दस पैतालीस की आखिरी मेट्रो थी.. द्वारका से इन्द्रप्रस्थ की तरफ जा रहा था.. कैब आई नहीं थी तो मेट्रो ही लास्ट आप्शन था.. मैं ट्रेन में जाकर बैठ गया.. हाथ में राहेजा की किताब 'एनिथिंग फॉर यु मेम थी.' मैं किताब पढ़ रहा था.. जनकपुरी स्टेशन आया ट्रेन रुकी और फिर चल पड़ी.. मुझे पता भी नहीं चलता ट्रेन में कौन चढा अगर वो आकर मुझे मेरे मोबाइल के बारे में नहीं बताती.. मेरा मोबाइल नीचे गिरा हुआ था.."थैंक्स "...मैंने कहा..
इट्स ओके ..
मुझे अजीब लगा पर वो मुझे देख रही थी.. ट्रेन में बहुत कम लोग थे और सब काफी दूर दूर बैठे थे.. जगह होने के बाद भी वो मेरे बगल में आकर बैठ गयी..
" कहा जा रहे हो.. ? " उसने पुछा..
मैं.. ! इन्द्रप्रस्थ..
और आप?
वहा तक जहा ये मेट्रो नहीं जाती..
मैं समझा नहीं..
समझदार लगते भी नहीं हो..
मतलब ?
देखा..! नहीं समझे न मतलब इसी लिए कहा था..
मैं समझ नहीं पा रहा था वो क्या कह रही थी.. मैंने अपनी आँखे फिर किताब में घुसा ली..
क्या करते हो? वो बोली..
जी मैं कॉल सेंटर में काम करता हूँ..
अरे मैं भी तो वही करती हु..
आप ?
हा ऑर क्या तुम कॉल बॉय हो और मैं कॉल गर्ल..
व्हाट?
मेरे बिलकुल करीब एक कॉल गर्ल बैठी थी.. उसे देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा था.. मुझे थोडी हिचकिचाहट हुई मैंने आस पास नज़र उठाकर देखा किसी की नज़र हमारी तरफ नहीं थी.. मैंने किताब बंद करके रख दी..
खुद को मुझसे कम्पेयर मत करो.. मैं तुम्हारी तरह नहीं हु..
क्यों ऐसा क्या अलग करते हो तुम? तुम्हारा क्या काम है ?
मैं फ़ोन पर, कस्टमर्स को होने वाली प्रोब्लम का सॉल्यूशन बताता हु..
तो मैं भी तो वही करती हूँ.. तुम्हारा काम भी ग्राहक को खुश रखना है और मेरा काम भी..
वेरी स्मार्ट..! लेकिन तुम जिसके लिए ये काम करती हो मैं उसके लिए नही करता..
मैं तो पैसे के लिए करती हूँ.. तुम किसके लिए करते हो?
मैं भी पैसो के लिए ही करता हूँ.. लेकिन...
लेकिन वेकिन क्या .. ही बताओ क्या फर्क है..
अरे कैसी बात कर रही हो .. हमारा काम सिस्टेमेटिक होता है.. हमारे टारगेट्स होते है जो हमें हमारा बॉस देता है.. हर महीने का एक टारगेट होता है..
अरे तो मैं तो यही करती हूँ.. तुम्हारा तो एक महीने का टारगेट है मुझे तो रोज़ का टार्गेट मिलता है.. ये जो मेरा पेट है ना रोज सुबह, इसको शाम तक भरने का टारगेट देता है.. मैं तो इसी के लिए काम करती हूँ.. यही मेरा बॉस है..
हुह.. मजाक अच्छा है ..
क्या करे.. मेरी लाइफ सबको मजाक ही लगती है..

नहीं मेरा वो मतलब नहीं था.. मैं समझ सकता हु दिल्ली जैसे शहर में कैसे सर्वाइव करते है.. मेरी शादी हो चुकी है पर अपना घर तक नहीं है... सच कहू तो हमारे जैसे लोगो का शादी करना आसान है पर घर.. घर बनाना बहुत मुश्किल.. तुमको नहीं लगता ?
बिल्कुल नही बल्कि हमारे जैसे लोगो के लिए घर बनाना आसान है पर शादी करना बहुत ही मुश्किल.. तुमको नहीं लगता ?
जिस तरह से जवाब दे रही थी.. मैं हैरत में था..
समझ सकता हूँ.... मेरी दोस्त बनोगी? मैंने कहा..
दोस्त ?
क्यों क्या हुआ?
पता नहीं.. पर इस वर्ड से कोई दोस्ती नहीं है मेरी.. दोस्त तो कई मिले पर सबको एक ही चीज़ चाहिए थी.. तुमको नहीं चाहिए ?
क्या?
या तो तुम बहुत बेवकूफ हो या फिर बहुत शातिर..!
अरे ये क्या बात हुई.. ठीक है मत बनो दोस्त..
नहीं नहीं ऐसा नहीं है.. चलो ठीक है दोस्ती पक्की..
ऑर उसने हाथ आगे बढाया.. उससे हाथ मिलाते ही एक अजीब सी सनसनी फ़ैल गयी.. अब तक तो ऐसी कोई फिलिंग थी नहीं पर उसका हाथ थामते ही एक अजीब सी बैचेनी होने लगी.. बहुत देर तक मैं चुप रहा.. बार बार हम दोनों की नज़रे एक दुसरे से मिल ही जाती थी..
अगला स्टेशन करोल बाग़ था.. गेट खुलते ही एक ठंडी हवा का झोंका अन्दर आया.. वो मेरे और करीब आ चुकी थी.. मैं नहीं जानता था मुझे क्या हो रहा है.. दो चार लोग और उतर गए थे..
कुछ बात है जो शायद तुम कह नहीं पा रहे हो.. वो बोली
न न नहीं ऐसी कोई बात नहीं..
अब जब दोस्त कह ही दिया है तो बोल दो..
सच में कुछ भी तो नहीं है..
जैसी तुम्हारी मर्ज़ी..
वो कैसे सब कुछ जानती थी थोडी ही देर में हम लोग उतरने वाले थे.. मैं कोशिश कर रहा था कि जितना जल्दी हो मैं उसे कह सकु..
वो मेरी तरफ मुडी और मैंने उससे कहा क्या तुम मेरे साथ....
उसका चेहरा थोडा बदल चुका था.. गले में एक हलचल देखी मैंने.. वो बोली
मगर तुमने तो मुझे दोस्त कहा था.. और तुम भी??
प्लीज मुझे गलत मत समझना.. तुमको देखकर एक ख्याल आया बस.. तुम न भी चाहो तो कोई बात नहीं हमारी दोस्ती ऐसी ही रहेगी..
तुम्हारी बीवी भी तो है घर पे ?
हाँ है मगर..
मगर क्या ?
तुम नहीं समझोगी.. जाने दो..
हुह.. मैं सब समझ समझती हूँ डियर.
नहीं तुम मुझे गलत समझ रही हो मैं सिर्फ तुम्हारा दोस्त हूँ और दोस्ती के रिश्ते से ही चाहता हूँ.. मेरे लिए तुम कोई कॉल गर्ल नहीं हो..
वाह.. क्या बात कही है.. अच्छे घर के लगते हो ?
थैंक्स.. !
हुह.. मैंने कहा न कुछ नहीं समझते हो..
वो सब छोडो तुम ये बताओ हाँ कि ना ? मैंने पुछा..
ठीक है.. अब जब दोस्त बोल ही दिया है तो ठीक है मगर एक बात याद रखना ये मैं पैसो के लिए नहीं कर रही हूँ..
जानता हूँ.. लेकिन कहाँ पर? ट्रेन में तो पोसिबल नहीं है..
ट्रेन नहीं डफर स्टेशन पर.. मंडी हाउस वाले स्टेशन पर..
उसके बाद जो कुछ हुआ वो तो तू जानता ही है.. और क्या बताऊ..
साले चैम्प तू नहीं सुधरेगा..तेरा रोज़ का है ये..
अबे सुधरने के लिए तो सारी ज़िन्दगी पड़ी है.. पर बिगड़ने की उम्र तो यही है.. देख ले आज ये निन्यानवे नंबर की थी.. बस इस शनिवार को सेंचुरी मार लेंगे..
तू भी साले पुरा कमीना है.. अच्छा ये बता उसका नंबर शम्बर लिया या नहीं कुछ हमारा भी भला कर देता..
नहीं यार उसने दिया नहीं.. पर मेरा नंबर उसने लिया है वो मुझे कर लेगी फोन..
बीप! बीप! बीप! बीप!
मेसेज आया लगता है..
देख तो कही उसी का तो नहीं..
देखता हु..
क्या हुआ बे.. क्या हुआ? कुछ बोलता क्यों नहीं? क्या लिखा है.. क्या हुआ?
" तुम्हारे साथ वाली कल की रात.. बहुत ही बढ़िया थी.. ठीक वैसी ही जैसे आज से सात महीने पहले इसी ट्रेन में मुझे एक दोस्त मिला था.. जिसने मेरी दोस्ती का ग़लत फायदा उठाया.. और मुझे ये बीमारी दी .. उसके बाद से कई बार यहाँ आई हूँ.. उसके जैसे और भी मिलते है.. तुम भी मिले.. पता है तुम निन्यानवे थे.. इस शनिवार को सेंचुरी हो जायेगी..."


