रंग लाएगी.. इस पर समीर जी बोले यार तुम यहा भी गणित ले आए.. आज तो होली है.. इतना बोलके समीर जी ने अभिषेक को रंग लगाया..

सब ये हल्ला कर ही रहे थे.. क़ी रचना जी आ गयी.. गुस्से में बोली.. आप सब पुरुष लोग अकेले अकेले होली खेलने आ गये.. कम से कम आज तो हम महिलाओ को समानता का अधिकार दे दीजिए.. इस पर डा अमर कुमार जी बोले अजी अधिकार तो आपका है ही मांगिए मत छीन लीजिये.. ओर सभी ठहाका मार के हंस पड़े.. हमने भी रचना जी को गुलाल लगाया.. वे बोली बाकी क़ी भी सब बहनिया साथ ही है..

इतना कहते ही सभी लेडीज़ ब्लॉगरणिया भी आ गयी.. ताऊ जी भैंस के पास खड़े होकर बोले.. सु.सीमा जी कही दिखाई नही दे रही है.. इतना सुनते ही सबने एक बार फिर ठहाका लगाया... समीर जी बोले क्यो ताऊ आते ही अपने संपादको को ढूँढने लगे अपने दोस्तो को भूल गये.. भाटिया जी ओर योगेंद्र मौदगिल जी के बारे में तो पूछा ही नही..

ताऊ बोले अरे ऐसी बात नही है.. वो तो कब से वहा बैठकर ठंडई बना रहे है.. वो भी जर्मन स्टाइल में.. ये सुनते ही होली का रंग दुगुना हो गया..

भीड़ में हमे एक लंबा साया दिखा.. जब गौर से देखा तो पता चला रंजना भाटिया जी थी.. हाथ में अमृता प्रीतम क़ी किताब लेकर आई थी.. इस पर कंचन जी बोली बोली अरे रंजू जी आप यहाँ पर भी अमृता जी को साथ ले आई..

ममता जी बोली अरे तो क्या हो गया. इसी बहाने अमृता जी भी हमारे साथ होली खेल लेगी.. तभी पीछे से पूजा चिल्लाई अरे सब लोग मुझे तो भूल ही गये.. मैं भी तो हू यहाँ.. इतना सुनते ही सबने देखा पी डी भैंस से उतर चुका है.. सबने पी डी को वापस भैंस पर बिठाया..

किसी ने कहा गुलाल ख़त्म हो गया.. ये लो आ गया गुलाल.. सबने मुड़कर देखा तो अरुण पंगेबाज जी आ गये थे साथ में वकील साहब दिनेश जी भी थे.. उनके आते ही एक सकारात्मक उर्जा का संचार हुआ.. सब लोग खुश हो गये.. तरह तरह के गुलाल आ गये थे. .सबने एक दूसरे को रंग लगाया..

ओर सब साथ मिलकर चल पड़े अरविंद मिश्रा जी के घर.. जैसे ही उनके घर पहुँचे तो देखा मिश्रा जी घर पर देव डी फिल्म देख रहे थे.. सबने उनको वही पकड़ लिया और गुलाल लगा दिया.. उनके माथे से लेकर गर्दन और हाथ से आते आते उनके पाँव तक गुलाल दिया.. वो बोले यार पूरे शरीर पर रंग लगा दिया.. अब तो दोबारा पर्यवेक्षण करना पड़ेगा..

इस तरह वो भी हमारी टोली में शामिल हो गये.. इतने में कोई बोला अरे मसिजीवी परिवार तो कही नज़र नही आ रहा.. उनके घर पहुँचे तो पता चला आज चिट्ठा चर्चा करने क़ी बारी उनकी थी.. तो वो आपस में तय नही कर पा रहे थे क़ी कौन चर्चा करे..

अनूप जी बोले इसमे कौनसी बड़ी बात है.. आप अख़बार में आपका भविष्यफल पढ़ लीजिए क़ी आज आपके भविष्य में चर्चा करना लिखा है क़ी नही.. इस पर मसिजीवी जी ने ज़ोर से ठहाका लगाया.. हालाँकि वो रंगे हुए चेहरो में पहचान नही पाए.. संगीता पूरी जी भी हमारे साथ थी.. पर संगीता जी ने कहा.. परिवार में हँसी ठिठोली नही होगी तो कहाँ होगी.. ज़रूरी थोड़े ही है क़ी परिवार में सबकी सोच समान हो.. आज तो होली है.. रंग लगाओ ओर खुशिया मनाओ..

इतना सुनते ही सब ज़ोर से बोले होली है.. नीलिमा जी और सुजाता जी सबके लिए पकोडे लेकर आ गये.. सबने पकोडे खाकर ही आगे जाने का प्रोग्राम बनाया..

पकोडे खाने के बाद सभी बाहर निकले ही थे क़ी सामने से पुलिस क़ी जीप आती हुई दिखाई दी.. ताऊ जी पीछे हो लिए उन्हे लगा गोटू सुनार पुलिस लेकर आ गया.. पर जब देखा तो उसमे से पल्लवी जी निकली. पल्लवी जी उतरते ही बोली अरे आप लोग कहाँ गायब थे मैने सब जगह देख ढूँढा आपको..

समीर जी बोले.. अरे हम तो यहा बैठे पकोडे खा रहे थे.. खैर अब आ ही गयी तो होली तो खेल ही लेते है.. पी डी ने फिर नीचे उतरने क़ी कोशिश क़ी पर सबने वापस भैंस पर बिठा दिया..

पल्लवी जी के आते ही माहौल और जम गया.. उन्होने आते ही जोरदार गाना गया.. रंग बरसे भीगे चुनर वाली.. ओर सभी ने उस पर डांस करना शुरू किया.. ज्ञान जी तो दोनो हाथ उठाकर डांस कर रहे थे.. अनुराग जी ने भी समीर जी के साथ ठुमके लगा लिए.. मिसिर जी और ताऊ पत्नग उड़ाने वाली स्टाइल में नाच रहे थे.. लेडीज़ गेंग ने घूमर शुरू कर दिया.. अनूप जी नागिन स्टाइल वाला डांस करने लगे.. अनिल जी और वकील साहब भी कहा पीछे रहने वाले थे.. अरुण जी और मसिजीवी भी जोश में आ गये.. अभिषेक और हम ढोलकी पे थाप देने लग गये..हमारे साथ अमर कुमार जी भी आ गये..

पी डी भैंस पर बैठे बैठे ही डांस कर रहा था.. कुल मिलकर पूरा मस्ती का माहौल था.. सभी होली के रंगो में घुल गये थे.. ओर बड़ी धमाकेदार परफॉर्मेंस चल रही थी..

तभी वहा पर सुशील कुमार छौक्कर ओर सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी जी भी आ गये.. आते ही बोले अकेले अकेले डांस हो रहा है.. हम भी करेंगे.. ओर वे भी हो लिए साथ में.. सबने सुशील जी से पूछा.. बिटिया कहा है? तो उन्होने कहा वो तो वहा आदित्य, लवीजा ओर मिष्टी के साथ होली खेल रही है... इतना सुनते ही सब वहा निकल पड़े.. आदि पलटी मार मार कर होली खेल रहा था.. लवी बिटिया बुढ़िया के बाल खा रही थी.. ओर मिष्टी बिटिया नीरज जी के कंधे पर बैठ के डांस कर रही थी..

वहा पहुँचते ही नीरज जी ने होली पर अपने गुरु प्राण साहब क़ी रहनुमाई में लिखी हुई ग़ज़ल सुना दी सबको..

ब्लॉगर गण मिलकर आज मना लो होली
जब फ्री हो जाओ तो आ जाना खोपोली..

सबने मिलकर नीरज जी को रंग लगाया.. सबको इस तरह से खुश देखकर लावन्या जी को अपने बचपन के दिन याद आ गये जब वे अमिताभ बच्चन ओर लता जी के साथ होली खेला करती थी.. लेकिन मीनाक्षी जी ने उन्हे कहा अरे ब्लॉगर बच्चन नही है तो क्या हुआ.. दूसरे तो ब्लॉगर है.. इतना सुनकर लावन्या जी बोली बिल्कुल सही कहा..

ओर सब हंसते हँसते जा पहुंचे ब्लॉगवानी के ऑफीस वहा पहुँचते ही मैथिली जी और सिरिल बाबू आ गये पकड़ में सबने उनको रंग लगाया.. और ब्लॉगवानी साईट बनाने के लिए धन्यवाद दिया.. जिसके कारण आज सभी लोग एक परिवार से लगते है..

बस फिर वही ब्लॉगवानी के ऑफीस में भाटिया जी और मौदगिल जी ठंडाई लेकर आ गये ओर सबने खूब छककर ठंडाई पी.. अंत तक गज़लो का, गीतो का.. डांस का दौर चलता रहा.. ओर सभी एक दूसरे को होली क़ी शुभकामनाए देते रहे..

सबसे आख़िर में मैने सबसे कहा.. आप सभी को रंगो के इस पर्व क़ी बहुत बहुत बधाई.. ये होली आपके जीवन में नये रंग लेकर आए.. इस होली पर जम कर होली खेले.. अपने घर के बच्चो को इस त्योहार का महत्त्व बताए.. होली पर केमिकल युक्त रंगो का प्रयोग ना करे.. होली सूखी खेले या गीली.. पानी का कम से कम उपयोग करे.. इसी के साथ आप सभी को होली की अग्रिम शुभकामनाये..