Thursday, March 19, 2009

कवि मन को जिंदा रखने की एक साजिश..


जब देर रात तक
खामोशी बैठी
रही थी.. उस कमरे में
तुमने भी एक
नमी महसूस क़ी
होगी अपने सीने पर
एक दूसरे से लिपट कर
कितना रोए थे ना हम...


प्रेका मतलब सिर्फ़ पाना ही तो नही होता.. दे जाने में जो प्यार है उसकी खुमारी तो सांसो में घुल जाती है.. इतनी कोमल जैसे रूही का कोई फ़ाहा ले रखा हो हाथो में.. बस उसी को भिगो कर अपनी आँखो से सहला दे कोई गालो को तो ऐसा लगता है जैसे रेत हिचकोले खाती हुई बह रही है किनारों पर आती जाती हुई लहरो के संग.. बस उन्ही लहरो के साथ प्रेम के समंदर में डूब जाने का जो मज़ा है.. वो डिज्नीलैंड के रोलर कोस्टर में बैठकर भी नही पाता..







पर ये मज़ा और ये रोमांच सबको नही मिलता.. कुछ लोगो का किरदार बहुत छोटा होता है ज़िंदगी में.. हम खींचते रहते है.. धागे को.. वो ख़त्म ही नही होता.. फिर एक दिन लगता है अब खींचने से कुछ होगा नही. तो चलते चलते मुड जाते है किसी अलग मोड़ से.. फिर उस पर चलना भी तो ज़िंदगी है.. और जब चलते चलते कही ठहरते है तो पुरानी राह क़ी याद भी जाती है.. अब जो सांसो में घुला है.. प्यार तो उसमे भी है पर दो चार बूंदे मलाल क़ी दिख जाती है...

पता है जब घर
पहुँची तो एक
पायल वही छोड़ आई
अब एक पायल लेकर
घूमती हू पाँव में
काश क़ी वो पायल
मैं भूल आती नही
ये जोड़ी तो सलामत रहती..

Friday, March 13, 2009

छम्मक छल्लो.


ये कहानी है मेरी एक शोर्ट फ़िल्म की जो मैंने अभी शुरू की है.. .इस से पहले मेरी जिन कहानियो पर शोर्ट फिल्म्स बना चुका हु वे है.. पन्ने हवा में अभी भी उड़ रहे थे.., ज़िन्दगी कभी यू भी मुड़ जाती है.., एक सिगरेट और जल गई.. अब शुरू करते है मेरी नई फ़िल्म की कहानी














कौन वो छम्मक छल्लो..

अरे तू भी कहा लेकर बैठ गया उसको.. आने दे हम निपट लेंगे उससे.. तू टेंशन मत ले उसकी.. भाई जी ने इतना बोलके माहोल को ठीक किया.. चाय का ऑर्डर दे दिया गया.. रेडियो पर मैच की कमेंट्री चल रही थी.. और ये मारा सचिन ने सिक्सर.. जय हो.. सब एक साथ चिल्लाए.. छोटू ज़रा आवाज़ तेज करियो रेडियो की..

खटाक और रेडियो बंद.. सबने नज़र उठाकर देखा.. सामने वो खड़ी थी..

"क्या देख रहा है बे?" आते ही वो गरजी

"जो देखना है वो दिखाएगी क्या?" लड़का बोला.. और सब उसकी मर्दानगी पर हो हो करके हँसने लगे..

पीली सलवार कमीज़ पहने एक लड़की पीछे खड़ी थी.. उस लड़की ने आगे बुलाया.. "मुझे बता कौन था इनमे से.."

"मैं था.. बोल के करेगी?" एक और बोला..

"तेरे बड़े हाथ चलते है.. लड़कियों पर," वो लड़की बोली

तुझपर भी चलाऊ क्या?

उस दिन तो बहुत बोल रहा तू मेरे कपड़ो के बारे में की ऐसे कपड़े पहनोगी तो छेड़ेंगे नही तो क्या करेंगे... आज तो सलवार कमीज़ पहनी थी इसने.. फिर क्या हो गया..

"तू कौन कलेक्टर है?.. ज़्यादा सती सावित्री ना बन.. सब खबर है मणे.." भाई जी बोले

तुझसे बात नही कर रही हूँ तू चुप कर..

क्यो चुप करे भाई.. तू कैसी है सब जानते है.. उस रात को होस्टल से तू भी तो गायब थी.. बड़ी आई वकालत करने..

तू अपने काम से मतलब रख.. इन लड़कियों को छेड़कर मर्द बनता है.. मुझे हाथ लगाता फ़िर देखती..

"लो बोलो ये देखती भी है.. मुझे तो लगा सिर्फ़ दिखाती होगी.." फिर से उसकी मर्दानगी पर सब ज़ोर से हँसे..

देख तू हमसे पंगा मत ले वरना बीच बाजार जो हालत करूँगा तेरी.. किसी को मुँह दिखाने लायक नही रहेगी..

और तू कर भी क्या सकता है.. लड़कियो के पीछे हाथ मारकर मर्द बनता है..

ए छोरी! बहुत हो गयी रे तेरी ठिकचिक ठिकचिक.. चल अभी रस्ता नाप वरना अभी तक तो सिर्फ़ हाथ मारा है..तू हमें जानती नही हम और भी क्या क्या कर सकते है

दीदी चलो.. पीछे खड़ी सलवार कमीज़ वाली लड़की बोली.. दीदी प्लीज़ चलो. मुझे कुछ नही करना..

सुन ले क्या बोल रही है वो.. और निकल ले यहाँ से..

"पहले माफी माँग इस से.." लड़की बोली

देख भई छम्मक छल्लो सीधी बात तो थारे भेजे में ना घुसे.. अब तू सुन मारी बात.. ये कॉलेज है शिक्षा का मंदिर.. यहाँ पर थारे जैसी छोरी की कोई जगह नही.. जो जीण पहने.. दारू पिए.. रात बिरात देर से होस्टल में घुसने वाली छोरी हमारे कॉलेज में तो ना पढ़ सके है.. क्यो भाइयो..

हा हा और क्या हमने तो सुना है.. कल रात चार चार लोंडो के साथ थी ये..

तमीज़ से बात कर साले वरना ज़बान खींच लूँगी..

"चुप कर साली !" भाई जी बोले
वीरू ज़रा बुला के ला रे सबको.. इसका फ़ैसला यही कर डालते है.. अब या तो ये रहेगी कॉलेज में या हम..

सारे लड़के लड़कियो को मैदान में इक्कठा कर लिया गया.. वीरू की गर्लफ्रेंड अपने साथ बाकी की लड़कियो को ले आई.. सारे लड़के लड़की आकर खड़े हो गये.. भाई जी उठा और लड़की के शॉर्ट टॉप की तरफ इशारा करके बोला.. ये देखो ये उघाडे बदन घूमने वाली छोरी मर्यादा की बात करती है.. जैसे कपड़े ये पहनती है.. उसका हमारी बहनो पे बुरा असर पड़ता है.. हम ऐसी छोरियों के कॉलेज में रहते पढ़ाई नही करेंगे..

पीले सलवार कमीज़ वाली लड़की की बहन भी आ गयी थी.. उस से दो साल सीनियर उसने आते ही भाई जी से माफी माँगी और अपनी बहन को ले गयी..

कितनी बार मना किया तुझे इस लड़की के साथ मत रहा कर..

पर दीदी वो..

चुप कर.. किसने कहा था अकेले क्लास रूम जाने को.. अगर घर पे पता चल गया ना तो इंजीनियर बनने के ख्वाब भूल जाना..

"भाईयो आप ही बताओ क्या ऐसी लड़की कॉलेज में रहनी चाहिए.." भाई जी की आवाज़ गूंजी

नही बिल्कुल नही.. सबने यही जवाब दिया.. जो कुछ नही कहना चाहते थे उन्होने भी नही कहना ही ठीक समझा..सारी लड़किया भी यही कह रही थी ऐसी लड़कियों को नही रहना चाहिए कोलेज में.. पीली सलवार कमीज़ वाली ने हाथ तो उठा रखा था पर नज़रे नही

"तो ठीक है फिर कल सुबह डाइरेक्टर तक अर्जी पहुँचा दी जाएगी.." इतना बोल के भाई जी उसकी तरफ़ मुडे

देख लिया हमसे भिड़ने का अंजाम.. कॉलेज से भी जाएगी और इज़्ज़त से भी.. और जे तू चाहती है इन लफडो में नही पड़ना.. तो भाई जी की बात मान और शाम को होस्टल के इक्कीस नंबर कमरे में आ जाना..तेरे सारे पाप धुल जायेंगे..

The End

Friday, March 6, 2009

जब ब्लोगरो ने खेली होली..

टॉम कहे चलो होलियाए
डिक कहे चलो होलियाए
हैरी कहे चलो होलियाए
हम कहा चलो हम भी होलियाए..

उपरोक्त पंक्तियो का किसी भी घटना या किसी व्यक्ति से संबंध है तो सही.. पर किस से है ये पता नही चल पा रहा है.. पता चलते ही आपको सूचित किया जायेगा..


तो जी बात ऐसी है.. कि कल शायद हम खिसकले अपनी जन्मभूमि जोधपुर क़ी ओर.. और लौट कर तो होली बाद ही आएँगे.. तो फिर होली खेलने का चानस कैसे जाने दे.. तो हमने फ़ैसला किया है.. क़ी हम एक ठेला लेकर उसमे गुलाल सुलाल डालकर जा रहे है होली खेलने.. कहाँ? अजी ब्लॉगीवूड़ में.. तो आप हो जाइए तैयार.. हम आ रहे है ठेला लेकर..

ठेले में हर तरह के गुलाल लेकर होली खेले रघुवीरा टाइप गाना गाते हुए हम जा पहुँचे शिव कुमार मिश्रा जी के यहाँ.. मिश्रा जी बैठे बैठे गुझिया बना रहे थे.. हमे देखते ही बोले "कूस (कुश) कैसे हो भई?" हमने कहा जी मेल मिलाप तो होता रहेगा.. पर आप आज बचेंगे नही.. ये कहके हमने उनके माथे पर तिलक लगा दिया..

हमको तिलक लगाता देखते ही अनिल पुसदकर जी आ गये.. आते ही गरजे अरे भई ये क्या? तिलक क्यो लगा रहे हो पानी से खेलो.. कोई सुखी होली नही चलेगी.. हमने कहा ऐसी बात नही है अनिल जी होली तो अपुन भी पानी से खेल ले.. पर क्या है क़ी मंदी है थोड़ी पहले ही.. रंग उतारने में जो साबुन लगेगा वो बड़ा महंगा पड़ेगा..

हमारी बात मानकर वो भी साथ में हो लिए.. ओर हम पहुचे ज्ञान जी के घर.. बाहर छोटे छोटे पिल्ले बैठे थे.. हमने उनसे बचते बचाते घंटी बजाई.. अंदर से आवाज़ आई कौन? अपने मिसिर जी बोले भैया मैं,आपका लक्ष्मण.. इतना सुनते ही ज्ञान जी बाहर आए ओर हमने गुलाल लेकर उनके गालो पर लगाया.. वो बोले अरे ये कही नकली गुलाल तो नही.. हिन्दुस्तान में प्रति वर्ष तीनसौ क्विंटल नकली गुलाल का उत्पादन होता है.. अगर क्रम यही रहा तो.... हमने बात बीच में ही काटी अरे सर जी आप क्यो चिंता करते है.. स्किन को कुछ हो भी गया तो अपने डा अनुराग कब काम आएँगे... आख़िर हमारे लिए ही तो वो डर्मेटोलॉजिस्ट बने..

हमारी बात मान कर ज्ञान जी भी हो लिए हमारे साथ.. ओर दोनो हाथ जेब में डालकर चल पड़े .. डा अनुराग बाहर बैठे मिल गये हमको.. हमने पूछा डा साहब बाहर क्या कर रहे है.. तो उन्होने कहा..
रोज़ ज़िंदगी लिख देती है फ़लसफ़े
ईमान क़िस्सो में भी अब नही मिलते

आईने में एक शख्स नज़र आता है मुझे...

मिसिर जी ओर ज्ञान जी एक दूसरे क़ी तरफ देखने लगे.. हम आगे गये ओर उनके माथे पर तिलक लगाया.. डा साहब बोले होली तो हम होस्टल में खेलते थे अब तो केवल रस्म अदायगी होती है.. पर हम तो ऐसे नही खेलेंगे .. इतना बोलके उन्होने पास में पड़ी कलर वाले पानी क़ी बाल्टी हमारे ऊपर डाल दी.. ये देखते ही अनिल जी खुश हो गये.. बोले साधु वाद आपको..

साधु वाद क़ी बात आते ही हम समीर जी के घर क़ी ओर निकले.. ज्ञान जी ने कहा उनके लिए एक्स्ट्रा गुलाल लेना पड़ेगा.. तो ओर गुलाल लिया गया.. जैसे ही समीर जी के यहा पहुँचे तो पता चला वो तो पहले ही होली खेल रहे थे.. सभी जबलपुर भाइयो के साथ.. वही हमे महेंद्र मिश्रा जी, बवाल भाईसाहब सब मिल गये.. सबने एक दूसरे को रंग लगाया.. समीर जी बोले अब तो हम कुछ सुनाएँगे होली पर..

कभी ना भूलना यार मेरी बोली
त्योहारों में एक ही त्यौहार है होली
त्योहारों में एक ही त्यौहार है होली
तो फिर चल पड़ी है यारो क़ी टोली..

सभी बहुत उम्दा, वाह, सुंदर अभिव्यक्ति टाइप कहने लगे.. इतने में अनूप शुक्ल जी सड़क के उस तरफ से आते दिखे.. हमने कहा आप वहा क्या कर रहे थे.. वे बोले समीर जी के गाना ख़त्म करने का इंतेज़ार..

ओर सभी ठहाका मार कर हंस पड़े.. समीर जी भी मुस्कुराने लगे ओर मुस्कुराते हुए उन्होने अनूप जी के गाल खींचते हुए कहा ''यू नॉटी बॉय" इस पर अनूप जी बोले अजी हम कहा नॉटी बॉय है.. नॉटी बॉय तो अभी टंकी पर बैठा है..

इतने में मिसिर जी बोले अरे भई टंकी से उतारो उसको वरना कही टंकी के पानी में रंग वॅंग मिला दिया तो शाम को सोडे से काम चलाना पड़ेगा.. ओर सभी पहुँच गये विवेक बाबू को पकड़ने टंकी पर..

सबने रिकवेस्ट क़ी पर विवेक नीचे नही उतरे.. तब अपने अनुराग जी ने कहा अरे ये नीचे पाँच का सिक्का किसका पड़ा है.. इतना सुनते ही विवेक बोले अरे शायद मेरा गिर गया होगा.. रूको मैं अभी लेता हू.. ओर जैसे ही वो नीचे आए सबने उनको रंग दिया.. समीर जी भी आगे आए ओर विवेक के माथे पर रंग लगाया ओर गले मिलते हुए बोले हेप्पी होली...

इतने में अमर कुमार जी आ गये.. बोले यार मेरी कॉफी अटका के कहा चले गये तुम .. हमने कहा डा साहब कॉफी भी पिलाएँगे.. पहले होली तो मना ले.. इतना बोलके सबने एक एक करके डा साहब को रंग लगाया.. ज्ञान जी बोले भई मैं तो गले मिलकर बधाई दूँगा.. ओर दोनो ने गले मिलकर एक दूसरे को बधाई दी..

बधाई चल ही रही थी.. इतने में किसी कुत्ते के भोंकने क़ी आवाज़ आई.. ज्ञान जी बोले कही मेरे घर के पिल्ले पीछे पीछे तो नही आ गये.. पर ऐसा नही था.. ये तो अपना बीनू फिरंगी था. जो भोंक भोंक कर शायद ये कह रहा हो क़ी बा अदब बामुलाहिजा होशियार.. ठगो के सरदार पहेलियो के असरदार ताऊ पधार रहे है..

ताऊ अपनी रामप्यारी पर बैठे सबपर गुलाल फेंकते फेंकते आ रहे थे.. जैसे पास में आए सबने मिलकर ताऊ को पकड़ लिया ओर खूब गुलाल लगाया.. ताऊ क़ी ही दूसरी भैंस पर बैठा था अपना पी डी.. जब हमने कहा नीचे उतरो तो बोला हमारी टाँग में सूजन है.. इसलिए नही आ सकते.. सबने कहा कोई बात नही ओर सबने पी डी को भैंस पर बैठे बैठे ही रंग लगा दिया..

इतने में अपना अभिषेक आ गया.. आते ही अभिषेक ने कहा आप क़ी गिनती तो बढ़ती जा रही है.. समय के हिसाब से अगर मैं लोगो का गुना करू तो थोड़ी देर में यहा ओर लोगो आने वाले है.. ओर दिल से दिल क़ी जोड़ तो बहुत रंग लाएगी.. इस पर समीर जी बोले यार तुम यहा भी गणित ले आए.. आज तो होली है.. इतना बोलके समीर जी ने अभिषेक को रंग लगाया..

सब ये हल्ला कर ही रहे थे.. क़ी रचना जी आ गयी.. गुस्से में बोली.. आप सब पुरुष लोग अकेले अकेले होली खेलने आ गये.. कम से कम आज तो हम महिलाओ को समानता का अधिकार दे दीजिए.. इस पर डा अमर कुमार जी बोले अजी अधिकार तो आपका है ही मांगिए मत छीन लीजिये.. ओर सभी ठहाका मार के हंस पड़े.. हमने भी रचना जी को गुलाल लगाया.. वे बोली बाकी क़ी भी सब बहनिया साथ ही है..

इतना कहते ही सभी लेडीज़ ब्लॉगरणिया भी आ गयी.. ताऊ जी भैंस के पास खड़े होकर बोले.. सु.सीमा जी कही दिखाई नही दे रही है.. इतना सुनते ही सबने एक बार फिर ठहाका लगाया... समीर जी बोले क्यो ताऊ आते ही अपने संपादको को ढूँढने लगे अपने दोस्तो को भूल गये.. भाटिया जी ओर योगेंद्र मौदगिल जी के बारे में तो पूछा ही नही..

ताऊ बोले अरे ऐसी बात नही है.. वो तो कब से वहा बैठकर ठंडई बना रहे है.. वो भी जर्मन स्टाइल में.. ये सुनते ही होली का रंग दुगुना हो गया..

भीड़ में हमे एक लंबा साया दिखा.. जब गौर से देखा तो पता चला रंजना भाटिया जी थी.. हाथ में अमृता प्रीतम क़ी किताब लेकर आई थी.. इस पर कंचन जी बोली बोली अरे रंजू जी आप यहाँ पर भी अमृता जी को साथ ले आई..

ममता जी बोली अरे तो क्या हो गया. इसी बहाने अमृता जी भी हमारे साथ होली खेल लेगी.. तभी पीछे से पूजा चिल्लाई अरे सब लोग मुझे तो भूल ही गये.. मैं भी तो हू यहाँ.. इतना सुनते ही सबने देखा पी डी भैंस से उतर चुका है.. सबने पी डी को वापस भैंस पर बिठाया..

किसी ने कहा गुलाल ख़त्म हो गया.. ये लो आ गया गुलाल.. सबने मुड़कर देखा तो अरुण पंगेबाज जी आ गये थे साथ में वकील साहब दिनेश जी भी थे.. उनके आते ही एक सकारात्मक उर्जा का संचार हुआ.. सब लोग खुश हो गये.. तरह तरह के गुलाल आ गये थे. .सबने एक दूसरे को रंग लगाया..

ओर सब साथ मिलकर चल पड़े अरविंद मिश्रा जी के घर.. जैसे ही उनके घर पहुँचे तो देखा मिश्रा जी घर पर देव डी फिल्म देख रहे थे.. सबने उनको वही पकड़ लिया और गुलाल लगा दिया.. उनके माथे से लेकर गर्दन और हाथ से आते आते उनके पाँव तक गुलाल दिया.. वो बोले यार पूरे शरीर पर रंग लगा दिया.. अब तो दोबारा पर्यवेक्षण करना पड़ेगा..

इस तरह वो भी हमारी टोली में शामिल हो गये.. इतने में कोई बोला अरे मसिजीवी परिवार तो कही नज़र नही आ रहा.. उनके घर पहुँचे तो पता चला आज चिट्ठा चर्चा करने क़ी बारी उनकी थी.. तो वो आपस में तय नही कर पा रहे थे क़ी कौन चर्चा करे..

अनूप जी बोले इसमे कौनसी बड़ी बात है.. आप अख़बार में आपका भविष्यफल पढ़ लीजिए क़ी आज आपके भविष्य में चर्चा करना लिखा है क़ी नही.. इस पर मसिजीवी जी ने ज़ोर से ठहाका लगाया.. हालाँकि वो रंगे हुए चेहरो में पहचान नही पाए.. संगीता पूरी जी भी हमारे साथ थी.. पर संगीता जी ने कहा.. परिवार में हँसी ठिठोली नही होगी तो कहाँ होगी.. ज़रूरी थोड़े ही है क़ी परिवार में सबकी सोच समान हो.. आज तो होली है.. रंग लगाओ ओर खुशिया मनाओ..

इतना सुनते ही सब ज़ोर से बोले होली है.. नीलिमा जी और सुजाता जी सबके लिए पकोडे लेकर आ गये.. सबने पकोडे खाकर ही आगे जाने का प्रोग्राम बनाया..

पकोडे खाने के बाद सभी बाहर निकले ही थे क़ी सामने से पुलिस क़ी जीप आती हुई दिखाई दी.. ताऊ जी पीछे हो लिए उन्हे लगा गोटू सुनार पुलिस लेकर आ गया.. पर जब देखा तो उसमे से पल्लवी जी निकली. पल्लवी जी उतरते ही बोली अरे आप लोग कहाँ गायब थे मैने सब जगह देख ढूँढा आपको..

समीर जी बोले.. अरे हम तो यहा बैठे पकोडे खा रहे थे.. खैर अब आ ही गयी तो होली तो खेल ही लेते है.. पी डी ने फिर नीचे उतरने क़ी कोशिश क़ी पर सबने वापस भैंस पर बिठा दिया..

पल्लवी जी के आते ही माहौल और जम गया.. उन्होने आते ही जोरदार गाना गया.. रंग बरसे भीगे चुनर वाली.. ओर सभी ने उस पर डांस करना शुरू किया.. ज्ञान जी तो दोनो हाथ उठाकर डांस कर रहे थे.. अनुराग जी ने भी समीर जी के साथ ठुमके लगा लिए.. मिसिर जी और ताऊ पत्नग उड़ाने वाली स्टाइल में नाच रहे थे.. लेडीज़ गेंग ने घूमर शुरू कर दिया.. अनूप जी नागिन स्टाइल वाला डांस करने लगे.. अनिल जी और वकील साहब भी कहा पीछे रहने वाले थे.. अरुण जी और मसिजीवी भी जोश में आ गये.. अभिषेक और हम ढोलकी पे थाप देने लग गये..हमारे साथ अमर कुमार जी भी आ गये..

पी डी भैंस पर बैठे बैठे ही डांस कर रहा था.. कुल मिलकर पूरा मस्ती का माहौल था.. सभी होली के रंगो में घुल गये थे.. ओर बड़ी धमाकेदार परफॉर्मेंस चल रही थी..

तभी वहा पर सुशील कुमार छौक्कर ओर सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी जी भी आ गये.. आते ही बोले अकेले अकेले डांस हो रहा है.. हम भी करेंगे.. ओर वे भी हो लिए साथ में.. सबने सुशील जी से पूछा.. बिटिया कहा है? तो उन्होने कहा वो तो वहा आदित्य, लवीजा ओर मिष्टी के साथ होली खेल रही है... इतना सुनते ही सब वहा निकल पड़े.. आदि पलटी मार मार कर होली खेल रहा था.. लवी बिटिया बुढ़िया के बाल खा रही थी.. ओर मिष्टी बिटिया नीरज जी के कंधे पर बैठ के डांस कर रही थी..

वहा पहुँचते ही नीरज जी ने होली पर अपने गुरु प्राण साहब क़ी रहनुमाई में लिखी हुई ग़ज़ल सुना दी सबको..

ब्लॉगर गण मिलकर आज मना लो होली
जब फ्री हो जाओ तो आ जाना खोपोली..

सबने मिलकर नीरज जी को रंग लगाया.. सबको इस तरह से खुश देखकर लावन्या जी को अपने बचपन के दिन याद आ गये जब वे अमिताभ बच्चन ओर लता जी के साथ होली खेला करती थी.. लेकिन मीनाक्षी जी ने उन्हे कहा अरे ब्लॉगर बच्चन नही है तो क्या हुआ.. दूसरे तो ब्लॉगर है.. इतना सुनकर लावन्या जी बोली बिल्कुल सही कहा..

ओर सब हंसते हँसते जा पहुंचे ब्लॉगवानी के ऑफीस वहा पहुँचते ही मैथिली जी और सिरिल बाबू आ गये पकड़ में सबने उनको रंग लगाया.. और ब्लॉगवानी साईट बनाने के लिए धन्यवाद दिया.. जिसके कारण आज सभी लोग एक परिवार से लगते है..

बस फिर वही ब्लॉगवानी के ऑफीस में भाटिया जी और मौदगिल जी ठंडाई लेकर आ गये ओर सबने खूब छककर ठंडाई पी.. अंत तक गज़लो का, गीतो का.. डांस का दौर चलता रहा.. ओर सभी एक दूसरे को होली क़ी शुभकामनाए देते रहे..

सबसे आख़िर में मैने सबसे कहा.. आप सभी को रंगो के इस पर्व क़ी बहुत बहुत बधाई.. ये होली आपके जीवन में नये रंग लेकर आए.. इस होली पर जम कर होली खेले.. अपने घर के बच्चो को इस त्योहार का महत्त्व बताए.. होली पर केमिकल युक्त रंगो का प्रयोग ना करे.. होली सूखी खेले या गीली.. पानी का कम से कम उपयोग करे.. इसी के साथ आप सभी को होली की अग्रिम शुभकामनाये..